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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1815

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स्वर्विमानमिदं रम्यं कामजं कांतदर्शनम् ।

पादांबुजनता चेयं तत्र त्रिदशमंडली ।।1815।।

स्वर्गलोक विमान की विशेषताओं का उपस्थित देवों द्वारा उत्पन्न देव के प्रति आख्यान― हे नाथ ! यह स्वर्ग का विमान है, इससे जहाँ चाहें वहीं जा सकते हैं । देखिये एक तो होता है आवास विमान, जिसकी बहुत बड़ी लंबाई चौड़ाई होती है । वह विमान जमीन की तरह होता है पर उसके भीतर जो बसने वाले देव हैं उनके वहाँ सुंदर भवन आदि की स्वतःसिद्ध रचना होती है तो एक मोटे रूप से वे सब विमान हैं, जो एक बहुत लंबे चौड़े पृथ्वी के रूप में पड़े हुए हैं । उसमें और भी विमान होते जाते हैं । यहाँ विराज रहे हैं, उस विमान की बात कह रहे हैं कि यह स्वर्गीय विमान है, इससे जहाँ जाना चाहें वहीं जा सकते हैं । इनका दर्शन अति मनोहर है । यह देवो की मंडली' आपके चरण कमलों में नम्रीभूत है । देखिये देवों को किसी प्रकार की चिंता नहीं, कोई शारीरिक वेदना नहीं, किसी भी प्रकार की पराधीनता का कोई अवसर ही नहीं । शरीर संबंधी वेदनाओं को मिटाने की जब नौबत होती है तब पराधीनता आया करती है, पर देवों में पराधीनता का क्या सवाल, लेकिन पुण्य पाप के फल वहाँ भी किसी न किसी रूप में पाये जाते हैं । पुण्यफल तो यों है कि वे सभी देव मनोवांछित सुखों की सामग्री प्राप्त करते हैं और पाप के फल में यही कह लीजिए कि इंद्रादिक बड़े देवों की हाँ हुजूरी में खड़े रहना पड़ता है कि यह इंद्र मुझ पर प्रसन्न रहे तो समझो मेरा जीवन सफल है । खैर मंत्री सब परिचय करा रहा है कि यह देवों की जो सभा बैठी है यह आपके चरणकमलों में नम्रीभूत है, बड़े विनय से ये सब देव आपकी ओर निहार रहे हैं ।


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