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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 19

From जैनकोष



न कवित्वाभिमानेन न कीर्तिप्रसरेच्छया।

कृति: किंतु मदीयेयं स्वबोधायैव केवलम्।।19।।

अभिमानादि का अभाव―मैं इस कृति को कहीं कर्तृत्व के अभिमान से नहीं कर रहा हूँ और न मैं लोकेषणा से अर्थात् लोक में मेरी कीर्ति फैले इस इच्छा से भी मैं नहीं कर रहा हूँ किंतु अपने आपका मुझमें बोध बना रहे, इस प्रयोजन से ही यह कृति हो रही है। जिन संतजनों के संस्थानविचय नामक धर्म ध्यान रहा करता है, जिस ध्यान में तीन लोक की रचना स्पष्ट उपयोग में बनी रहती है और तीन काल में जो कुछ रचना है वह भी प्रयोजनात्मक उपयोग में बनी रहती है, जिसके ज्ञान में इस समस्त दुनिया का भी स्मरण है। कितना बड़ा लोक है और काल भी स्मरण है, यों लोक और अलोक का जहाँ ध्यान रहता है, उनकी लोक में मेरी कीर्ति फैले यह इच्छा कभी नहीं हो सकती।

लोकरचना विज्ञान का प्रभाव― जिनके ज्ञान में यह बात पड़ी हुई है कि यह लोक 343 घनराजू प्रमाण है, और उस लोक में यह जीव प्रत्येक प्रदेश पर जन्म लेता आया है। अनंतानंत जीव इस लोक में भरे पड़े हैं। उन अनंतों में से ये 10-20 हजार का यह मनुष्यलोक किस गिनती में है? यह तो स्वयंभूरमण समुद्र बराबर जल में बिंदु की तरह भी गिनती नहीं रखता है। इसमें कुछ बात चल उठे, कीर्ति फैले, यह लोक मेरा नाम ले तो इससे क्या होता है? अभी अनंतानंत जीवों ने तो नहीं जाना, अथवा ये लोग कुछ भी कहें, उनसे भिन्न मेरा आत्मा है, इनसे मेरा क्या सुधार हो जायेगा? वे सब भी अपनी परिणति के करने वाले हैं, यह मैं भी अपनी परिणति का करने वाला हूँ। जिसे काल की खबर है, अनंतकाल व्यतीत हो गया और उससे भी अनंतगुण अनंतकाल व्यतीत होगा। ऐसे इस असीम काल की जिसे स्मृति है उसके कीर्ति प्रसार की इच्छा नहीं जग सकती। क्या कीर्ति? कुछ वर्णन स्वार्थीजनों ने गा दिया, नाम ले लिया तो उससे इस आत्मा की कौनसी सिद्धि हो जाती है?

ज्ञानी के कीर्तिप्रसार का अभाव― आचार्यदेव इस ग्रंथरचना को कर रहे हैं, उसमें उनके यह भाव नहीं है कि लोग मुझे समझें, लोग मेरा नाम लेते रहें, हाँ हुये हैं शुभचंद्राचार्य। नाम से क्या है? मान लो कोई दूसरा अपना नाम मुनि होकर शुभचंद्राचार्य रख ले तो कोई अगर नाम भी लेगा तो इनका भी नाम आ गया, क्या इसकी भी कीर्ति बन गयी क्या? और उन शुभचंद्राचार्य की कोई शकल सूरत भी जानने वाला नहीं है, वह तो अब कहीं के कहीं होंगे। तो कीर्ति में और कीर्तिप्रसार में कुछ दम नहीं है।

ग्रंथरचना का उद्देश्य―जिनकी इस पर्याय में ममता है, जिनके वैभव में मूर्छा है वे पुरुष शांति के कैसे पात्र हो सकते हैं? मूर्छा को ढीला करना ही पड़ेगा यदि शांति चाहिये हो। मूर्छा को तो समझिये कि यह इस जीव की कुबुद्धि का कारण है और विपत्ति का कारण है। किस बात पर अभिमान? जैसे धन एक विनश्वर वस्तु है ऐसे ही दुनिया को दिखाये जा सकने वाले ये ज्ञान, ये कलायें भी विनश्वर चीजें हैं। न धन का अभिमान योग्य है और न ज्ञान का अभिमान योग्य है। मैं पंडिताई के अभिमान से इस ग्रंथ को नहीं रच रहा हूँ, केवल अपने बोध के लिये अपने में अपना प्रकाश बना रहे, इसके लिये ही यह मेरी कृति है।

धर्मोपदेश स्वाध्याय में भी स्व का अध्ययन― धर्मोपदेश नाम का एक भेद है स्वाध्याय का। स्वाध्याय के 5 भेदों में अंतिम भेद धर्मोपदेश है, धर्म का उपदेश देना और स्वाध्याय कहते उसे हैं जिसमें स्व का अध्ययन बन जाय। अपने आत्मस्वरूप का मनन बने तो धर्मोपदेश में अपने आत्मा का अध्ययन कैसे होता है? फिर यह स्वाध्याय का भेद कहाँ रहा? यह शंका की जा सकती है तो उसमें यह समझना चाहिये कि उपदेश देना दूसरों का आधार बनाकर आश्रय बनाकर हुआ करता है। कोई पुरुष अकेले ही कहीं बैठकर ग्रंथ खोलकर इसे बोलता हो, ऐसा कहीं देखा है क्या? सुनने वाले हों, उनको उपदेश के माध्यम पर, आधार पर वह धर्मोपदेश चलता है। ठीक है फिर भी धर्मोपदेश में ज्ञानी पुरुषों की नीति और झुकाव यह रहता हे कि जो कुछ बोल रहा हूँ यह अपने आपको सुना रहा हूँ। जैसी भावना करने के लिये मैं कह रहा हूँ। ज्ञानी वक्ता अपने आपमें घटित करने के लिये ध्येय से कह रहा है, खुद खुद को उपदेश दे रहा है। धर्मोपदेश में आंतरिक दृष्टि ऐसी बनती है। बाह्यदृष्टि में तो यह बात ठीक है कि दूसरों के उपयोग के लिये श्रोताजनों की साधना के लिये यह बोला जा रहा है, पर इस बात की मुख्यता नहीं है, इसमें अपने बोध की ही मुख्यता है।

स्वयं मेंवक्तृत्व व श्रोतृत्व― भैया ! यह बात भी खूब संभव है कि धर्मोपदेश के निमित्त तो पर होते हैं, कर रहे हैं। धर्मोपदेश किस ही प्रकार हो रहा है, फिर भी उसमें यह झुकाव बनाया जा सकता है कि मैं बोल रहा हूँ तो सुन भी तो मैं रहा हूँ। जो कुछ बोलता हूँ वह सब मैं सुन लेता हूँ। यदि मैं बात खुद नहीं सुन सकता तो बोल भी नहीं सकता। क्या बोला, क्या बोल रहे हैं ये सब बातें हम अपने कानों से सुन लेते हैं। तो जैसे हम बोलते हैं आप लोग सुनते हैं ऐसे ही मैं भी तो सुन रहा हूँ। तो जैसे दूसरा बोले और मैं सुनूँ तो उसका अर्थ मैं अपने पर घटा सकता हूँ ऐसे ही मैं ही बोलूँ और मैं ही सुनूँ तो क्या वहाँ उस बताने का मर्म, अर्थ अपने आप पर नहीं घटित कर सकूँगा? घटित किया जा सकता है। इसी तरह कोर्इ चीज लिखी तो लिखते हुये उसको साथ ही साथ मैं अपने भीतर बोलता भी तो जाता हूँ, हर एक कोई समझ लेगा। कुछ लिखा जा रहा हो तो उतने शब्द मुख से न बोले तो भी भीतर में वे शब्द निकल जाते हैं। तो लिखते हुए में भी जो मैं लिख रहा हूँ।वे शब्द मेरे बोध के लिये हैं, उसको अपने आप पर घटित करते जाइये। तो आचार्यदेव यहाँ यह बतला रहे हैं कि मुझे इस कृति के करने में अभिमान नहीं है, मेरी कीर्ति फैले ऐसी भी इच्छा नहीं है, किंतु मैं अपने आपको बोध करने के लिये, यों संबोधने के लिये ही यह ज्ञानार्णव नाम की कृति कर रहा हूँ।

ग्रंथकर्ता के विचार का निर्देशन― इस प्रसंग में आचार्यदेव ने अपनी लघुता को प्रदर्शित किया है और ग्रंथरचना का मेरा सही उद्देश्य क्या है? उस पर प्रकाश डाला है। यों प्रयोजन दिखाने के बाद अब एक साधारणरूप से यह बात बतावेंगे कि सत्पुरुष जो शास्त्र रचना करते हैं तो उस प्रसंग में उनका विचार किस-किस प्रकार से होता है? भूमिका वाली इतनी बातें सब ज्ञान में आने पर एक स्पष्टता हो जाती है उपयोग में और फिर प्रतिपाद्य विषय को उस ही रूप में ढालने की इनकी प्रवृत्ति होती है, इस कारण एकदम सीधा उपदेश न देकर पहिले उस उपदेश को धारण करने के लिये जिस-जिस विचार और वृत्ति की आवश्यकता है, उन-उन विचारों और प्रवृत्तियों को बताने के लिये अभी भूमिका चल रही है। अब इसके बाद ग्रंथरचना किस-किस विचार से साधु संत पुरुष किया करते हैं इस पर कुछ प्रकाश आयेगा।

ग्रंथरचना प्रेरक विचारों के प्रदर्शन का उद्यम― ग्रंथकर्ता श्री शुभचंद्राचार्य शास्त्र की भूमिका में यह बतला रहे हैं कि सत्पुरुष शास्त्र रचना करते हैं तो उनके चित्त में बात क्या रहती है, कौनसी प्रेरणा उनके चित्त में उत्पन्न होती है जिससे प्रेरित होकर वे शास्त्र रचना किया करते हैं। इन ही विकारों को इन 5 श्लोकों में आचार्यदेव रख रहे हैं।


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