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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 203

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धर्मो नरोरगाधीशनाकनायकवांछिताम्।

अपि लोकत्रयीपूज्यां श्रियं दत्ते शरीरिणाम्।।203।।

धर्म से महनीय श्री का लाभ―धर्म जीवों को उत्कृष्ट लक्ष्मी प्रदान करता है। ऐसी लक्ष्मी जो चक्रवर्ती के द्वारा चाही गयी है अर्थात् जिसे चक्रवर्ती चाहें, देवेंद्र चाहे धरणेंद्र चाहें ऐसी भी विभूति को यह धर्म प्रदान करता है। चक्रवर्ती आदिक महापुरुष भी इस धर्म के प्रसाद से ही बना करते हैं। धर्म का स्वच्छ स्वरूप क्या है जब यह बात अपने अंतरंग में अपने अनुभव से विदित हो जाती है तब धर्म के प्रसाद से ऐसे लौकिक चमत्कार बहुत सुगम जँचते हैं। धर्म का तो वह प्रताप है कि जिसके प्रसाद से यह जीव सदा के लिए निराकुल हो जाय।

निराकुलता के प्रयोजन का विवेक―भैया ! एक कहावत में कहते हैं कि तुमको आम गिनने से काम है या खाने से काम है? इसी तरह से यह बताओ कि आपको विभूति से काम है, या निराकुलता से काम है? यदि निराकुलता से काम है तो विभूति के गिनने का, विभूति के विश्लेषण का क्या प्रयोजन है? वह काम किया जाय जिसमें निराकुलता बने। निराकुल होने का मार्ग ही एक है और वह है शुद्ध ज्ञान। बड़ा वैभव भी हो तो भी वैभव से निराकुलता नहीं होती। बल्कि वैभव को विषय बनाकर जो यह ज्ञान बाहर की ओर दृष्टि किए रहता है, बहिर्मुखता रहती है तो ज्ञान की बहिर्मुख पद्धति में तो आकुलता ही होती है। आकुलता वैभव से नहीं हुई किंतु अपने ज्ञान की जो बहिर्मुखी वृत्ति हुई, उसकी आकुलता हुई। अर्थात् अपने अपराध से आकुलता है, वैभव के रहने या न रहने से आकुलता का निर्णय नहीं है। जितने तीर्थंकर, चक्रवर्ती, बलभद्र आदिक महापुरुष हुए हैं उनके तो बड़ी विभूति थी। हम आपके पास क्या है? अथवा समझ लो इससे भी करोड गुना विभूति हम आपने अनेक बार पायी होगी। उसके आगे आज की यह विभूति क्या हैं, किंतु जीव को ऐसा मोह लगा रहता है कि जब जो पाया उसी को सर्वस्व समझते हैं।

ज्ञान से शांति का लाभ―शांति ज्ञान से मिलती है और अशांति अज्ञान से चलती है यह बात सभी घटनाओं में घटा लो। परिवार में रहते हैं, कोई कुछ बोलता है, लड़के कैसे ही चलते हैं, परिवार का कोई कैसी ही प्रवृत्ति करता है, उनको देखकर यहाँ जिसने अपने को बुजुर्ग घर का मान रखा है वह दु:खी होता है तो उसके दु:खी होने का साक्षात् कारण है अज्ञान। यह जो श्रद्धा में बनी हुई बात है कि मैं इसका अधिकारी हूँ, मैं जो चाहूँ इसे करना चाहिए, ऐसा जो विश्वास बनाया, बस यही अविद्या दु:ख देती है। रही कर्तव्य की बात तो कर्तव्य का मार्ग तो ठीक है। जब घर में रहते हैं तो बच्चों को शिक्षा देते हैं। दो एक बार गलती हो जाय तो उनको शिक्षा देते रहते हैं और कोई यदि कुपूत ही उत्पन्न हो गया, कलहकारिणी ही घर में स्त्री बनी हुई है, अन्य-अन्य सब प्रतिकूल हो गए हैं तो इसका फिर यह कर्तव्य नहीं है कि यह उनके व्यामोह में ही, पक्ष में ही अटका रहे। वहाँ यह विवेक करना चाहिये बाबा तुम लोगों का भाग्य ही विपरीत है तो हम तुम्हारे सुधार में क्या निमित्त बनेंगे? जैसे अनंत जीव हैं दुनिया में वैसे ही एक हम आप जीव हैं, लेकिन यह तो मेरा ही है, मैं इसके पीछे जान दे दूँगा ऐसी मान्यता रखना यह घोर अंधकार है। सुगमतया इतनी शिक्षा अगर कोई मानता है तो कर्तव्य है कि समय-समय पर योग्य बात बताई जाय, लेकिन इस जीव के या अचेतन विभूति के पीछे ममता की कमर कसे रहना, यह तो कोई बुद्धिमानी की बात नहीं हैं।

परवैभव से शांति का अलाभ―बड़े-बड़े चक्रवर्ती तीर्थंकर आदिक हुए, जिनके अटूट विभूति थी, नवऋद्धि सिद्धि जिनके बारे में प्रसिद्ध है। उनका भी वैभव में मन लगा नहीं, उन्हें छोड़कर ही उन्होंने शांति प्राप्त की। इससे भी यदि निर्णय बना लो कि वैभव को रख-रखकर कोई शांति नहीं पा सकता। अच्छा, यदि वैभव से शांति मिलती है तो उसे लपेटे रहें, हैं किसी में ऐसी शक्ति? मरते समय भी परिजन या वैभव को अपनी छाती से लगाये रहें तो क्या उसका एक अंश भी साथ जा सकता है? जो कुछ आज समागम है इसको देखकर इसमें बेहोश न होना चाहिए। विवेकशील रहना चाहिए। अपने को अपना स्मरण रहे ऐसी साधना रखनी चाहिए, नहीं तो जैसी लोकप्रसिद्धि है कि धोबी का कुत्ता घर का न घाट का। पता नहीं क्यों ऐसी प्रसिद्धि है, ऐसे ही हम कुछ थोड़ासा धर्म की तबीयत बनाकर धर्म के काम में लगें और साथ ही गृहस्थी का कुटुंब का मोह सता रहा है तो उस ओर बढ़ें, साथ ही धर्म की कुछ धुन सी आये, जैसे एक पागलपन सा समझिये, उससे कुछ धर्म की ओर लगे तो यह संसार में रुलने का ही काम रहा, पार होने का नहीं।

दृढ़ रुचि से धर्मपालन में लाभ―चाहे भैया ! चौबीस घटों में 5 घंटे धर्म मत करें, करें चाहे 5 मिनट, पर जो समय दिया है उस समय में अपनी इतनी तैयारी अंदर की रहे कि हमें किसी भी अन्य वस्तु से प्रयोजन नहीं है। किसी भी परपदार्थ का दूसरे वस्तु का हमें ख्याल नहीं करना है और देह से भी न्यारा मैं हूँ, ऐसे केवल ज्ञानपुंज को ही हमें निहारना है, ऐसी दृढता के साथ यदि 5 मिनट भी दृष्टि बने तो वह काम करेगी और धर्म में दिल तो है नहीं, चित्त तो ममता में है और फिर भी लोक दिखावे की वजह से अथवा अपनी कुलपरंपरा की वजह से हम लगे रहें धर्मकार्य की ओर तो धर्म साधन का जो प्रयोजन है वह सिद्ध न हो सकेगा। धर्म का तो इतना अतुल प्रताप है कि यह जीव निराकुल हो जायेगा सदा के लिए। यह जड़ विभूति तो चीज क्या है। कुछ प्रयोग करके अंदाज करने से ही यह सब विषय स्पष्ट होगा। प्रयोग यही है कि हम इन इंद्रियों के विषय को रोककर किसी भी बात को सुनने की चाह न करें, इन नेत्रों को बंद करें, कुछ न देखें और सभी इंद्रियों को संयमन करें, किसी भी इंद्रिय के विषय में न लगें और गुप्त ही गुप्त अपने ज्ञान को अपनी ओर भीतर ढालकर कुछ निरख करें कि हूँ मैं क्या असल में, मेरा स्वरूप क्या है?

निज की बेसुधी का असर―भला, जो जाननहार हैं वह अपने ही स्वरूप को न जान सके यह तो अंधेर की बात है। अग्नि है वह दूसरों को जलाती है और खुद गर्म न हो, बाहर की चीज को तो जलाये और अग्नि के निकट पदार्थ हो उसे पानी की तरह शीतल रखे यह तो नहीं हैं वहाँ। जिसका जैसा स्वभाव है उसका वह सर्वांग स्वभाव है। तो हमारा स्वभाव जानने का है, हम इतनी चीजों को जान रहे हैं और जानने वाले को हम न जान सकें यह तो अंधेर की बात होगी। जानने वाले को जानना तो अति सुगम है। बाहरी पदार्थों को जानने में तो अनेक विघ्न हैं। इंद्रियाँ समर्थ हों, उजेला आदिक बाहरी साधन हों, हमारे आवरण कर्मों का क्षयोपशम हो, शिथिलता हो, हमारी ज्ञानशक्ति भी काबिल हो, अनेक बातें हों तब हम जान सकते हैं बाह्य पदार्थों को। पर अपने आपको जानने के लिए बाह्य साधनों की तो जरूरत है ही नहीं, दिया न जलता हो, सूर्य प्रकाश न हो तो हम अपने आत्मा को न जान सकें ऐसी बात तो नहीं हैं। अँधेरा हो, उजेला हो, घर में हो, वन में हो, परतंत्र हो, संपन्न हो, रोगी हो, स्वस्थ हो, कुछ भी हालत हो, यदि ज्ञानशक्ति प्रबल है और सम्यक्त्व के ढंग से है तो हम हर स्थिति में अपने आपके स्वरूप को जान सकते हैं। जिसने अपने इस आत्मस्वरूप को जाना उसने सब कुछ प्रयोजनभूत जान लिया। अब उसे अन्य कुछ जानने का प्रयोजन नहीं।

बाह्य में शरण का अभाव―भैया ! एक इस अपने को न जान पाया, दुनिया की अनेक चीजों को जानते रहे तो फिर ठौर ठिकाना न मिलेगा, फुटबाल की तरह दर-दर ठोकरें ही खानी पड़ेंगी। मानो बेचारा फुटबाल दूसरे बालक की शरण गहने गया तो वहाँ से ठोकर मिलेगी, अन्य बालक के पास शरण लेने गया तो वहाँ से ठोकर मिलेगी। यों ही फुटबाल की तरह यह जीव ठोकर खाता रहेगा। काल्पनिक विपत्तियों से परेशान होकर सोचा कि स्त्री हमारी शरण बनेगी, पर वहाँ से भी इसे ठोकर मिलेगी। इस संसार में किसी से भी शरण की आशा करे तो इसे ठोकर ही मिलेगी। माना उस स्त्री से जीवन भर ठोकर न मिले तो जब उसका मरण होगा तो उसके वियोग की ठोकर लगेगी। जिंदगी भर ठोकर न मिला तो मरकर ठोकर मिला। पर जितने भी से समागम हैं उन सबकी ओर से इस जीव को ठोकर लगती है। कोई अपना बहुत अनुकूल मित्र है, उससे अपने को बहुत सुख उत्पन्न हुआ, पर इस जीवन में ही कोई समय ऐसा भी आयेगा कि किसी न किसी रूप में उससे भी ठोकर लगेगी। तो ठोकर बाहरी चीजों से न लगेगी, सब अपनी कल्पनाएँ हैं। अपनी कल्पनाओं से कुछ सुख माना था और अपनी ही कल्पनाओं से अब दु:ख माना है।

सर्वत्र अपनी जिम्मेदारी―भैया ! सब अपने आप पर अपनी जिम्मेदारी है। जो जैसा करता है वैसा भोगता है। और कोई यह भी धारणा रखते हैं कि हमको सुख दु:ख देने वाला ईश्वर है, लेकिन हम पाप करें तो फल किसे मिलेगा? चाहे ईश्वर ने ही दिया सही, फल तो बुरा मिला ना। तो मूल जिम्मेदारी किसकी रही? हमारे सुखी दु:खी होने में मौलिक जिम्मेदारी हमारी रही कि भगवान की? हम जैसा करते है वैसा भोगते हैं। चाहे वह निमित्तनैमित्तिक भाव से फल मिले, और चाहे किसी का दिया हुआ फल मिले। किसी ही प्रकार मिले पर उसमें दो राय नहीं हैं कि हम पाप करें, हम बुरा करें तो हम बुरा फल पायेंगे अच्छा करें तो अच्छा फल पायेंगे। तो हम जिम्मेदार अपने ही तो रहे।

बात का बतंगड़―हम जरा-जरासी लोलुपता के पीछे मायामयी साधनों के लिए मायाचार करें, तृष्णा करें, दूसरों पर दया न करें, यह कितनी बड़ी भूल है कि बात न चीत विडंबना इतनी बड़ी कि जिसे जैसे लोग कहते हैं कि बात का बतंगड़ हो गया। बात कुछ न थी और बात का बतंगड़ इतना बढ़ गया, ऐसे ही समझो कि हम आपका जो इतना बतंगड़ बना है, मरे, कीड़ा बन गए, मरे, पशु बन गए, मरे पक्षी बने अथवा मनुष्य-मनुष्य भी रहकर हजारों तरह की विपदाओं में ग्रस्त हुए, कितनी आकुलता कितने विकल्प? इतना जो बतंगड़ बना है वह जरासी बात का बन गया। वह जरासी बात कितनी कि यह अपना ज्ञान अपनी ओर मुड़ करके न जाने और इसने इस तरह बाहर की ओर मुँह करके जाना सो बतंगड़ इतना बड़ा हो गया। तो जो यह बहिर्मुख दृष्टि है यही अधर्म है और अंतर्दृष्टि होना यही धर्म है। हमें धर्म अधर्म का निर्णय देहधारी के ढंग से न करना चाहिए। हम मनुष्य हैं, यों मनुष्य के ढंग से न करना चाहिए किंतु हम जीव हैं, आत्मा हैं उस आत्मा के नाते से हमें धर्म और अधर्म का निर्णय करना चाहिए।

अपना धर्म―भैया ! अंतर्वृत्ति के निर्णय से समझ लिया होगा कि मूल में धर्म यह निकला कि मेरा ज्ञान मेरे को जाने, जिसमें रागद्वेष स्वयं छूट जाते हैं वह स्थिति तो धर्म है और बाहर में फँसे और उनमें रागद्वेष पक्षपात की वृत्ति रखी, बस वह अधर्म है। मोटे रूप में निष्कर्ष में यों कह लो हमें जो चीज अधिक से अधिक प्यारी है वही मेरे को अधिक से अधिक दु:ख का कारण है। जिससे अधिक प्रेम होता है उसके गुजरने पर अधिक शोक होता है और जिससे कम प्रेम रहता है उसके गुजरने पर कम शोक रहता है। तो अर्थ यह निकला कि जो अधिक प्यारी वस्तु हो वह अधिक दु:ख का कारण है। सो वस्तु दु:ख का कारण नहीं, अधिक प्रेम हो तो अधिक दु:ख, कम प्रेम हो तो कम दु:ख, और प्रेम न हो, मोह न हो, द्वेष न हो, केवल जाननहार रहे उसको कोई दु:ख का काम ही नहीं है। तो जब धर्मदृष्टि जगती है तब वहाँ सारा वैभव प्राप्त हो जाता है। हमें यदि निराकुलता चाहिए, तो हमें जमीन मकान की गिनती न करनी चाहिए। अगर निराकुलता जमीन मकान से मिले तो जमीन मकान का संचय किया जाय, यदि हमें निराकुलता सभी चीजों के त्याग से स्वयं मिले तो वह स्थिति पसंद करें। संकल्प यह होना चाहिए कि मुझे तो निराकुलता चाहिए, समृद्धि न चाहिए।

मोह में स्वरूपभ्रष्टता―बहुत से लोग तो निराकुलता के उद्देश्य की बात को भी तैयार नहीं हो सकते। वे यह मानना नहीं चाहते कि हमें तो धन न चाहिए। निराकुलता चाहिए। उनका तो बर्ताव है, यह भीतरी भाव है कि हमें तो धन चाहिए, हम पर चाहे कुछ गुजरे। हमें तो राज्य चाहिए, चाहे हम पर कुछ गुजरे। आकुलित होते हैं और आकुलता के साधनों में ही मोह बढ़ाते हैं, यह स्थिति हो रही है। जैसे लाल मिर्च खाते जाते हैं, सी-सी करते जाते हैं, आँसू भी गिरते जाते हैं और मांगते भी जाते हैं कि और लाओ मिर्च। ऐसे ही ये जीव दु:खी भी होते जाते हैं, आकुलित भी होते जाते हैं और फिर भी उन्हीं साधनों में रमते हैं। जैसे लड़के को पालपोस रहे, वह मारता भी, मूँछ भी फाड़ता, ऊपर मल मूत्र भी करता और बड़ा होने पर कष्ट भी देता तो भी उसे मानते कि यह तो मेरा ही है। ऐसी दृढ़ ममता, कैसा अज्ञान चित्त में बसा है?

ज्ञानी के विवेक का संतुलन―ज्ञानी पुरुष चाहे घर में रहे, चाहे वन में रहे उसका तो संतुलित विचार रहता है, वह किसी थोथी भावुकता में नहीं आता। जरासी देर में इस ओर बह गया, फिर उस ओर बह गया ऐसा वह विवेकी पुरुष नहीं करता है। वह अपने विवेक से अपनी दृष्टि से सब हल निकालता है। घर में रहता हुआ भी ज्ञानी वैरागी है और घर छोड़कर भी अज्ञानी मोही है। जब तक अपनी ज्ञानदृष्टि में उत्साह रखने की पक्व स्थिति न बने, घर छोड़कर के अपने आपके संयम को चर्या को भली प्रकार निभा सके ऐसी पक्की स्थिति न बने, तब तक तो उसका घर का छोड़ना भी बेकार है। जो चीज सामने रखी है तो सामने होने पर भी उससे राग न करे यदि कुछ भी विवेक हो तो यह बात करना सरल होता है अन्यथा जो वस्तु हमें न मिले या जिसे छोड़ दें उस वस्तु का राग छोड़ना कठिन होता है। जैसे आपके घर में सब साधन हैं और थोड़ा आप विवेकी हैं तो आपको उन साधनों में आसक्ति न होगी। जो चीज सामने नहीं है रात दिन वही ख्याल में रहेगी और जो चीज सामने है उसमें इतना राग नहीं हो सकता, ऐसी भी स्थितियाँ होती हैं। इससे हमें चाहिए कि ज्ञान बढ़ायें। वस्तु के स्वरूप का निर्णय रखें, सच्चा ज्ञान रखने का यत्न करें, इस ओर हमारा बहुत यत्न होना चाहिए। जब हम ज्ञानदृष्टि से परिपक्व हो जायें तब हमारा त्याग भी हमें लाभ देगा। अज्ञान अवस्था में बाहिर त्याग से लाभ नहीं प्राप्त होता।

धर्म का प्रसाद―अहा, धर्म में तो यह सामर्थ्य है कि वह ऐसी अनुपम निराकुलता को, मुक्तिरूप लक्ष्मी को, मोक्ष को प्रदान करता है। उस धर्म के प्रसाद से यदि लोक की बड़ी-बड़ी विभूतियाँ मिल जायें जिन्हें चक्रवर्ती आदिक भी चाहते हैं तो उनमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। बल्कि यों समझिये कि धर्म का तो बहुत ऊँचा फल है। उस धर्म के साथ जो छोटा-छोटा धर्मानुराग रह रहा है उस राग का फल यह है कि बड़ी-बड़ी विभूतियाँ मिल जाती हैं। धर्म के फल में तो मुक्ति मिलती है और धर्म होने के साथ-साथ जो गलती हमारी रहती है उस गलती के फल में यह विभूति मिलती है यानि धर्म का संबंध पाकर गलती में भी इतना प्रताप पड़ा हुआ है तो फिर धर्म की सामर्थ्य का तो कुछ कहना ही क्या है। तीर्थंकर की लक्ष्मी, समवशरण लक्ष्मी जो तीनों लोकों के द्वारा पूज्य हैं भगवान का ऐश्वर्य उसे भी प्रदान करने वाला यह धर्म है। इस धर्म की हम भावना बनायें, धर्म की ओर अपनी रुचि रखें तो हमारे लिए लोक में कुछ शरण है अन्यथा फुटबाल की तरह यहाँ के वहाँ धक्के खाते ही रहना होगा, जन्म-मरण करते रहना होगा।


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