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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 206

From जैनकोष



मन्येऽसौ लोकपालानां व्याजेनाव्याहतक्रम:।

जीवलोकोपकारार्थं धर्म एव विजृंभित:।।206।।

लोकपालों द्वारा उपकार―इस लोक व्यवस्था में जो बड़ी-बड़ी व्यवस्थाएँ हैं, राज्य अच्छा हो, राजा भी नीतिवान् हो अथवा अपने एक रक्षक अधिकारी का अपनी ओर प्रेम हो आदिक जितने भी ये बड़े पुरुषों के द्वारा होने वाले लोकोपकार हैं उनके रूप से मानो यह धर्म ही निर्विघ्न रूप से फैला हुआ है। राजा प्रजाजनों को निरखकर जो अपना आनंद भाव बनाता है वह राजा का पुण्य है और राजा के उस पुण्य फल में सब प्रजाजन कारण बने हैं और हम प्रजाजन जिस राजा के राज्य में रहकर सुख से धर्म साधन करते हैं, सुखपूर्वक रहते हैं वह हम सबका पुण्यफल है और उसमें कारण राजा है।

जीवों का पारस्परिक उपकार―जीव-जीव परस्पर में उपकारी हैं, कोई यहाँ निर्णय रखे कि मैं दूसरे जीवों को पालता हूँ, मैं करने वाला हूँ, सो यह सोचना गलत है कोई किसी को पालता नहीं है, सबका अपना-अपना पुण्य है जिसके साधन से सब अपनी-अपनी रक्षा पाते हैं। एक मालिक मील चलाता है जिसके हजार नौकर काम करते हैं। उस प्रसंग में मालिक का यह सोचना गलत है कि मैं इन हजार आदमियों को पालता हूँ, इनकी आजीविका लगाता हूँ। यदि इसके बजाय कोई यह कहने लगे कि ये हजार आदमी इस मालिक को पालते हैं और इसकी आजीविका बनाये है तो कुछ बात गलत है क्या? अरे मालिक का निमित्त पाकर वे हजार आदमी पल रहे हैं तो उन हजार नौकरों का निमित्त पाकर यह मालिक भी पल रहा है। पुण्य के फल में एक दूसरे के निमित्त बना करते हैं।

किसी से घृणा करना दुर्गति का प्रभाव―यह भी सोचना गलत होगा कि हम अपने से किसी छोटे को देखकर यह भाव बनाये रहें कि यह मेरे किस काम का है, बेकार है, व्यर्थ का है। मैं इतना काम करता हूँ, लोगों के काम आता हूँ, इसका भी मैं रक्षण करता हूँ यह सोचना भी गलत है। संसार में वास्तव में न कोई छोटा है, न कोई बड़ा है। वह कल छोटा हो सकता है लोक परिवर्तन में अर्थात् मरण होने पर तो एकदम ही पलट हो जाती है। मानो कोई आज राजा है और उसका कर्म अच्छा नहीं है तो मरकर कीड़ा बन जाय, सूकर, गधा बन जाय। जीव वही है जो पहिले हजारों नगरों पर राज्य करता था और 10 ही मिनट बाद क्या स्थिति हो गयी? कीड़ा बनकर रेंग रहा है जिसका कुछ महत्व नहीं है, जो आज कीड़ा है, सूकर स्वान है कहो वह मरकर राजघराने में जन्म ले। तो यहाँ किसे छोटा और किसे बड़ा मानते हो?

छोटों से भी परोपकार की संभावना―दूसरी बात यह है कि कभी ऐसी घटनाएँ होती है कि छोटा भी आपके प्राण बचाने के काम आता है। तो इस संसार में दूसरे जीव की स्थितियों को निरखकर किन्हीं को छोटा समझना अपने को बड़ा समझना और अहंकार करके अधर्म को पुष्ट करना यह विवेक नहीं है। बच्चों की किताबों में एक कथा आयी है कि एक जंगल में सिंह रहा करता था। सिंह जब कुछ सोया हुआ सा आराम करता हुआ पड़ा रहता था तो एक चूहा सिंह के ऊपर से निकल जाये। सिंह की नींद खुले और उसे बड़ा गुस्सा आये, लेकिन वह चूहा तो जल्दी भाग जाय। दसों बार चूहे ने हैरान किया। एक बार सिंह की पकड़ में चूहा आ गया तो पंजे तले दबा हुआ चूहा कह रहा है कि ऐ वनराज ! तुम मुझे छोड़ दो। तो वनराज कहता है कि तूने मुझे बहुत हैरान किया। तू इतना तुच्छ कीट जो किसी के काम नहीं आ सकता और परेशान कर रहा है। तो चूहा बोला वनराज अबकी बार मुझे छोड़ दो, मैं भी कभी तुम्हारी जान बचाने के काम आऊँगा। तो सिंह ने यों ही हँसकर तुच्छ समझकर कि यह हमारी क्या जान बचायेगा छोड़ दिया। एक बार एक शिकारी के जाल में वही शेर फँस गया। अब वह शेर परेशानी में पड़ा हुआ है, थोड़ी ही देर बाद शिकारी आ गया और अब भाले मारकर मार डालेगा, ऐसी स्थिति उस सिंह की थी। उस समय सिंह बड़ा रुदन करता है। हाय ! मैं ऐसा वन का राजा और इस मामूली जाल के फंदे में फँस गया हूँ। इतने में वह चूहा आया और उस सिंह को दु:खी देखकर सिंह से बोला, ऐ वनराज घबरावो मत। हम तुम्हारी जान बचायेंगे। तो चूहे ने उस जाल को कुतर-कुतरकर काट दिया और सिंह वहाँ से निकल गया। कथानक में यह बात सिखायी गई है कि किसी को छोटा मानकर अनादर मत करो।

जीवों में स्वरूपसाम्य के अवलोकन का प्रभाव―प्रथम तो तुम्हें किसी का अनादर करने का अधिकार नहीं है। तुम भी जीव हो, जगत के सभी जीव हैं। जैसा तुम्हारा स्वरूप है वही स्वरूप सब जीवों का है? तुमने आज यह पर्याय पायी है तो यह भी विकार पर्याय है, अन्य जीवों ने जो पर्याय पायी है वह भी विकार पर्याय है, इसमें दूसरा कहाँ कम है? और, पर्यायदृष्टि से यदि कोर्इ हीन परिस्थिति का हो, हीन शरीर का हो तो इस शरीर का क्या विश्वास, आखिर शरीर तो शरीर है। इस ऊपरी भेद से भेद मत मानो सब जीवों के उस सहजस्वरूप को निरखो जिसमें तुम्हें निराकुलता हो। तुम्हें आनंद आये वह काम करना युक्त है। तुम्हारी शांति तब कायम रह सकती है जब तुम समस्त जीवों के उस सहजस्वरूप की निरख कर लो, जो सबमें एक समान है, फिर तुम्हें न राग, न द्वेष, न मोह कोई भी न सतायेगा। मोह कब उत्पन्न होता है? जब जीव के स्वरूप में भेद डाला हो और दृष्टि में तब यह मोह करता है। यह मेरा है। ऐसा मोह अंतर से कब होता है? जब जीव-जीव में भेद डाल दिया जाता है। मेरा तो सब कुछ यही है, इस तरह जब जीव-जीव में भेद डाला जाता है तब मोह उत्पन्न होता है। यदि सब जीवों का स्वरूप एक समान विदित हो जाय तो फिर वहाँ मोह का कहाँ अवकाश है? यह भी वही है। मोह तो वहाँ उत्पन्न होता है जहाँ जीव-जीव में भेद नजर आता है। है तो मेरा यह और तो सब गैर हैं।

भेदव्यवहार में राग―किसी में राग कब उत्पन्न होता है? जब सब जीवों का स्वरूप एक समान है यह दृष्टि में नहीं रहता है। अन्य जीवों से उपेक्षा हुए बिना किसी एक जीव में राग नहीं बनता। यदि किसी दो एक पुरुषों में राग किया जा रहा है तो वहाँ और से उपेक्षा है तब राग किया जा रहा है। और यह बनावट क्यों हुई है? अन्य जीव से उपेक्षा होना और इन एक दो जीवों में राग होना यह स्थिति तब बनती है जब जीव के स्वरूप में भेद डाला जाता है। जहाँ यह प्रकाश हो कि समस्त जीव एक समान स्वरूप के हैं वहाँ अंतरंग से किसी जीव पर रागभाव न उत्पन्न होगा। सब एक समान हैं। जगत के सभी पदार्थ स्वतंत्र हैं, किसी पदार्थ का गुण परिणमन कुछ भी चीज किसी अन्य पदार्थ में नहीं पहुँचती।

अपनी-अपनी चेष्टायें―दो पुरुष यदि एक दूसरे से प्रेम रखते हैं तो वहाँ यह बात नहीं कि एक पुरुष दूसरे से प्रेम रखता है और वह उसमें प्रेम रखता है। कोई किसी से प्रेम कर ही नहीं सकता। किसी का प्रेम किसी दूसरे में पहुँचता ही नहीं है। वहाँ बात यह हो रही है कि वह मनुष्य अपनी कल्पना करके उसके प्रति इस ढंग का विचार करता है कि वह खुद प्रेम से भर जाता है। दूसरा पुरुष भी इस प्रकार का ढंग का विचार करता है कि वह दूसरे का ख्याल बना-बनाकर अपने आपमें अपने प्रेम विकार को कर जाता है। कोई किसी पर प्रेम कर भी सकता है क्या? कितना भी घनिष्ट संबंध हो, माता पुत्र का ही घनिष्ट संबंध क्यों न हो, पर माँ पुत्र पर प्रेम नहीं करती और पुत्र माँ पर प्रेम नहीं करता। अपनी-अपनी कल्पनाओं से एक दूसरे की सूरत निहार-निहारकर खुद अपनी प्रीति के विकार से भाररूप हो जाते हैं। कोई किसी से प्रेम कर ही नहीं सकता। सब न्यारे-न्यारे हैं। अपने-अपने अधिकारी हैं। अपनी करनी अपनी भरनी। सबका जुदा-जुदा समाचार है।

सुख का पुण्य के साथ संबंध―कोई जीव किसी दूसरे का कुछ नहीं करता है। किंतु पुण्य का ऐसा निमित्तनैमित्तिक मेल है कि एक जीव दूसरे जीव के सुख का कारण बन जाता है। सुख कोई किसी को देता नहीं है। सुख तो जीव अपने ही भावों से अपने में पाते हैं। उस भाव के बनने में दूसरे जीव विषयभूत हैं, निमित्त हैं, इस कारण लोकव्यवहार में यों कहा जाता कि एक जीव दूसरे को सुख देता है, दु:ख देता है। वास्तविकता तो यह है कि हम अपनी जैसी भावना बनाते हैं वैसा ही फल प्राप्त करते हैं, वैसा ही हमारा परिणमन होता है। तो यह सब पुण्य का निमित्तनैमित्तिक मेल है। यहाँ कर्तव्य बुद्धि मत अपनाओ। अपने को वैसा ही समझो जैसे सभी जीव हैं सब स्वतंत्र हैं। ऐसी जीवों की समानरूपता निरखकर अपने धर्म भाव को पुष्ट कीजिए। धर्म का यह प्रताप है कि यह जीव इस लोक में भी सुखी रहता है और भविष्य में भी सुखी रहेगा। सुख के सभी साधन धर्म से बनते हैं। समस्त लौकिक सुख ऐश्वर्य समृद्धि होना यह सब धर्म का ही प्रताप है।


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