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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 216

From जैनकोष



नि:शेषं धर्म सामर्थ्य न सम्यग्वक्तुमीश्वर:।

स्फुरद्वक्त्रसहस्रेण भुजगेशोऽपि भूतले।।216।।

धर्म की उत्कृष्टता―धर्म की समस्त सामर्थ्य भली प्रकार से कहने में हजारों मुख वाला भी कोई हो, नागेंद्र भुजगेश वह भी समर्थ नहीं है। अर्थात् धर्म के सामर्थ्य को हजारों मुख वाला कोर्इ हो वह भी नहीं बता सकता हैं। धर्म की महिमा को फिर हम क्या बतायें? धर्म में जो आनंद प्रकट होता है उस आनंद की उपमा देने के लिए इस जगत में कोई सा भी सुख नहीं है। फिर भी धर्म की आराधना में जो सुख प्राप्त होता है उस आनंद को बताने के लिए कुछ न कुछ उद्यम करना ही है। धर्म के प्रताप से कितना आनंद प्रकट होता है? यह समझाने के लिए यह बताया जाता है कि तीन लोक के समस्त जीवों को जो-जो भी आनंद मिला हो, बड़े-बड़े इंद्र महापुरुष सभी जीव जो सुख के विशिष्ट अधिकारी हैं उनको जितना भी सुख मिला हो और भूतकाल में इस अनादि से समस्त काल में जितने भी सुख भोग लिए हों और आगे अनंतकाल तक जितने भी सुख भोग लिये हों, समस्त जीवों के इस जगत के सुख को एकत्रित कर लो उस सुख से भी कई गुना आनंद धर्म से उत्पन्न होता है। इतना कहने पर भी धर्म की आनंद की पूरी बात नहीं आ सकती।

धर्म का महत्त्व―ये जगत के समस्त सुख काल्पनिक हैं, आनंद तो मायारूप नहीं है। वह तो आत्मा का स्वभाववर्तन है। तो जैसे धर्म से उत्पन्न हुए आनंद को बताने में समर्थ न होने पर भी हम किसी भी प्रकार की उपमा से बताया करते हैं ऐसे ही धर्म की महिमा को हम नाना उपमाओं से बता तो रहे हैं किंतु वास्तव में धर्म की महिमा हजारों मुख से भी नहीं कही जा सकती है। जैसे धर्म से उत्पन्न हुआ आनंद जगत के समस्त सुखों की जाति से विलक्षण है और विलक्षण होने के कारण उस सुख से गुने की बात नहीं लगायी जा सकती है। धर्म का आनंद तो अनुपम है, जगत के समस्त सुखों से भी परे है। ऐसे ही धर्म की महिमा बताने के लिए कुछ वर्णन किया जाता है, लौकिक विभूतियाँ न आयें लौकिक समृद्धियाँ परिपूर्ण बनें, ये सब बातें कही जाती हैं किंतु इन महिमाओं से भी परे धर्म की महिमा है। धर्म के प्रसाद से सदा के लिए संसार के संकटों से मुक्ति हो जाती है और स्वाधीन आत्मीय स्वाभाविक अनंत आनंद का भोक्ता रहा करता है। इस महिमा को बनाने में समर्थ कोई भी वचन नहीं है। केवल इस प्रकार का धर्म परिणमन करके इस धर्म की महिमा का अनुभव किया जा सकता है पर कहा नहीं जा सकता है। जैसे किसी समुद्र का पानी सारा बिखर जाने से समुद्र में दिख रहे रत्नों को कोई देख तो सकता है पर गिन नहीं सकता है। अथवा यमुना नदी के निकट में जो रेत पड़ी रहती है उसके सारे कण आँखों से तो दिख रहे हैं पर उन्हें कोई गिन सकता है क्या? ऐसे ही धर्म का आनंद, धर्म की महिमा, धर्म का अनुभव तो किया जा सकता है पर इसका वर्णन हजारों मुख वाला भी कोई हो तो वह भी करने में समर्थ नहीं है। ऐसे अनुपम प्रतापशील धर्म को जानकर हम आप सब इस धर्म की ओर अपनी रुचि करें।


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