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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 223

From जैनकोष



वेष्टित: पवनै: प्रांते महावेगैर्महाबलै:।

त्रिभिस्त्रिभुवनाकीर्णो लोकस्तालतरुस्थिति:।।223।।

लोक का आकार―लोक की रचना, एक सीधे ढंग से समझना चाहें तो ऐसा ख्याल करें कि 7 लड़के बराबरी के एक के पीछे एक खड़ा हो और वे सातों लड़के पैर फैलाये हों और कमर पर हाथ रखें हों तो जो शकल उस समय उस बाल सेना की बनती है वही शकल लोक की है। जैसे मान लो एक लड़का जितना ऊँचा है उस ऊँचाई के 14 भाग करो, मान लो 14 राजू ऊँचा लोक है तो इतनी ही ऊँचाई उन बालकों की है और जितना लंबा बालक है, उससे आधी चौड़ाई उसके पैर फैले हों तो मानो 7 राजू नीचे चौड़ा है, नीचे सब जगह टेहुनी के पास सात-सात राजू हैं, क्योंकि 7 बालक खड़े हों तो सामने से देखने पर यों दिखेगा कि सामने से 7 राजू हैं और ऊपर घटते-घटते एक राजू रह गया, फिर इतना शुरू हुआ। तो कुछ बाहर चलकर 5 राजू हो गया जहाँ तक कि टेहुनी है और ऊपर घटते-घटते एक राजू रह गया। सामने से तो यों दिख रहा है पर बगल से देखो तो सब जगह 7, 7 राजू हैं? तो यह तो है लोक की रचना। इस लोक के अंतिम भाग में क्या है? कैसे यह लोक सधा हुआ है तो उस लोक के अंतिम भाग में सर्वत्र चारों ओर 3 प्रकार की हवायें हैं उन हवाओं का नाम है घनवातवलय, घनोदधिवातवलय, तनुवातवलय। लोक के बिल्कुल अंत में पतली हवा है, फिर मझोली फिर उसके भीतर खूब दृढ़ हवा है, तो इन हवाओं का फैलाव है। हवाएँ 3 प्रकार की है जिनसे यह लोक सधा हुआ है। इसके आकर को हम ताड़ वृक्ष के आकार से तुलना कर सकते हैं। जैसे ताड़ का वृक्ष नीचे तो चौड़ा रहता है फिर घटकर पतला हो जाता है फिर बढ़ता है और फिर अंत में ऊपर घट जाता है। इस प्रकार के आकार वाला यह लोक है।

लोकसमागम के यथार्थ निर्णय से विषाद का अनवकाश―आजकल के लोग जितनी दुनिया मानते हैं वह दुनिया तो यों समझिये कि जैसे लाख कौश की जमीन के बीच एक पानी का बूँद पडा हो उतनी बड़ी हैं, लोक तो इस परिचित दुनिया का अनंत गुना है, उस लोक के प्रत्येक स्थान पर हम आप हो आये हैं, और इस लोक में जितने भी समागम हैं सब समागम कई बार मिल चुके हैं। जगत में जितने जीव हैं वे सब जीव मित्र बन चुके, वे सब जीव शत्रु बन चुके जिसे हम शत्रु के रूप में देखते हैं वह कितने ही बार मित्र रह आया है और जिसे आज मित्र के रूप में देखते हैं वह कितने ही बार हमारा शत्रु रह आया है, और वास्तव में न कोई शत्रु है और न मित्र है, लेकिन समागम सबका अनेक बार हुआ। तो ऐसा जानकर यह ख्याल करो कि वर्तमान में जो भी समागम मिले हैं वे सब भी हमारे कुछ नहीं हैं, ऐसे-ऐसे समागम तो अनेक भवों में मिलते आये हैं, बिछुड़ते आये हैं, जो अपने जीवन में मिले हुए समागमों में राग बनायेगा, स्नेह बढ़ायेगा यह तो निश्चित है कि जो कुछ मिला है उसका वियोग जरूर होगा, किसी के टाले नहीं टल सकता वियोग। पर जब वियोग होगा तो कितना दु:ख उठाना पड़ेगा इस रागी को। तो वियोग के समय में हमें क्लेश न हो ज्यादा, इसका अभ्यास अभी से करना चाहिए। जब तक संयोग है, समागम है तब तक भी भावना बना लें, मेरा कहीं कुछ नहीं है। मेरा तो मात्र मैं आत्मा हूँ, यह है आत्मा की असली कमाई। जो यह भाव भरता रहे कि मेरा मात्र मैं हूँ उसकी असली कमाई है। जिनका समागम हुआ है उनका जब वियोग होगा तो उस भावना के कारण पहिले से जो अभ्यास है ना, इस वजह से दु:ख न होगा।


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