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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 237

From जैनकोष



स्वयं नष्टो जन: कश्चित्कश्चिन्नष्टैश्च नाशित:।

कश्चित्प्रच्यवते मार्गाच्चणडपाषंडशासनै:।।237।।

मार्ग से च्युत होने के कारण―बोधि दुर्लभ भावना में उत्तरोत्तर दुर्लभ बातों की प्राप्ति होने पर भी जो कुछ पद से गिर जाता है उस गिरने में कुछ तो स्वयं ही लोग नष्ट हो जाते हैं तो अपने ही कारण से पतित हो जाते हैं। दूसरे जीवों की कुसंगति न मिलने पर भी अपनी ही कमजोरी से सत्यमार्ग से भ्रष्ट हो जाते हैं और कोई-कोई पुरुष नष्ट और भ्रष्ट हुए दूसरे पुरुषों के द्वारा बरबाद कर दिये जाते हैं। और कोई, लोग तो पाखंडी जन हैं उनके उपदेशे हुए मतों को देखकर, उनकी बातों को सुनकर मार्ग से च्युत हो जाते हैं। उत्तरोत्तर उत्तम बात प्राप्त कर लेने पर भी मनुष्य जो गिर जाता है उसके तीन कारण बताये हैं। किसी के तो तीव्र पाप का उदय होता है अपने आपमें ही विकारों की कल्पनाएँ जगती हैं और अपनी कल्पनाओं से वे स्वयं नष्ट हो जाते हैं। दूसरी बात यह बताई है कि जो लोग ऐसे नष्ट हैं, भ्रष्ट हैं, हीन आचरणी हैं उनकी संगति पाकर उनके वातावरण में रहकर कोई लोग नष्ट हो जाते हैं, अपने इस ऊँचे मार्ग को छोड़ देते हैं। और कोई किसी चमत्कारिक लौकिक प्रभाव वाले पाखंडीजनों के उपदेश को सुनकर उनकी चमत्कारी माया को निरखकर क्षुब्ध होकर नष्ट हो जाते हैं। इससे इन तीन बातों में सावधानी चाहिए ताकि सन्मार्ग से नष्ट न हो सकें।

पतन से बचने के लिए सावधानी―प्रथम तो ज्ञानदृष्टि से, स्वाध्याय आदिक से, सत्संगति से अपने आपको ऐसा सावधान बनाये रखना चाहिए कि स्वयं में कमजोरी न आ सके, भावों का बिगाड़ न आ सके और उत्तरोत्तर भाव सुधार पर ही बढ़ें तो यह प्रथम जो नाश का स्थान है उसे दूर हो जायेंगे। दूसरी सावधानी यह चाहिए कि हम खोटी संगति न करें। जो हीन आचरणी हैं, मोहीजन हैं, जिनका कोर्इ शुद्ध लक्ष्य नहीं है ऐसे जनों की संगति से ही अपने भावों में कमजोरी आती है। और नष्ट हो सकते हैं। तीसरी सावधानी यह चाहिए कि अपना मनोबल अपना निश्चय दृढ़ हो कि कोई लौकिक चमत्कार वाला भी हो तो भी उससे आकर्षित न हों, ये तो सब संसार के खेल हैं, कोई किसी बात में बढ़ गया, लौकिक चमत्कार में बढ़ गया तो उससे आत्मा की सिद्धि नहीं है। मुझे लौकिक चमत्कार न चाहिए, मुझे इस जगत में बड़प्पन न चाहिए। मुझे तो आत्महित चाहिए। यह मेरा आत्मा अपने स्वरूप से जैसा सहज सिद्ध है वही स्वरूप चाहिए। ऐसी अपने शुद्ध लक्ष्य की दृढता बने कि कदाचित् कोर्इ लौकिक चमत्कारक पाखंडी साधुवों अथवा अन्य उपचेष्टावों के भी चक्र में न आ सके। इस प्रकार सावधानीपूर्वक जो अपने रत्नत्रय में बढ़ता है उसको कहीं हानि नहीं हो सकती है।


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