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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 25

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अहो सति जगत्पूज्ये लोकद्वयविशुद्धिदे।

ज्ञानशास्त्रे सुधी: क: स्वमसच्छास्त्रैर्विड: बयेत्।।25।।

असत् शास्त्रों से विडंबित न होने का संदेश―एक तो जीवों के कल्याण की बुद्धि नहीं जगती और कदाचित् कल्याण की बुद्धि जग भी जाय तो यहाँ एक बड़ी विपदा यह है कि धर्म के नाम पर अनेक मजहब, गुरु अनेक प्रकार के मिलते हैं और उनमें भी लोग अपने आपको सबसे उत्तम कहा करते हैं। ऐसी स्थिति में ये कल्याणार्थी किस ओरझुकें, एक यह समस्या सामने आती है, किंतु जिसमें वास्तव में हित की भावना जगी है वह पुरुष इस जाति की कितनी भी समस्याएँ सामने हों, फिर भी अपने आपके पथ का निश्चय कर लेता है, क्योंकि यह ज्ञानस्वरूप तो है ही, इसी कारण जिसमें शांति मिले और जिसमें न मिले, ऐसी बातों का बोध करने में उसे विलंब नहीं लगता।

हितनिर्णय की आत्मनिर्भरता― कोई पुरुष यदि ऐसा संदिग्ध होकर कि जब सभी अपनी-अपनी बात कहा करता है कि मुझे न किसी की बात पर चलना है और जिस काल में जिस जाति में हम उत्पन्न हुए हैं न उनकी कही हुई बात पर चलना है। मैं सबकी बात भूलकर अपने आप सत्य का आग्रह करके निष्पक्ष भाव से लो यह बैठा हूँ विश्राम से, जो सत्पथ होगा, जो प्रभुता होगी वह स्वयं व्यक्त हो तो मुझे मान्य है यहाँ वहाँकी कहना, उस पर चलना हमें अभीष्ट नहीं है। ऐसा निर्णय करके सब ओर से विकल्प त्यागकर, सब मान्यतावों को भूलकर विश्राम से बैठ तो जायें। कल्याणार्थी पुरुष में अपने आप ही सहज अपने आपमें से वे बातें उत्पन्न होने लगेंगी जिस अनुभव से आत्मा का उद्धार होता है, जो उपादेय बातें हैं वे अपने आपमें वह प्राप्त करता है।

वास्तविक ज्ञान और शास्त्र― भैया ! वास्तविक तो वही ज्ञान है, जिसमें मेरी शरण प्राप्त हो, वही ज्ञान शास्त्र है ऐसे इस लोक में व परलोक में विशुद्धि देने वाले ज्ञानशास्त्र के होते हुए भी ऐसा कौन सुधी है जो अपने आपको असत् से, खोटे शास्त्रों से अपनी विडंबना कराये। सभी लोग कहते हैं कि दोष बुरे होते हैं, गुण अच्छे होते हैं। अपने आपमें निरखो तब विदित हो जायेगा कि रागद्वेष मोह अज्ञान ये सभी दोष कहलाते हैं। निष्पक्ष केवल ज्ञानप्रकाश रहना, यह गुण कहलाता है। जिस विधि से दोष दूर हों और गुणों का विकास हो, उसका उपाय जहाँ बताया गया हो वह सत् शास्त्र है। आचार्यदेव यहाँ यह खेद प्रकट कर रहे हैं कि सत् शास्त्रों के होते हुए भी असत् शास्त्रों से अपनी विडंबना बना रहे हैं, यह एक खेद की बात है।

आवश्यक शिक्षा― हमें यह शिक्षा लेनी है कि हमें तो अपने आपमें शांति पाने के लिये ज्ञानदृष्टि की आवश्यकता है और शरीर की स्थिति के लिये कुछ भोजन की आवश्यकता है, इन दो के अतिरिक्त तो सब उद्दंडताएँ हैं। तो जैसे भोजन आवश्यक समझ रहे हैं उससे भी आवश्यक ज्ञानदृष्टि का बनाना है। जो पुरुष ज्ञानी हैं, ज्ञानदृष्टि करके सहज आनंद का अनुभव किया करते हैं वे क्रमश: निकट काल में ही भूख के कारणभूत इस शरीर से भी विमुक्त हो जायेंगे, तो यह दु:ख तो अपने आप दूर हो जायेगा। सदा के लिये संकटों से छूटना है तो यह भोजन दृष्टि काम न करेगी किंतु ज्ञानदृष्टि काम करेगी। इस व्यवहार से इन शरीरादिक से अधिक ज्ञानभावना है। ज्ञानदृष्टि है ऐसा अपने आपमें दृढ़ निर्णय बना लेना चाहिये, ये समागमों में आये हुए कोई लोग, साथ न देंगे। अपने आपका जितना ज्ञानप्रकाश बना है बस वही साथी होगा ये 10 दिन दसलाक्षणी के जैसे व्यवहार में मानते चले आये ये प्रतिवर्ष आते हैं, इन दिनों में हम अपना नवीन-नवीन उत्साह जगायें, कितनी शांति मिली, कितना ज्ञानप्रकाश हुआ, कितना हम परपदार्थों से विरक्त होकर निज तत्त्व में लगे ये सब देखने के ये दिन हैं। हमारा कर्तव्य है कि ज्ञानार्जन में अधिकाधिक लगा करें और ऐसी भावना बनायें जिससे जगत की सर्व वस्तुयें असार दिखें, सुहित की भावना जगे, संसार से उपेक्षा उत्पन्न हो, यही धर्म पालन है।


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