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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 33

From जैनकोष



साक्षाद्वस्तुविचारेवु निकषग्रावसन्निभा:।

विभजंति गुणान् दोषान् धन्या: स्वच्छेन चेतसा।।33।।

यथार्थजनों का धन्यघोष― वे पुरुष धन्य हैं जो अपने निष्पक्ष चित्त से वस्तु के विचारमें कसौटी के समान हैं और गुण दोषों को भिन्न-भिन्न जान लेते हैं। देखिये जैन शास्त्रों के निष्पक्ष प्रेमी ज्ञानी पुरुषों के ज्ञान में इतनी उदारता रहती है कि वे निश्चय पक्ष के सिद्धांत और व्यवहार दोनों की यथार्थता का अपने ज्ञान में स्थान निरखते हैं। क्या यह बात सही नहीं है कि प्रत्येक पदार्थ अपने आपमें पूरा है और अपने आपके सिवाय अन्य समस्त पदार्थों से अत्यंत जुदा है। प्रत्येक पदार्थ अपने आपके परिणमन से अपना परिणमन करता है, यह बात सही है ना? सही है। तब क्या बात सही नहीं है कि कोई पदार्थ अपने स्वभाव के विरुद्ध कुछ परिणमन करे तो वह किसी पर-उपाधि का निमित्त पाकर ही अपना विभाव परिणमन कर पाता, यह भी तो सही है। इस जगत की दृष्टि में निमित्तनैमित्तिक संबंध होने पर भी प्रत्येक पदार्थ अपने आपमें स्वतंत्र होकर परिणमता है। इसी तरह कहा कि प्रत्येक पदार्थ अपने स्वरूप का ही स्वामी होने से अपने आपमें अकेला परिणमन करता है, तो भी निमित्तनैमित्तिक संबंधी की बात भी यथार्थ है और वे परपदार्थ पर-उपाधि का निमित्त पाकर उस प्रकार का विभाव परिणमन करते हैं। दोनों बातें यथार्थ हैं, और दोनों यथार्थ होकर भी किसी वस्तु को किसी परवस्तु की आधीनता न समझना, स्वतंत्रता समझना यह एक ज्ञानशूरता का काम है।

समक्ष घटनाओं में भी तत्त्वदर्शन― भैया ! हजारों घटनायें सामने तो आती हैं। महिलायें रसोई बनाती हैं, आटा सानकर बेलकर तवे पर डाल दिया, सिक गई, रोटी बन गई। क्या यह बात सही नहीं है कि यह रोटी, यह आटा अपने आपमें ही सिकी और रोटी बनी? क्या किसी महिला के हाथ ने रोटी रूप परिणमन कर इस रोटी को सेंका या अपनी परिणति उस रोटी को दी? वह महिला भिन्न है, सिकी हुई वह रोटी भिन्न है। हाथ अपने आपमें है, रोटी अपने आपमें है। महिला ने उस रोटी को नहीं सेंका, वह रोटी तो अपने आपमें ही सिकी। यह बात ठीक है ना? तो क्या यह ठीक नहीं है कि उस महिला का प्रयत्न और निमित्त पाये बिना उस रोटी में यह बात नहीं बन सकती थी। निमित्त पाकर ऐसी स्थिति बनी, यह भी तो सही है, और दोनों बातें यथार्थ होकर उसमें भी यह निरखते रहें कि हाथ का परिणमन हाथ में है, रोटी का परिणमन रोटी में है, दोनों स्वतंत्र पदार्थ अपने आपमें अपने आपके अधिकारी हैं, यह बात दिख रही है ना, यही है ज्ञान शूरता का काम। एक नहीं पचासों घटनायें ले लो, व्यामोह का कहाँ स्थान है?

विवेक कसौटी― वे पुरुष धन्य हैं जो अपने निष्पक्ष चित्त से वस्तु के विचार में कसौटी के समान हैं। जैसे स्वर्ण कसने की कसौटी होती है वह कसौटी मालिक के पास है। मालिक उसे बड़े अच्छे ढंग से रखता है लेकिन वह कसौटी दगा नहीं देती। वह कसौटी मालिक का पक्ष नहीं करती कि सोना ग्राहक को देते समय सोने को कसौटी से कसा जाये तो अपनी यथार्थता से अधिक अपना गुण बता दे, अथवा किसी ग्राहक का सोना ले और कसौटी से कसे तो यथार्थ से हीन गुण की बात वह कसौटी दिखा दे। कसौटी का, न मालिक का पक्ष है, न ग्राहक का पक्ष है, वह तो यथार्थ अपना वर्ण दिखा देगा। ऐसे ही जो सत्पुरुष हैं, ज्ञानी हैं, विरक्त हैं, निष्पक्ष हैं वे तो कसौटी के समान हैं। वे गुण और दोषों का बराबर यथार्थ विचार कर लेते हैं। भिन्न-भिन्न जान लेते हैं कि यह गुण है और यह दोष है।


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