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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 36

From जैनकोष



अयमात्मा महामोहकलंकी येन शुद्धयति।

तदेव स्वहितं धाम तच्च ज्योति: परं मतम्।।36।।

मोह की बेहोशी― आत्मा एक शुद्ध स्वच्छ ज्ञानस्वरूप है। उसमें उपाधिवश रागद्वेष विकार विषयों को मलिनता आई है। यह मलिनता नष्ट हो तो आत्मा वही उज्ज्वल का उज्ज्वल है। इस मोह का कितना दुष्प्रभाव है कि अपनी ही बात है, अपना ही निधान ज्ञानानंद अनंत और वह अपने ही उपयोगमें उपभोग मेंनहीं आता है, कितनी कठिन व्यवस्था है और जिस पर भी यह जीव उस थोड़े से वैभव को पाकर अज्ञानता से ग्रस्त रहा करता है। उसे अपनी सुध नहीं होती है। स्वरूप तो प्रभु की तरह निर्विकार और उज्ज्वल है, पर दशा इसकी आज क्या हो रही है? इसका सही परिचय ज्ञानी पुरुष किया करते हैं। अज्ञानीजन तो जैसी स्थिति में हैं उसी स्थिति में राज़ी रहा करते हैं।

निर्मोहता का कर्तव्य― सबसे महान् पाप महती मलिनता एक मिथ्यात्व की है। मिथ्यात्व का अर्थ है जो जैसी बात नहीं है उसे उस रूप माना जाये। किसी भी पदार्थ का किसी भी अन्य पदार्थ से कुछ नाता नहीं है। फिर भी किसी का किसी ने मान लिया, यही है मिथ्याभाव। ऐसी श्रद्धा हो तो उसे मोह कहते हैं। श्रद्धा गृहस्थों की भी उतनी ही उज्ज्वल रहनी चाहिये जितनी कि साधु संतों के हुआ करती है। श्रद्धा में अंतर न होना चाहिये। हाँ कुछ परिस्थितिवश आचरण में अंतर आया करता है पर श्रद्धा में अंतर न आना चाहिये। कुछ साधु संत आत्मा को सबसे न्यारा ज्ञानानंदस्वरूप मानें और गृहस्थजन कुछ और स्वरूप मानें, ऐसा अंतर श्रद्धा में नहीं हुआ करता है। मिथ्यात्व कषाय का मूल नष्ट हो तो स्वरूप का प्रकाश होता है।

मिथ्यात्व के प्रकार― मिथ्यात्व दो प्रकार के हैं, अगृहीत मिथ्यात्व और गृहीत मिथ्यात्व। अगृहीत मिथ्यात्व तो जीव को बिना सिखाये प्रकृत्या हुआ करता है, जैसे शरीर को माना कि यह मैं हूँ, यह अगृहीत मिथ्यात्व है। अपना नाम, यश हो जाने से अपना हित मानना यह अगृहीत मिथ्यात्व है, और जो सिखाये से देखादेखी मिथ्यात्व लगे वह गृहीत मिथ्यात्व है। जैसे कुदेव, कुशास्त्र, कुगुरु की पूजा करना, यह गृहीत मिथ्यात्व है। जैसे कोई घर में संकट आ गया; या कोई बीमार हो गया तो लोग सिखाते कि अमुक देवी देवताओं पर इस प्रकार की भेंट चढ़ावो अमुक का तावीज वगैरह बांधा, यों दर-दर भटककर रागद्वेषी देवी देवताओं की पूजा मान्यता करना यह गृहीत मिथ्यात्व है। कुछ लोग कल्पना बनाते हैं कि किस-किस प्रकार की भेंट देवी देवताओं के नाम पर लोग किया करते हैं? उन्हें यह श्रद्धा नहीं है कि ये जीव हैं, सभी अपने-अपने कर्मों से उपजे हैं, उन कर्मों के अनुसार सभी जीवों को फल मिलेगा।

मौलिक कर्तव्य― ये परिजन घर में आये हैं, ठीक है जो हमारा कर्तव्य है, वह कर्तव्य हमारा करना ही चाहिये। नीतिपूर्वक व्यवस्था बनाकर अपना गुजारा करे, पर यह रहता है तो ठीक है, जाता है तो ठीक है, प्रत्येक पदार्थ में जो परिणतियाँ हो उनके ज्ञाताद्रष्टा रह सकें, इतनी धीरता गंभीरता अपने आपमें आनी चाहिये। मोह मिथ्यात्व का प्रभाव है इस कारण यह पवित्र आत्मा इस मोह कलंक से दूषित है। इस कलंक को नष्ट करने का कोई उपाय अवश्य करना चाहिये। वह उपाय क्या है इसका ही वर्णन इस ज्ञानार्णव ग्रंथ में बहुत-बहुत प्रकार से आयेगा। करीब 2000 श्लोकों में ज्ञान की ही शिक्षा दी गई है।


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