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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 364

From जैनकोष



विशुद्धबोधपीयूषपानपुण्यीकृताशया: ।स्थिरेतरजगज्जंतुकरुणावारिपार्द्धय: ॥364॥

ज्ञानपवित्रित करुणापूरित योगियों की ध्यानपात्रता –जिनका चित्त निर्मल ज्ञानरूप अमृत के पान से पवित्र है और जो स्थावर, त्रस, जगत के सभी जीवों के प्रति करुणारूपी जल के समुद्र हैं, अर्थात् जो ज्ञानामृत का निरंतर पान किया करते हैं, मैं ज्ञानमात्र हूँ ऐसे ज्ञानमात्र निजतत्त्व की भावना बनाये रहते हैं और जो किसी भी जीव की हिंसा नहीं करते, सब जीवों के स्वरूप की आस्था रखते हैं अतएव सर्वजीवों के प्रति जिनका परम करुणाभाव उमड़ा है ऐसे योगीश्वर ध्यान की सिद्धि के पात्र होते हैं । कम से कम इतना तो निर्णय रखना ही चाहिए कि घर बनाकर, दुकान बनाकर, धन संचय करके, वैभव जोड़कर मुझे कुछ न मिल पायेगा । मेरे को लाभ तो उतना ही है जितना हमारे अपने स्वरूप का ज्ञान हो और उस स्वरूप में ही रमण किया जा सके । क्योंकि, आज यहाँ हैं तो यहाँ के इन चार जीवों से परिचय है, जीवों से क्या – इन मायारूप पर्यायों से परिचय है, और यह भव छोड़कर किसी दूसरी जगह जन्में तो वहाँ दूसरे ढंग की पर्यायों से प्राणियों से परिचय बन जायेगा । यह जीव मुफ्त ही यहाँ ठगाया गया, आगे ठगाया जायेगा, और ठगाये जाने का ही इसका अनादि से सिलसिला चला जा रहा है । इस भव में इन जीवों को ये मेरे हैं ऐसा माना, मरकर यदि गाय बन गए तो बछड़ों को मानेंगे कि ये मेरे हैं । कुत्ता, सूकर बन गए तो वहाँ उन बच्चों को मानेंगे कि यह मेरे हैं । यह जीव मोहवश ऐसी ही ठगोई में चला जा रहा है । जितना अपने आपको ज्ञान और वैराग्य में बसा लें उतना तो आत्मा का हित है, शेष तो सब अहित है क्लेश है, भूल है, भ्रम है । जो योगीश्वर अपने निर्मल ज्ञानस्वभाव में चित्त बनाये रहते हैं, जो त्रस स्थावर सर्व जीवों की करुणा में बसे रहते हैं वे योगीश्वर प्रशंसनीय ध्याता होते हैं ।


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