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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 377

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आत्मन्यात्मप्रचारे कृतसकलवहि:संगसन्न्यासवीर्या,दंतर्ज्योति:प्रकाशाद्विलयगतमहामोहनिद्रातिरेक: ।निर्णीते स्वस्वरूपे स्फुरति जगदिदं यस्य शून्यं जडं वा,तस्य श्रीबोधवाधेर्दिशतु तव शिवं पादपंकेरुहश्री: ॥377॥

ज्ञानलक्ष्मी का अनुपम प्रसाद – जिसके आत्मा में अपने आपके स्वरूप का प्रवर्तन है, अपनी क्रिया, दृष्टि, आकर्षण, आशक्ति कहीं बाह्य की ओर नहीं है, किसी परपदार्थ में प्रवृत्ति नहीं है और बाह्यपरिग्रहों के त्याग से एवं अंतरंग ज्ञानज्योति का प्रकाश होने से जिसका महा मोहरूपी निद्रा का उत्कर्ष नष्ट हो गया है, जिसको स्वरूप का निश्चय होने से यह जगत शून्य की तरह विदित हो रहा है अथवा जड़ की तरह प्रतिभास रहा है ऐसी ज्ञान लक्ष्मी हम सबको मुक्ति प्रदान करे । वास्तविक लक्ष्मी की उपासना से ही इस जीव का उद्धार है । सारे दरिद्रों को यह ज्ञानलक्ष्मी ही निवृत्त करने में समर्थ है । लोक में रूढ़ि है कि धनार्थी लोग जिस किसी भी रूप में लक्ष्मी की कल्पना करे उसकी साधना करते हैं, यह जड़ वैभव क्या किसी की साधना से प्राप्त होता है । यह तो सब पुण्य के उदय से प्राप्त होता है और इस वैभव की बात तो ज्ञानियों की दृष्टि में दु:खरूप है । इन ठाठबाटों से आत्मा का क्या पूरा पड़ सकता है । केवल रुलना, बहकना ये सब स्थितियाँ चलती हैं । वास्तविक लक्ष्मी तो ज्ञान लक्ष्मी है जिसका प्रसाद हो जाय अर्थात् ज्ञान में निर्मलता बन जाय तो सदा के लिए संसार के समस्त संकटों को यह लक्ष्मी दूर कर सकती है । जड़ पदार्थों की वांछा करके अपने आपके अनंत आनंद की निधि को खो देना यह कितनी बड़ी दरिद्रता का काम है । ऐसी दरिद्रता को यह ज्ञानलक्ष्मी नष्ट कर सकती है ।ज्ञानलक्ष्मी की उपासना से प्राप्तव्य शुद्धानंद के लाभ का आर्शीवाद – स्वरूप के निश्चय होने से यह जगत शून्य की तरह मालूम होता है । जगत क्या है ? कुछ नहीं है । जो कुछ दिख रहा है यह सब क्या है ? माया है । इसमें कुछ भी वास्तविकता नहीं है । इसका आधार क्या है ? है यद्यपि द्रव्यस्वभाव मूल में किंतु जो कुछ यह दृश्य बन गया है ये समस्त द्रव्य तो मायारूप हैं, विनाशीक हैं । जैसे केला के पेड़ को छीलते जाइये, पत्ते अलग होते होते जायेंगे, सारभूत कुछ भी तना न मिलेगा । सब पत्तों का समूह है, पत्ते बिखर गए वृक्ष का खात्मा हो गया । तो जैसे केले के पत्ते में सार कुछ नहीं है ऐसे ही इन सब दृश्य समागमों के पंख उखाड़ते जाइये, इनकी चिंतना करते जाइये तो इनमें सारपना क्या है, ये सब भिन्न हैं, जड़ है, इनकी ओर दृष्टि देने से आकुलता ही बढ़ती है, ऐसे ये असार परिग्रह इस ज्ञानी जीव को न कुछ जँचते हैं । ज्ञानी की दृष्टि में प्रतिष्ठा ही नहीं पाते हैं इस कारण यह जगत ज्ञानी जीव को शून्य की तरह मालूम होता है अथवा सब कुछ जड़ नजर आता है । ये जीव हाथ पैर चलाने वाले, यहाँ से वहाँ दौड़ लगाते, अनेक क्रियायें करते फिर भी जो कुछ दिख रहा है, जो कुछ बन रहा है वह सब जड़ ही तो है । एक शुद्ध चैतन्यस्वभाव को दृष्टि में लेकर उसे ही मात्र चेतना समझकर इन समस्त चीजों को केवल जड़ की तरह निहारता है । ऐसी ज्ञान लक्ष्मी का जब उदय होता है तो अंतरंग में एक विशिष्ट आनंद उत्पन्न होता है । वह आनंद प्रकट हो ऐसा अनंत योगीश्वरों ने जगत के प्राणियो को आर्शीवाद दिया है ।




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