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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 381

From जैनकोष



तैरेव हि विशीर्यंते विचित्राणिबलीन्यपि ।दृग्बोधसंयमै: कर्मनिगडानि शरीरिणाम् ॥381॥

रत्नत्रय के बल से कर्मविशरण – सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र इनके द्वारा नाना प्रकार के बलवान कर्मरूपी बेड़ियाँ टूटा करती हैं । निश्चय से कर्म नाम तो आत्मा के द्वारा जो किया जाय, जो विभाव परिणमन किया जाय उसका नाम है और इस कर्म के होने पर जो ज्ञानावरणादिक रूप से कार्माणवर्गणायें परिणम जाती हैं उनका नाम कर्म हुआ व्यवहार से । जब जीव अपने आत्मा का शुद्ध श्रद्धान करता है, जैसा सहजस्वरूप है अपने आप पर की अपेक्षा बिना आत्मपदार्थ का स्वयं जो कुछ स्वभाव है, स्वरूप है उस रूप में अपने आपकी श्रद्धा करता है और उस ही रूप में अपने आपकी जानकारी रखता है और उस ही रूप दृष्टि बनाए रहने का पुरुषार्थ करता है, ऐसा ही ज्ञातादृष्टा रहने की स्थिरता बनाता है तो ऐसे परिणामों के समय विभाव नहीं होते हैं और फिर विभावनामक जो द्रव्य कम बँधे हुए थे वे भी निजीर्ण हो जाते हैं तथा विभाव झड़ जाते हैं, होते ही नहीं । यों द्रव्यकर्म भी झड़ जाते हैं, तब यह बात निर्विवाद सिद्ध होती है कि सम्यक् के दर्शन से सम्यक् के ज्ञान से और सम्यक् के अनुरूप आचरण से बलिष्ठ और विचित्र कर्मों के बंधन टूट जाते हैं और इससे ही मुक्ति प्राप्त होती है । अत: मुक्ति का मार्ग सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र की एकता ही है ।


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