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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 397

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पृथिव्यादिविभेदेन: स्थावरा: पंचधा मता: ।त्रसास्त्वनेकभेदास्ते नानायोनिसमाश्रिता: ॥397॥

स्थावरों के भेद – स्थावर 5 तरह के माने गए हैं – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति । ये 5 प्रकार के स्थावर कोई हमें समझ में आते हैं, प्रकट हैं और कोई सूक्ष्म होने के कारण समझ में नहीं आ पाते । ऐसे भी स्थावर हैं । पत्थर, मिट्टी, कंकढ़, मुरमुर मिट्टी, लोहा, चाँदी, ताँबा, सोना इत्यादि जो खानों में हैं वे सब पृथ्वी हैं, जीव हैं । जल, ओस आदिक ये जलजीव हैं । अग्नि आग बिजली आदिक ये सब अग्निकाय हैं और वायुकाय है हवा । जो पवन चलती है, लगती है वह हवा है । और वनस्पतिकाय मोटेरूप में वनस्पति नाम लेने से वृक्ष, पौधे, घास इनका ही ग्रहण होता है, किंतु वनस्पतिकाय दो प्रकार के कहे गए हैं – एक साधारण वनस्पति, दूसरे प्रत्येक वनस्पति । साधारण वनस्पतिकाय तो निगोद का नाम है । जिसे लोग निगोद कहते हैं वे साधारण वनस्पति हैं । साधारण वनस्पति पकड़ने में खाने में देखने में नहीं आते । जितने छूने, पकड़ने, खाने में आते हैं वे प्रत्येकवनस्पति हैं, लेकिन प्रत्येकवनस्पति में जिसमें साधारण वनस्पति के जीव भी होते उसे कहते हैं सप्रतिष्ठित प्रत्येकवनस्पति । और जिसमें साधारण वनस्पति न हो, निगोद जीव न हो उसे कहते हैं अप्रतिष्ठित प्रत्येकवनस्पति । लोक में ऐसा कहने की रूढ़ि हो गयी कि सप्रतिष्ठित प्रत्येक वनस्पति को सीधा साधारण वनस्पति कह देते हैं । इस रूढ़ि में सप्रतिष्ठित प्रत्येकवनस्पति न खाना चाहिए यह कहने का प्रयोजन है । तो जिस कारण से सप्रतिष्ठित प्रत्येकवनस्पति न खाना चाहिए उसी कारण का भाव रखकर सीधा कह देते कि यह तो साधारण वनस्पति है । जैसे कोई खोटा सोना लायें जिसमें 8 आने भर पीतल ताँबा वगैरह मिला हो तो उसे देखकर लोग कह देते हैं कि यह तो तुम पीतल ले आये । ऐसे ही सप्रतिष्ठित प्रत्येकवनस्पति को साधारण वनस्पति कह देना उसका भी ऐसा ही प्रयोजन है । आलू अरबी लहसुन आदिक ये सब अप्रतिष्ठित प्रत्येकवनस्पति हैं । साग सब्जी के बाजार में पहुंच जावो तो प्राय: ये सभी दुकानदारों के पास डालियों में दो हिस्से तो सप्रतिष्ठित प्रत्येकवनस्पति मिलेगी और एक हिस्सा अप्रतिष्ठित प्रत्येकवनस्पति मिलेगी । जब उनके खाने के प्रेमी हो गए तो उनका उत्पादन भी बढ़ा लिया गया है । ये सब वनस्पतिकाय हैं । जो केवल साधारण वनस्पतिकाय हैं, प्रत्येकवनस्पति के आधार में भी नहीं हैं वे यत्र तत्र सर्वत्र भरे पड़े हैं । यहाँ जो पोल दीखती है वहाँ पर भी निगोद जीव भरे पड़े हैं ।आशय से अहिंसा का निभाव – कोई मनुष्य ऐसा सोचे कि मेरे शरीर के निमित्त से, मेरी चेष्टा के निमित्त से किसी भी जीव को दुःख न हो । यह सोचना तो उसका बहुत ठीक है, ऐसा सोचना चाहिए, किंतु कोई बाहर में निरखकर यह बताये कि देखो इसके कारण दूसरे जीव को क्लेश हुआ है तो क्या इससे पाप बंध हो जायेगा ? उसके आशय की बात है । किसी सज्जन धर्मात्मा को निरखकर धर्म का अनादर करने वाले, मात्सर्य रखने वाले बहुत लोग निंदा करते हैं तो क्या इससे उनकी आत्मा निंद्य हो जाती है ? स्वयं के आशय में अपवित्रता, न होना चाहिए, उससे निर्णय हुआ करता है, नहीं तो बतावो कहाँ बैठोगे ? जहाँ बैठोगे वहीं जीव हैं । पाल्थी मारकर बैठोगे तो पैर के भीतर भी जीव हैं, जमीनपर बैठो तो वहाँ भी तुम्हारे शरीर से जीवों को पीड़ा पहुंच गयी । कहाँ बैठोगे ? आशय की विशुद्धि से अहिंसा की बात चलती है ।त्रसों के भेद – स्थावर जीवों से यह समस्त लोक भरा हुआ है और त्रस भी अनेक भेद वाले हैं । दो इंद्रिय, तीन इंद्रिय, चार इंद्रिय और पंचेंद्रिय, इनकी जल्दी पहिचान करना हो कि ये कितने इंद्रिय जीव हैं तो उसकी मोटी पहिचान यह है कि जिनके पैर न हों और सरक सकें उसमें एक साँप को तो छोड़ दो, उस जैसे जीव को, वह एक अपवादरूप है । बाकी जितने जीव ऐसे मिलेंगे कि पैर नहीं हैं, लंबा रुख है, बिना पैर के जमीन में सरकते रहते हैं, वे जीव दो इंद्रिय मिलेंगे । जिन जीवों के चार से अधिक पैर हों, चलते हों वे तीन इंद्रिय मिलेंगे, जैसे चींटा चींटी सुरसुरी, बिच्छू आदि और जिनके दो से अधिक पैर हों और उड़ते हों वे चार इंद्रिय जीव हैं – जैसे मच्छर, ततैया, टिड्डी, आदि और पंचेंद्रिय जीव स्पष्ट हैं – जिसके कान हों – पशु, पक्षी, मनुष्य आदि । तो ये नाना भेदरूप त्रस अनेक प्रकार की योनियों के आश्रित हैं । इन सब जीवों की पर्यायों का भी सही-सही ज्ञान करना सम्यक्त्व का कारण है । जो कुछ नजर आता है असल में है क्या ? इसमें परमार्थ क्या है, बनावट क्या है, उपाधि क्या है ? सबका सही परिज्ञान हो उससे अंत: अनाकुलता निर्व्याकुलता, ज्ञानप्रकाश, समीचीनता, स्थिरता ये सब बातें बढ़ती हैं, इस कारण सबका जानना आवश्यक है । परोक्षभूत तत्त्व में साधारणतया द्रव्य गुण पर्यायों का स्वरूप जान लेना जरूरी है । यों संसारी जीव त्रस स्थावर के भेद से दो प्रकार के कहे गए हैं ।


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