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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 402

From जैनकोष



तत्र जीवत्यजीवीच्च जीविष्यति सचेतन: ।

यस्मात्तस्माद्बुधै: प्रोक्तो जीवस्तत्त्वविदा वरै: ॥402॥

शब्दव्युत्पत्ति से जीव का लक्षण – उक्त 7 तत्त्वों में जीवतत्त्व की प्रमुखतया जानकारी करना कर्तव्य रहता है क्योंकि वह हम स्वयं हैं । स्वयं के बारे में कोई बात कहे तो लोग उसे बड़ी दिलचस्पी से सुनते हैं । किसी का नाम लेकर उसकी जरासी चर्चा छेड़ दो तो वह उठकर चल देने पर भी झट बैठ जाता है । तो जीवतत्त्व में अपनी ही तो चर्चा है, लेकिन मोह में तो ऐसा है कि पर की चर्चा में तो मन लगेगा और खुद की चर्चा चले तो वहाँ मन नहीं लगता । तो ये सब जीव उल्टा चल रहे हैं । व्यवहार में परिकल्पित अपनी चर्चा चलने लगे तो उसे सुनने में बड़ा मन लगता और वास्तविक अपनी चर्चा चलने लगे तो वहाँ मन नहीं लगता । तो उन 7 तत्त्वों में प्रथम तत्त्व जीवतत्त्व है, जिसका लक्षण – जो सचेतन है, जीता है, जीता था और जीवेगा उसे जीव कहते हैं । जहाँ व्यवहारदृष्टि से प्राणों करके जीवन को जीना चाहते हैं उस दृष्टि से यह जीव जीता था और जी रहा है, ये दो बातें तो सबमें सिद्ध होती हैं । और, जीवेगा यह बात संसारी जीवों में तो सिद्ध होती है किंतु मुक्त जीवों में बात फिट नहीं बैठती । क्योंकि, वहाँ प्राण हैं ही नहीं । प्राणों से रहित केवल शुद्ध ज्ञान, शुद्ध चेतना संपन्न है । तो वहाँ भूत प्रज्ञापननय की अपेक्षा से जीवन माना गया है, वहाँ जीता था अब लगा लें । और, परमार्थ प्राण हैं ज्ञान दर्शन, उसकी दृष्टि से तो सभी जीवों में मुक्त हो अथवा संसारी त्रिकाल जीवन सिद्ध होता है । यों जो जीते थे, जी रहे हैं, जीते रहेंगे उन्हें जीव कहा करते हैं । यों जीव मूल में स्वरूपदृष्टि से सभी एक प्रकार के हैं लेकिन परिणमनभेद से और उपाधि के कारण हुए परिणमन भावों से ये नाना प्रकार के हो गए हैं ।


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