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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 407

From जैनकोष



अभव्यानां स्वभावेन सर्वदा जन्मसंक्रम: ।भव्यानां भाविनी मुक्तिर्नि:शेषदुरितक्षयात् ॥407॥

अभव्यों का प्रकृत्या जन्मसंक्रमण – अभव्य जीवों को स्वभाव से ही सदा काल संसार में जन्म मरण करते रहना है । और भव्य जीवों को समस्त कर्मों के क्षय होने से भावी काल में मुक्ति हो सकती है । यह भव्य का स्वभाव और अभव्य का स्वभाव कहा है । भव्यत्व का एक पारिणामिक भाव है और अभव्यत्व का भी पारिणामिक भाव है । होनी जिसे कहते हैं वह होनी किसी भी विधि से हो, पर होनी के नाम से होनी सामान्य में कोई अपेक्षा नहीं बतायी जा सकती है । जैसे लोग सीधे मिजाज में यों कह देते कि भाई होना था ऐसा हो गया, होनी में अपेक्षा नहीं लगाई जाती है । यद्यपि जो होना है वह अपेक्षा से होता है, पर्याय तो जिस विधि से होती है होती है । उसमें बतावो निमित्त, सब उस योग्य उस प्रकार होता है, पर जो होनी है सामान्य है, भव्यता है, उसमें अपेक्षा नहीं होती केवल होनी की दृष्टि में जब मान्य रहता है, होनी के स्वरूप का दिमाग रखता है उस संबंध में वह अपेक्षा में अपनी उल्झन नहीं रखता । ऐसा होना था सो हो गया । यह बात भव्यत्व और अभव्यत्व के संबंध में है । यद्यपि अभव्य में जो काम होता है मोह होना, रागद्वेष होना यह सब उपादेय निमित्त के योग से चलता है लेकिन अभव्यत्व का जब दिमाग हो, अभव्य की दृष्टि बने तो उस अभव्यता के लिए भी अपेक्षा नहीं लगायी जा सकती और ऐसी अभव्यता के लिए, क्या अभव्य का जीव का जन्म संक्रमण नहीं हो रहा ? हो रहा, वे नये नये जन्म पाते जाते हैं और भव्य जीवों में समस्त कर्मों के विनाश से मुक्तिभाविनी बतायी गई है ।भव्यता की अधिकता – प्रथम तो संतोष की यह बात है कि जगत में अभव्य से अनंत गुणे भव्य हैं पर अभव्य भी अनंत हैं और जिनको आत्मकल्याण में रुचि जगी है उनके तो भव्यत्व नियम से है । अब किसे बता रहे कि हमें आत्मकल्याण में रुचि जगी है वह अपना दिल बतावेंगे कि क्या सचमुच में यह श्रद्धा दृढ़ हो गयी है कि बाह्य पदार्थों से इस आत्मा का भला नहीं है । किसी भी क्षण ऐसी बात जमी हो और पर की उपेक्षा करके अपने आपके निकट रहकर अटपट आनंद जगा हो उसे तो आत्मकल्याण की रुचि कहा ही है । चाहे बाह्य परिस्थितियाँ ऐसी हों कि जिनकी उल्झन बनी रहती है, उपयोग भी भ्रमता है, किंतु किसी भी क्षण आत्मविश्राम मिला हो तो समझिये कि आत्मकल्याण की मेरे अवश्य रुचि है ।तीव्र प्रवृत्ति में भी सम्यक्त्व की संभवता – अप्रत्याख्यानावरण कषाय प्रवृत्ति में ऐसी भी होती है जिसमें ऐसी भी अद्भुत क्रिया हो जाती है कि जिसे लोग बड़ी मूढ़ता भरी चेष्टा समझें और वह 6 माह तक रह सकता है, उसका संस्कार 6 माह से अधिक नहीं चलता है, किंतु अनंतानुबंधी कषाय का संस्कार वर्षों क्या कई भवों तक चलता रहता है । एक यह बात बहुत प्रसिद्ध है कि श्रीरामचंद्र जी लक्ष्मण के मृतक शरीर को लिए 6 माह तक विह्वल रहे और इस प्रसंग में भी श्री रामचंद्र जी को सम्यग्दृष्टि समझा है । तो अब इसमें दो तीन बातों पर अद्भुत प्रकाश आता है एक तो अप्रत्याख्यानावरण कषाय के तीव्र उदय में ऐसी चेष्टा बन जाती है कि जिसे महामूढ़ भी न करे । दूसरी बात परिस्थितियोंवश ऐसी बात बनकर भी यह संभव है कि अंत: प्रत्यय श्रद्धान मेरा सही भी हो । इसकी थाह को हर एक कोई पा नहीं सकता । तीसरी बात यह मिली कि 6 महीनों से अधिक यदि ऐसे संस्कार और चेष्टावों का प्रर्वतन रहे तो वहाँ सम्यक्त्व नहीं माना जा सकता है । 6 माह तक ही कुवर्तन तो मान लिया जायेगा, सो भी सबका नहीं माना जा सकता । यों तो एक दिन भी कोई मोह करे तब भी सम्यक्त्व नहीं है, 6 माह तक अप्रत्याख्यानावरण की चेष्टा रह सकती है सम्यक्त्व के प्रसंग में । अनंतानुबंधी का काल है अनेक भव, अप्रत्याख्यानावरणी का काल है 6 महीनों तक, प्रत्याख्यान का काल है एक पक्ष तक और संज्वलन का काल है अंतर्मुहूर्त तक । इससे अधिक इन कषायों का संस्कार नहीं चलता ।साधुवों के क्रोध की फलरेखाममता – कभी कभी साधुवों के भी ऐसा क्रोध जगेगा कि देखने वाले यही सोचेंगे कि यह तो तीव्र क्रोध रहे हैं ये काहे के साधु । किसी शिष्य को दंड विधान सुनायें – देखो तुमको यह करना होगा । ऐसा यदि कोई श्रावक देख लें तो वह कल्पनायें कर सकता है कि यह तो तीव्र क्रोध करते हैं, पर कैसा ही जँचे – संज्वलन कषाय का संस्कार अंतर्मुर्हूत से अधिक नहीं रहता । कभी किसी पर वैसे ही क्रोध आ जाय तो जैसे जल में रेखा खींच देने के बाद तुरंत मिट जाती है ऐसे ही उनके कभी कषाय जगे तो शीघ्र ही शांत हो जाती है । जैसे दुकान में ऐसा भी हो सकता है ना कि कुछ आय नहीं हो रही, कुछ काम नहीं जम रहा, कुछ नुकसान भी हो रहा और कहो दो चार दिन में ही जो आय सोची जा सकती हो वह हो जाय । बड़े-बड़े काम बिगड़ जाते, किसी एक काम में ही समस्त बिगाड़ की बात निकल आती है और कोई व्यापार होते भी इसी ढंग के हैं कि रोज कुछ आय न हो और कभी 2-4 दिन में ही सारी आय हो जाती है । तो यह भी एक बहुत विचित्र परिणमन है कि ऊपर से अनेक आकुलताएँ जँचती, संताप होते, व्यग्र भी होते और कहो उसने कभी सहज आत्मतत्त्व का अनुभव किया हो तो अंत: गुप्त समझिये ऐसी शांति और निराकुलता रहती है कि जिसके प्रताप से किसी भी दिन, किसी भी क्षण वह आत्मसमृद्धि पा लेगा । लेकिन इन वर्णनों से हमें ऐसे प्रमाद की ओर नहीं जाना है कि सम्यक्त्व का तो बड़ा प्रताप है । इतना राग करने पर भी चिंताएँ करने पर भी सम्यक्त्व रहता है और वह कर्मनिर्जरा कर देता है ऐसा सोचना न चाहिए । यह तो स्वरूप बताया जा रहा है । अपने लिए तो यह सोचना चाहिए कि यदि क्षणमात्र भी प्रमाद करें तो बड़ी कठिनाई से पाया हुआ सम्यक्त्व भी नष्ट हो सकता है । ऐसा समझकर सावधान रहना चाहिए ।


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