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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 410

From जैनकोष



चतुर्दशसमासेषु मार्गणासु गुणेषु च ।ज्ञात्वा संसारिणो जीवा: श्रद्धेया: शुद्धदृष्टिभि: ॥410॥

नाना पर्यायों में रहकर भी जीव की एकत्वनिश्चयगतता – सम्यग्दर्शन के प्रकरण में जीवादिक 7 तत्त्वों का वर्णन चल रहा है उसमें जीवतत्त्व के वर्णन का यह अंतिम श्लोक है । कहते हैं कि जीवतत्त्व को 14 जीव समासों में 14 मार्गणावों में, 14 गुणस्थानों में शुद्ध नय से जान लेना चाहिए । 14 जीव समासों का कितना विस्तार है, कितनी तरह के जीव शरीर उनकी पर्याप्त अपर्याप्त दशा, गुणकृतभेद, शरीरकृत भेद इन सब नाना रूपों में यह जीव रह रहा है और नाना रूप बन रहा है । फिर भी उन नाना रूपों में मूलतत्त्व तो एक समान है इतने विचित्र परिणमन होकर भी इन सब जीवों में जीवत्वभाव पूर्ण समान है और उस दृष्टि से भव्य और अभव्य का भी भेद नहीं है । वह जीव की विशेषता बन गयी, स्वरूप नहीं बना । जीव का स्वरूप भव्य होना या अभव्य होना नहीं है किंतु एक ज्ञायक स्वभाव है । यह जीव 14 जीव समासों में रहकर अपने एकत्व स्वभाव को नहीं छोड़ता । जैसे बहुत से मूँग के दानों में रहकर भी कुरुड़ू मूँग पकायी जाने पर भी अपनी आदत को नहीं छोड़ते, जैसे बहुत बड़े कंकड़ों के बीच रहकर भी हीरा मणि आदिक अपने स्वभाव को नहीं छोड़ते, अथवा अनेक परिणमनों में परिणमकर भी कोई भी पदार्थ मिट्टी आदिक अपनी प्रकृति को नहीं छोड़ते, ऐसे ही समझिये कि अनेक जीवसमासों में अनेक प्रकार के आकारों में अनेक वासनाओं में रहकर भी जीव अपने मूलस्वरूप को नहीं छोड़ता ।नवतत्त्वगत होने पर भी जीव की एकत्वनिश्चयगतता – नाना पर्यायों में रहकर भी जीव अपना एकत्व नहीं छोड़ता, यह तो एक मोटी पर्याय में दिखाया है, पर 9 तत्त्व जीव, अजीव, आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा, मोक्ष, पुण्य, पाप – इन 9 तत्त्वोंरूप परिणमकर भी इन 9 तत्त्वों के बीच में भी यह जीव अपने एकत्वस्वरूप को नहीं छोड़ता । जैसे कोई जीव आत्मा को मानते हैं कोई जीव आत्मा को मना करते हैं, आत्मा कुछ नहीं है यह भी तो एक जानकारी है ना ? यह जानकारी जिसने की वह तो कुछ है ? आत्मा का मना कैसे हो सकता है । जो आत्मा को मना करेगा वह भी आत्मा है और जो आत्मा की सिद्धि करेगा वह भी आत्मा है । शुद्ध पर्यायों में भी प्रर्वतने वाला आत्मा है । आत्मा का जो स्वरूप है वह आत्मा में सतत रहता है अन्यथा निगोद, नारकी, कीड़ा कैसी कैसी पर्यायों में एकता की, लेकिन अब तक हम आप जीव ही हैं, अजीव नहीं बने । तो संसारी जीवों के बहुत से भेद हैं, उन भेदों में जीव को जानना चाहिए और साथ ही शुद्ध दृष्टि लगाकर अपने ही अस्तित्व के कारण जो स्वरूप है उस स्वरूप में जीवतत्त्व को निरखना चाहिए ।


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