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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 415

From जैनकोष



किंत्वेकं पुद्गलद्रव्यं षड्विकल्पं बुधैर्मतम् ।स्थूलस्थूलादिभेदेनसूक्ष्मसूक्ष्मेन च क्रमात् ॥415॥

पुद्गल के छह प्रकार – जो पदार्थ हमारी दृष्टि और व्यवहार में आते हैं उन पदार्थों के संबंध में और इन पदार्थों की जाति वाले अन्य अटपट पदार्थों के संबंध में जब तक यथार्थ निर्णय नहीं होता है तब तक चित्त को समाधान नहीं रहता और निराकुलता पाने की योग्य पात्रता नहीं रहती, इस कारण पुद्गल के विस्तार के संबंध में भी प्रयोजनभूत निर्णय रहना चाहिए । ये पुद्गल द्रव्य 6 प्रकार के हैं, स्थूल-स्थूल – जैसे पृथ्वी पर्वत आदिक मोटे पिंड हैं । दूसरे स्थूल जल दूध आदिक तरल पदार्थ । ये पृथ्वी की तरह पिंडभूत तो नहीं हैं किंतु पकड़ने में आते हैं, स्पर्श इनका होता है, अतएव ये स्थूल हैं । तीसरा है स्थूलसूक्ष्म – जैसे छाया गर्मी चाँदनी जो पकड़ने में भी नहीं आते किंतु दिखते हैं, नजर तो आते हैं कि यह है छाया, यह है आताप । तो जो नेत्रइंद्रिय से ग्रहण में आता है किंतु पकड़ने में नहीं आता वह है स्थूल सूक्ष्म । चौथे नंबर का पुद्गल है सूक्ष्म स्थूल जो नेत्र के सिवाय अन्य इंद्रिय के द्वारा ग्रहण में आते हैं – जैसे शब्द, गंध इनके संबंध में आँखों देखी चीज जैसा, स्थूल जैसा निर्णय नहीं है जिसे देखकर हम कहते हैं किसी पदार्थ के संबंध में इस तरह एक प्रत्यक्ष उदाहरण जैसा सामने रख कर इसको नहीं बताया जा पाता । यह सूक्ष्म स्थूल है । 5वें नंबर का पदार्थ है सूक्ष्म जो कि कर्मवर्गणा हैं । जो अनेक अणुवों के पिंड तो हैं किंतु किसी भी इंद्रिय द्वारा ग्रहण में नहीं आते । और छठे नंबर के हैं सूक्ष्मसूक्ष्म परमाणु जो सूक्ष्म ही हैं पिंडरूप भी नहीं, अपने-अपने एकत्व को लिए हुए प्रकट हैं ।पदार्थों के वर्णन का प्रयोजन वस्तुस्वातंत्र्य की दृष्टि का जागरण – 6 प्रकार के ये पुद्गल पदार्थ हैं । ये सभी चेतना से रहित हैं, मूर्तिक हैं, इनसे आत्मा का संबंध नहीं है, स्वतंत्र पदार्थ हैं, आत्मा का इन पदार्थों में अत्यंताभाव है । ये बाह्यपदार्थ आत्मा का हित नहीं करते हैं, अहित करते हैं । हम ही हित अहित करते समय ऐसा भाव बनाते हैं जिस भाव में ये बाह्यपदार्थ विषयभूत होते हैं, आश्रय होते हैं, वस्तुतः: किन्हीं भी इन बाह्य पुद्गलों से आत्मा में कोई परिणमन नहीं होता । परिणमन किसी एक ध्रुव से उत्पन्न होता है । हमारा जो परिणमन है वह हम ध्रुव से उत्पन्न होगा, अन्य पदार्थों के जो परिणमन हैं वे उन अन्य ध्रुव पदार्थों से उत्पन्न होंगे । किसी पदार्थ से किसी अन्य पदार्थ का परिणमन नहीं बनता । ऐसी वस्तुस्वातंत्र्य की दृष्टि जगने का ही प्रयोजन है इन सब पदार्थों का वर्णन करने में ।


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