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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 419

From जैनकोष



दत्ते स्थितिं प्रपन्नानां जीवादीनामयं स्थितिम् ।अधर्म: सहकारित्वाद्यथा छायाध्ववर्तिनाम् ॥419॥

अधर्म द्रव्य के लक्षण का विवरण ― अधर्मद्रव्य भी चलकर ठहरने वाले जीव और पुद्गल के ठहरने में सहायक कारण है । जैसे गर्मी के दिनों में कोई पथिक धूप में चल रहा है और उसे सड़क के निकट कोई छायावान वृक्ष मिले तो वह वृक्ष उस पथिक के ठहरने में निमित्त बन जाता है, ऐसे ही समस्त जीव पुद्गल के ठहरने में अधर्मद्रव्य निमित्त होता है । छाया ने जबरदस्ती उस पथिक को नहीं बुलाया, नहीं रोका, छाया तो छाया की जगह ही है, किंतु यह पथिक ही स्वयं अपने खेद का अभाव करने के लिए अपने आप उस पेड़ के नीचे पहुँचा और वहाँ ठहर गया । तो जैसे वृक्ष किसी मुसाफिर को जबरदस्ती नहीं रोकता है, जब मर्जी हो तो रुको, न मर्जी हो तो चल दो, लेकिन कोई पुरुष रुकना चाहता है, अपने संताप को दूर करना चाहता है तो उसकी दृष्टि किसी छाया प्राप्त करने की ओर होती है, ऐसे ही समझिये कि अधर्मद्रव्य भी जीवपुद्गल को जबरदस्ती नहीं ठहराता है किंतु चलते हुए जीव पुद्गल ठहरना चाहें तो उनके ठहराने में कारणभूत अधर्मद्रव्य है । यह द्रव्य अत्यंत उदासीन विदित होता है किंतु इस ही शैली से दृष्टि लगावो तो जो अधिक तीव्र प्रेरणा देते हैं वे भी मात्र सहकारी कारण मालूम होते हैं ।


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