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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 421

From जैनकोष



लोकालोकप्रदेशेषु ये भिन्ना अणव: स्थिता: ।परिवर्ताय भावानां मुख्यकाल: स वर्णित: ॥421॥

कालद्रव्य का लक्षण ― लोकाकाश के प्रदेशों में काल के भिन्न-भिन्न द्रव्य हैं, अणु हैं और यह कालद्रव्य अपने स्थान पर आये हुए समस्त द्रव्य गुणपर्यायमय पदार्थों के परिवर्तन के कारणभूत है । जो लोकाकाश के एक-एक प्रदेशपर ठहरे हुए द्रव्य हैं वे तो निश्चय काल हैं और जो समय घड़ी घंटा आदिक रूप से समझ में आने वाला समय है वह है व्यवहारकाल । देखिये – काल की ही क्या बात, समसत परिणमनों का आधारभूत स्त्रोत जो कुछ भी पदार्थ है वह सूक्ष्म है, केवल ज्ञानगम्य है, इसके ये मोटे-मोटे स्कंध नजर आते हैं इन स्कंधों का मूलभूत जो कुछ भी तत्त्व है, अनंतानंत अणु हैं वे सब अणु भी सूक्ष्म हैं । उन अणुवों का भी प्रतिपादन व्यवहार किया कुछ हो नहीं पाता । फिर आत्मा के संबंध में समस्त आत्मा के परिणमनों का स्त्रोतभूत जो एक स्वभाव है उस स्वभाव का भी प्रतिपादन हो नहीं पाता, वह तो अनुभव से ही गम्य है । जैसे भोजन सामाग्री मिश्री आदिक कुछ मिठाईयाँ बनी तो ये केवल बातों से अनुभव में नहीं आते ये तो खाने से ही अनुभव में आ पाते हैं, ऐसे ही इन समस्त पदार्थों का ज्ञान करना है तो ये सब आत्मा से भिन्न हैं, इतने ही प्रयोजन को पुष्ट करने के लिए पदार्थ का ज्ञान विज्ञान बढ़ाने की आवश्यकता होती है, पर मूल प्रयोजन निराकुलता ही है ।ज्ञान का मूल प्रयोजन शांति है । मैं लोक में धनी कहलाऊँ, प्रतिष्ठित हो जाऊँ आदिक कामनाओं के विकल्प अज्ञान हैं । तो जो अंतस्तत्त्व है वह व्यवहारी नहीं हो पाता ।कालद्रव्य की पर्याय और उसके परिज्ञान से आत्मशिक्षा ― लोकाकाश के एक-एक प्रदेश पर जो ठहरा हुआ कालद्रव्य है वह निश्चयकाल है, सर्वसमयों का आधारभूत कालद्रव्य है, यह कालद्रव्य पदार्थों के परिणमन के लिए निमित्त होता है । जैसे आत्मा से रागद्वेषादिक पर्यायें निकलती हैं ऐसे ही इन सब कालाणुवों से समय नामक पर्याय निकलती रहती है, जो एक समय कहा जाता है सेकेंड का असंख्याते लाखवाँ करोड़वाँ हिस्सा वह तो है वास्तविक कालद्रव्य का परिणमन, लेकिन उन समयों को जोड़ जोड़ कर जो हम आप दिन सप्ताह पक्ष महीना वर्ष आदिक बनाते हैं और इस ही व्यवहारकाल के आधार पर व्यवस्था करते हैं वे सब उपचार काल हैं । कालद्रव्य के वास्तविक परिणमन नहीं हैं । वास्तविक परिणमन तो समय है, जैसे दिखने में आने वाले पिंड ये वास्तविक परमार्थ पदार्थ नहीं हैं । परमार्थ पदार्थ तो इन सबमें छुपा हुआ गूढ़ अव्यक्त किंतु ज्ञानियों को ज्ञान द्वारा व्यक्त कोई एक अंतस्तत्त्व है । किसी भी पदार्थ के संबंध में हम जानकारी बनायें उसके मौलिक स्वरूप पर दृष्टि डालकर तो वह दृष्टि ज्ञाता के कल्याण के लिए बनती है । तो सम्यग्दर्शन के प्रकरण में जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल इन 6 द्रव्यों का वर्णन किया गया है । इनका हम सही स्पष्ट बोध करें और सबसे न्यारे अपने आत्मस्वरूप को मानें, उसमें ही संतुष्ट हों तो इसमें ही अपने जन्म की सफलता है, बुद्धि पाई, ज्ञान पाया, उस सबकी सफलता है । हम तब तक भेदविज्ञान की भावना रखें तब तक केवलज्ञानरूप न परिणम जायें ।


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