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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 430

From जैनकोष



मूर्तो व्यंजन पर्यायो वाग्गम्योऽनवश्र: स्थिर: ।सूक्ष्म प्रतिक्षणध्वंसी पर्यायश्चार्थसंज्ञिक: ॥430॥

व्यंजनपर्याय व अर्थपर्याय का विश्लेषण ― पदार्थों में दो प्रकार की पर्याय हैं – एक तो स्थूल परिणमन जो प्रतिपादन में भी आ सकता है, विकल्प विचारने में भी आ सकता है और एक होती है अर्थपर्याय । जो सूक्ष्म परिणमन है और समय समय में नष्ट हो जाने वाला है । जैसे आदमी में व्यंजन पर्याय देखें तो मनुष्य, तिर्यंच, देव नारकी ये सब जो भव हैं ये भव व्यंजन पर्याय हैं, बहुत मोटी पर्याय हैं और बीसों, हजारों वर्षों तक पल्य सागरों पर्यंत रहती हैं । उससे कुछ और सूक्ष्मता की ओर चलें तो जो कोई विकल्परूप परिणमन है, रागद्वेषादिक सुख दुःखादिक अनुभवरूप परिणमन हैं वे इस पौद्गलिक मूर्ति की अपेक्षा तो सूक्ष्म हैं, किंतु स्थूल हैं, कई समयों तक ये पर्यायें रहती हैं, वचन के गोचर हैं, हमारी पकड़ में भी आ जाती हैं । अब ऐसी जो गुणरूप पर्याय हुई, जिसके संबंध में हम वचनों से भी कुछ कह सकें तो वह पर्याय अनेक समयों की पर्याय पर जो हमारा उपयोग चलता रहा उसकी यह देन है । हम आपके उपयोग में एक यह खास कमी है कि हमारा आपका उपयोग एक समय की स्थिति का ज्ञान नहीं कर सकता । अनेक समयों की स्थिति पर ख्याल रखकर यह उपयोग चला करता है । तो इस उपयोग में जो कुछ ख्याल हुआ हम आपको वह व्यंजनपर्याय है, लेकिन युक्ति द्वारा, ज्ञान द्वारा हम यह तो समझ ही सकते हैं कि बहुत समय तक टिकने वाला जो परिणमन है उस परिणमन में मूलत: एक एक समय रहने वाली परिणति है और उन परिणतियों का पुंज एक जो व्यवहाररूप में परिणमन कहा जाता वह स्थूल है और व्यंजनपर्याय है । कहीं कहीं गुणों के परिणमन का नाम अर्थपर्याय कहा है और प्रदेशत्व गुण के उपयोग का नाम व्यंजनपर्याय कहा है । यह सब विविक्षा से और प्रयोजन की दृष्टि से ठीक प्रतीत होता है । व्यंजनपर्याय तो मूर्तिक है, वचनों के द्वारा कहा जा सकता है और यह चिरकाल तक रहने वाला है, किंतु अर्थपर्याय सूक्ष्म है और क्षण क्षण में नष्ट होती है । यह अर्थपर्याय और व्यंजनपर्याय जीव और पुद्गल में होती है । जीव पुद्गल को छोड़कर शेष के चार द्रव्यों में अर्थपर्याय है, व्यंजन पर्याय नहीं मानी गई । इस प्रकार सम्यग्दर्शन के प्रसंग में अजीव तत्त्व का वर्णन किया गया है और साथ ही जीव का भी वर्णन हुआ अब प्रयोजनभूत जो 5 तत्त्व हैं – आस्त्रव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष इन 5 प्रयोजनभूत तत्त्वों से जो विशेष प्राकर्णिक हैं उनका वर्णन किया जा रहा है । तो जीव और अजीव पदार्थ के वर्णन के बाद बंध का वर्णन करते हैं । जीव की बंधपर्याय अनादिकाल से है और वर्तमान में हम बंधपर्याय से ही गुजर रहे हैं, यही दु:खरूप है, इसे छोड़ने की आवश्यकता है, जिससे हम छुटकारा चाहते हैं और अनादिकाल से लगा हुआ चला आ रहा है उसका ज्ञान करना बहुत जरूरी है । अतएव बंधतत्त्व का वर्णन कर रहे हैं ।


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