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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 434

From जैनकोष



परस्परप्रदेशानुप्रवेशो जीवकर्मणो: ।य: संश्र्लेष: स निर्दिष्टो बंधोविध्वबंधनै: ॥434॥

प्रदेशबंध का स्वरूप ― जीव कर्मों के प्रदेश का परस्पर एकक्षेत्रावगाह प्रवेश होने का नाम प्रदेशबंध है । जीव के प्रदेशों का और कार्माणवर्गणा के प्रदेशों का अर्थात् परमाणुओं का जो परस्पर में बंधन होता है उसे प्रदेशबंध कहते हैं । यद्यपि जीव अमूर्त है और उसमें पुद्गल वर्गणायें स्पर्श भी नहीं करतीं किंतु कर्मबंधन की दृष्टि से यह आत्मा मूर्तवत् हो गया है, और अमूर्त भी हो तो भी मलिन होने के कारण इसका परस्पर में निमित्त-नैमित्तिक रूप बंधन है । पुद्गल-पुद्गल की तरह पिंडरूप बंधन नहीं है और वह निमित्त-नैमित्तिक रूप बंधन इस विलक्षणता को लिए हुए है कि जिसमें एक पिंडरूप से एक क्षेत्र में जीव और कर्मों का रहना बने इस प्रकार का बंधन है । बंधन को निरखने की भी दो दृष्टियाँ हैं ― एक निश्चयदृष्टि और एक व्यवहारदृष्टि । निश्चयदृष्टि से आत्मा, आत्मा में ही बंधी है अर्थात् आत्मस्वभाव में विभावों का बंधन हुआ है जिससे स्वभाव का विकास तिरोहित है और विभाव का बंधन लग गया है । जैसे कोई पुरुष किसी मित्र के तीव्र स्नेह में हो तो उस पुरुष को मित्र से बंधन नहीं है किंतु मित्र के प्रति जो मन में विचार उठता है और जो मोहरूप परिणमन चल रहा है, हितकारी मानने की जो दृढ़ता बसी हुई है उस मित्र के स्नेहभाव का ही उस पुरुष को बंधन है । लेकिन उस स्नेह बंधन में विषयभूत मित्र है, इस कारण व्यवहार से यों कहा जाता है कि उस पुरुष को मित्र से बंधन बन गया है । कुछ परिस्थितियाँ ऐसी होती हैं कि खुद-खुद से बँध जाते हैं । तो इसी प्रकार यह आत्मा अपने भावों की दृष्टि से अपने भावों से ही बँधा है और उस समय की परिस्थिति कैसी है इसे बाह्य की दृष्टि से देखा जाये तो जीव कर्म से बँधा है, देह से बँधा है और इतना ही क्यों कहो ― यह मकान से भी बँध गया और परिजनों से भी बंध गया । जब कभी कोई या तो अपने आपको धर्मात्मा सिद्ध करने की या कोई यश लूटने के लिए कहा जा रहा हो या कुछ सही बात भी हो तब कहा जाता है कि भाई मेरे घर में छोटे बालक हैं अथवा स्त्री बहुत भोली है, कुछ कमाने वाली आर्थिक व्यवस्था अधिक ठीक नहीं है इसलिए बंधन पड़ा हुआ है, नहीं तो मैं एक क्षण भी घर में नहीं रहना चाहता हूँ । तो आप वहाँ यह निर्णय करें कि क्या स्त्री का बंधन है, क्या धन का बंधन है, क्या बच्चों का बंधन है । आपके आत्मा में जो उस जाति के विभाव तरंग उठे, आप केवल उस विभाव से ही बँधे । कल के दिन वही स्त्री आपसे प्रतिकूल बर्ताव करने लगे या वह अति स्वछंद बन जाये तो फिर आपको उससे मोह न रह सकेगा । और, कभी ज्यादा कल्पनाएँ उठ जायें तो आप घर छोड़कर भाग जायेंगे, फिर चाहे कुछ भी हो । बंधन सब अपने-अपने विभावों का है, परवस्तु का बंधन नहीं । लौकिक उदाहरण में भी अब यह देखेंगे सर्वत्र कि जो जीव दुःखी हैं, जो बँधे है और परिणामों से दुःखी हैं और परिणामों से ही बँधे हैं । किसी को कोई जीव गुलाम करने वाला नहीं है । सबको अपने आपमें ही ऐसी ही अशक्ति की स्थिति बन रही है कि खुद स्वतंत्र बनकर परतंत्र बन रहे हैं । अथवा यों कहो कि स्वतंत्र से परतंत्र बन रहे हैं । परतंत्र बनने में भी स्वतंत्रता ही काम कर रही है, परवश होकर हम परतंत्र नहीं बन रहे किंतु अपने आपके परिणामों से ही हम परतंत्र बन रहे हैं । तो सब बंधन अपने आपकी ही भूल का है, वस्तु का नहीं है । जब हम अपना सही निर्णय बना लें और अपनी स्वतंत्रता समझ लें, अपनी कल्पना की दृष्टि बन जाये तो वहाँ कोई दूसरा हमें परतंत्र विकल्पक दुःखी बनाने वाला नहीं हो सकता । इस प्रकरण से यह उत्साह लेना चाहिए कि हम अपने स्वतंत्र स्वरूप को निरखें, देह और कर्मों से न्यारे केवल अंतस्तत्त्व को जानें, बस यही हमारे उद्धार का मार्ग है ।


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