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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 460

From जैनकोष



क्षीणतंद्रा जितक्लेशा वीतसंगा: स्थिराशया: ।

तस्यार्थेऽमी तपस्यंति योगिन: कृतनिश्र्चया: ॥460॥प्रज्ञ संतों का स्वरूपानंद लाभ के अर्थ उद्यम ― जिनका प्रमाद नष्ट हो गया है, जिन्होंने क्लेशों को जीता है, जिनका परिग्रह व्यतीत हो गया है, जिनका अभिप्राय स्थिर है ऐसे योगी पुरुष उस ज्ञान की प्राप्ति के लिए तपश्चरण करते हैं । जो पुरुष प्रमादयुक्त हैं, जिनका आत्मकल्याण के लिए उत्साह नहीं जगता, जो क्लेश की स्थिति में भीरु बनते हैं, अधीर हो जाते हैं, जिन्हें किसी परिग्रह में मूर्छा परिणाम है और इन्हीं कारणों से जिनका चित्त स्थिर नहीं है, आत्मकल्याण के लिए जिन्होंने दृढ़ निश्चय नहीं किया है ऐसे पुरुष कभी बाह्य तप भी करें तो किसलिए करते हैं ? इसका एक तो उत्तर आएगा नहीं । एक उत्तर लेना चाहते हो तो यही उत्तर आ सकता है कि अंतस्तत्त्व के प्रकाश के प्रयोजन के अलावा अन्य किन्हीं प्रयोजनों के लिए भी तपश्चरण करते हैं । जिन्होंने अपने आपमें अपना स्वरूप इस प्रकार नहीं निरखा, जिनमें समता परिणाम नहीं जगा, जिनमें यह मैं अमूर्त आत्मा हूँ ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है, एक स्वरूप है अतएव अन्य लोगों से अपरिचित है, अपने आपमें अपने आपको लिए हुए हैं, किसी भी वस्तु के परिणमन से हममें सुधार अथवा बिगाड़ नहीं होता है, ऐसा मैं सबसे न्यारा केवल चैतन्य स्वरूप मात्र अंतस्तत्त्व हूँ, और हमारी इस दृष्टि के अनुकूल जो परिणमन होता है वह तो हितरूप होता है और आत्मदृष्टि तजकर बाह्य पदार्थों में कुछ भी निरखने पर जो एक उद्वेगरूप परिणमन होता है वह मेरी चीज नहीं है । मैं सबसे न्यारा अपरिचित ज्ञानमात्र हूँ इस तरह जिन्होंने अपने आपको नहीं निहारा है इस लोक में अपनी कीर्ति, यश, इज्जत, प्रशंसा को ही महत्व दिया है वे बाह्य यश आदिक की प्राप्ति के लिए ही बड़ी-बड़ी कठिन यातनाएँ सहा करते हैं । सम्यग्ज्ञान की ऐसी महिमा है कि इसके प्रताप से ज्ञानी पुरुषों को अंतरंग में आकुलता नहीं होती । बाहर कुछ भी बीत रही हो पर किसी के परिणमन को निरखकर उन्हें खेद नहीं होता । वे तो प्रसन्न रहा करते हैं । अज्ञानी पुरुष तो किसी के अनुकूल परिणमन में हर्ष और प्रतिकूल परिणमन में विशाद मानता है । सम्यग्दृष्टि पुरुष तो पर में चाहे जो बीते पर वे अपने आपसे चलित नहीं होते । उन्हें कुछ परवाह ही नहीं है, वे खुद अपने आपमें बहुत सावधान रहते हैं । जिसमें अपना हित है उसी पथ से उनकी सहज वृत्ति अंत: चला करती है । सम्यग्ज्ञान के लिए ही ज्ञानी पुरुष समस्त तपश्चरण किया करते हैं ।


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