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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 462

From जैनकोष



यज्जन्मकोटिभि: पापं जयत्यज्ञस्तपोबलात्​ ।

तद्विज्ञानी क्षणार्द्धेन दहत्यतुलविक्रम: ॥462॥

ज्ञानबल से क्षणमात्र में कर्मदहन ― अज्ञानी जीव तपबल से करोड़ों वर्षों में जितने कर्मों को, पापों को दूर करता है उतने कर्मों को पापों को भेदविज्ञानी जीव आधे क्षणभर में ही भस्म कर देता है । यह बात एक संख्या की दृष्टि से कही जाती है । वस्तुत: अज्ञानी के निर्जरा ही नहीं है, लेकिन मंदकषाय से, परोपकार से, तपश्चरण से, क्षमा आदिक गुणों से जितने भी कर्मों को वह गला सका, अलग कर सका फल देकर अथवा कर्मफल मिलकर किसी भी प्रकार, इन पापों का मूल है अज्ञान । परपदार्थों में यह मैं हूँ, यह मेरा है, हितकारी है, सुखदायी है इस प्रकार की जो प्रतीति है यह स्वयं पाप है और नाना पापों का बीजभूत है । इस अज्ञानपाप के होते हुए भी कुछ परिस्थितियाँ ठीक मिलने से जबरदस्ती समता बनाकर दया करके धर्मप्रसंग करके, तपश्चरण करके जितने पापों को अज्ञानी करोड़ों जन्मों दूर करता है उतने पापों को ज्ञानी जीव एक क्षणमात्र निर्लेप शुद्ध निज अंतस्तत्त्व को देखते ही दूर कर लेता है । यहाँ तो सही नियम है अविनाभाव जहाँ निर्दोष अपने आपके सत्त्व के कारण सहज स्वरूप मात्र अपने आपको निरखा तो पाप तो इस निरख के बिना ही चल रहे थे ना ? इस अंतस्तत्त्व के निरखने से पाप शीघ्र ही दूर हो जाते हैं ।

धर्मपालन और उसका परिक्षण ― धर्मपालन के लिए एक शुद्ध दृष्टि बन जाना चाहिए और सभी धार्मिक प्रसंगों में अपने आपको यहाँ से ही कसौटी लगाना चाहिए । हमने धर्म किया अथवा नहीं किया । कहीं बहुत विद्वानों की सभा जुट रही हो, उस सभा आयोजन में धर्मधारण की दृष्टि से हम सम्मिलित हुए जो अंदाज लगायें कि विद्वानों में वचन सुनकर हमने अपने आपके अंतरंग में मुड़ने अथवा अंत:स्वभाव को छूने का यत्न कर पाया कि नहीं, और कर पाया तो कितने रूप में ? उससे हिसाब लगायें कि हमारा जाना सार्थक हुआ, कुछ धर्मपालन किया । किसी भी समारोह विधान में सम्मिलित हुए, योजना बनाया, इसमें यह देखो कि हम अपने आपके स्वभाव के निकट पहुँचने में कितना सफल हो सके हैं, बस वही हमने धर्मपालन का यत्न किया । और, ऐसा काम बन सके, बना हो कभी, फिर उस ही उद्​देश्य के लिए वैसा ही भारी समारोह जुड़ाव जुड़ जाये तो चूँकि लक्ष्य उसका वह है आत्मधर्म की दृष्टि अत: वहाँ भी कुछ अंशों में धर्मपालन कर रहा है क्योंकि लक्ष्य उसका एक बन गया ना । तो ज्ञानी पुरुष की दृष्टि अपने आपके सहजस्वरूप के निरखने के लिए रहती है और जब ऐसा अनुभव करता है तो उतने पाप जितने कि अज्ञानी कोटि जन्म तप तपने से दूर कर सका, एसे इस शुद्ध दृष्टि के प्रताप से क्षणभर में उतने पापों को नष्ट कर लेता है । हम आपका निर्णय होना चाहिए कि हमारा इस जीवन में मात्र एक कर्तव्य है अपने आपको जानें, और उसे ही हितरूप समझकर उसमें ही मग्न होने का यत्न करें ।


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