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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 465

From जैनकोष



यत्र बालश्चरत्यस्मिन्पथि तत्रैव पंडित: ।

बाल: स्वमपि बध्नाति मुचयते तत्त्वविद्​ ध्रुवम्​ ॥465॥

बालाचरण व पंडिताचरण का भेद ― काम तो वह एक-सा है अनेक व्यवहार के कामों में, जिस मार्ग से अज्ञानी चलते हैं उसी मार्ग में ज्ञानी विद्वान भी चल रहे हैं, पर अज्ञानी तो अपने आत्मा को बाँध लेते हैं और ज्ञानी विद्वान बंध से रहित हो जाते हैं । यह ज्ञान का माहात्म्य है । व्यवहार में भी दिखने में मार्ग एकसा है ― वही गृहस्थी है, वही धर्म है, पर यहाँ भी जो ज्ञानी गृहस्थ हैं वे सम्वरनिर्जरा कर रहे हैं और जो अज्ञानी गृहस्थ हैं वे बंध कर रहे हैं । ऐसी ही साधुपन की बात है, वैसा ही उपवास, वैसी ही दीक्षा, ज्ञानी साधु कर रहे और वैसी ही अज्ञानी, पर ज्ञानीसाधु तो बंधरहित होते हैं और अज्ञानी साधु कर्मबंध करते हैं । सबसे दुर्लभ चीज है तत्त्वज्ञान । प्रत्येक पदार्थ स्वतंत्र है, अकेला है, अपने स्वचतुष्टयरूप है, किसी पदार्थ का अन्य पदार्थ पर कुछ परिणमन नहीं है, ऐसा विविक्तस्वरूप दृष्टि में रहना इससे बढ़कर कोई समृद्धि नहीं है, अमीरी वास्तविक यही है । कैसी भी स्थिति हो, ऐसी ज्ञानदृष्टि जिस पुरुष की हो रही हो वही वास्तव में अमीर है, क्योंकि अमीरी का फल है कि निराकुलता रहे । निराकुल तत्त्वज्ञानी ही रह सकता है । जिस किसी बाह्यपदार्थ में मेरे को करने को पड़ा है ऐसा विकल्प बना है वहाँ निराकुलता नहीं होती है ।

बाह्याचारों का धर्ममार्ग में उद्​देश्य ― जो परोपकार के कार्य हैं वे कार्य किसलिए है कि घर के कामों में करने की जो चित्त में धुन रहती है उसे काटने के लिए पर के उपकार करने की धुन बनाई जाती है और परोपकार की धुन से विषयों के कर्तृत्व की धुन का भंग होता है अतएव अच्छा है, किंतु मोक्षमार्ग की दृष्टी से तो एक आत्मध्यान आत्मज्ञान और आत्मा का आचरण ही योग्य है । उसके आगे सारे हेय हैं । जिस मार्ग में अज्ञानी चलता है उसी मार्ग में पंडित अर्थात्​ तत्त्वेत्ता चल रहा है, मगर वह तत्त्वेत्ता बंधरहित होता है और अज्ञानी अपने को कर्मों से बाँध लेता है । जैसा तपश्चरण ज्ञानी पुरुष करता है वैसा ही अज्ञानी करता है, बल्कि ज्ञानी के तो सहज आचरण है । वह क्रियाकांड में सावधानी की तेज निगाह नहीं रखता और अज्ञानी की क्रियाकांड सावधानी की तेज निगाह रहती है तो अज्ञानी साधु की क्रिया निर्दोष दिखती है और ज्ञानी की क्रिया में उतनी निर्दोषता नहीं दिखती, क्योंकि उसका सहज वैराग्य है, सहज क्रिया है लेकिन ज्ञान और अज्ञान का इतना बड़ा अंतर है कि एक ज्ञानी तो मुक्तिमार्ग में चल रहा है और अज्ञानी संसारबंधन में चल रहा है । आत्मा ज्ञानस्वरूप है । अपने आपमें ज्ञान का प्रयोग करें यह तो मेरा विवेक है, बुद्धिमानी है, संसार के संकटों से छुटकारा पा लेने का पुरुषार्थ है और ज्ञानस्वरूप होकर भी खुद का ज्ञान न करे । बाहरी-बाहरी पदार्थों में ही उल्झन रहे, दृष्टि रहे तो उसका फल संसारभ्रमण है ।


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