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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 467

From जैनकोष



अस्मिन्​ संसारकक्षे यमभुजगविषाक्रांतनि:शेषसत्त्वे

क्रोधाद्युत्तुड़्शैले कुटिलगतिसरित्पातसंतानभीमे ।

मोहांधा: संचरंति स्खलनविधुरिता: प्राणिनस्तावदेते

यावद्विज्ञानभानुर्भवभयदमिदं ॥467॥ज्ञानभानु के प्रकाश में सकल उपद्रवों की निवृत्ति ― ये संसार के प्राणी अपने स्वरूप दर्शनरूप उत्तम मार्ग से छूटे हुए हैं और जगत् में गिरते पड़ते, पीड़ित हुए नजर आ रहे हैं । अमुक​ वस्तु का सहारा ले रहे थे वहाँ आपत्ति, अब अमुक्​ का सहारा लेने लगे । यहाँ जन्म हुआ, मरे, फिर पैदा हो गए, जैसे कोई गिरता पड़ता नजर आता है तो इस जीव का गिरना पड़ना बड़ा लंबा चलता है । आज यहाँ जीवन है कल कहो अनगिनते योजन दूर जाकर पैदा हो जाये । इसका गिरना पड़ना बड़ा तेज हो रहा है । यह क्यों हो रहा है ? यों कि इसने अज्ञान का उच्छेद नहीं किया, अज्ञान को बसाये है । जो राग दु:खी कर रहा है उसी राग को और लपेटा है और उस राग के विषयभूत को और लपेटता जाता है । जिससे ही क्लेश है उसका ही अपनाना अज्ञान अवस्था में होता है । कोई बच्चा बार-बार आग में हाथ दे तो लोग उसे अज्ञानी कहते हैं । जिस आग से हाथ जला उसी में हाथ लगाता है ऐसे ही जिस रागद्वेष मोह से इस आत्मप्रभु की बरबादी हो रही है उसी में पगे रहते हैं, यही कारण है कि यह जीव संसाररूपी वन में यहाँ-वहाँ पीड़ित नजर आ रहा है । यह संसार वन बड़ा भयंकर है जिसमें विषधर सर्परूपी पापविष से ये सब प्राणी दबे हुए हैं । इस संसार में क्रोधादिक के बड़े ऊँचे-ऊँचे पर्वत हैं, इस संसार वन में दुर्गतियों की नदियाँ बड़े वेग से बह रही हैं । ऐसे इस गहन वन में संतुष्ट हुए ये प्राणी यत्र-तत्र गिरते पड़ते नजर आ रहे हैं । इसका कारण है कि अज्ञान बसा हुआ है मोह बसा हुआ है । अत्यंत भिन्न परपदार्थों को अपनाने की बुद्धि लगी हुई है ।

एक भीतरी दृष्टि की ही तो बात है । दृष्टि सुधरे तो आनंद ही आनंद है और न सुधरे तो आनंद नहीं है । बतावो कुछ लगता नहीं, न शरीर का कष्ट है, यदि भीतर की अपनी दृष्टि सुधार लें तो शरीर का कोई कष्ट है क्या ? कोई धन खर्च होता है क्या । पर, इतना प्रमाद है मोक्षमार्ग में इतनी अरुचि है कि शुद्धि दृष्टि अंतरंग में नहीं बना सकते हैं । ज्ञानरूपी सूर्य का प्रकाश हो तब किसी भी प्रकार का दु:ख अथवा भय नहीं रहता । एक सम्यग्ज्ञान पर विश्वास करो, ज्ञान की साथी है, सारे क्लेशों को मेरा ज्ञान ही मिटा सकता है ऐसा विश्वास करके एक ज्ञान का ही शरण गहना चाहिए ।

॥ ज्ञानार्णव प्रवचन षष्ठम् भाग समाप्त ॥


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