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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 48

From जैनकोष



न हि कालकलैकापि विवेकविकलाशयै:।

अहो प्रज्ञाधनैर्नेया नृजन्मन्यतिदुर्लभे।।48।।

समय के सदुपयोग का संदेश― हे भव्य जीव, इस दुर्लभ मनुष्यजन्म में विवेक से शून्य रहकर अपने जीवन को व्यर्थ न गमावो, आत्मा का विकास होना दुर्लभ चीज है। मनुष्य जन्म की कोई खास बात नहीं है। मनुष्यजन्म की दुर्लभता इस कारण दुर्लभता कही जाती है कि इस भव में आत्मविकास का अवसर मिलता है। एक आत्मविकास का लक्ष्य त्याग दिया जाय तो फिर और बात क्या रही, तब आत्मविकास ही एक दुर्लभ बात हुई। वर्तमान में भी अन्य जीवों को देखकर नाप तौल भी कर लो। अन्य जीवों की अपेक्षा मनुष्य की बुद्धि का कितना अतिशय है, मनुष्य कितनी बातें सोच लेता है, कितनी ही बातें हम ज्ञान से, कुछ नये-नये मर्मों से जान लेते हैं, इन पशु पक्षियों में तो यह बात नहीं देखी जाती। आत्मविकास का अधिकाधिक अवसर है तो इस मनुष्य भव में है। ज्ञान बढने लगे, अनेक ऋद्धियाँ उत्पन्न हो जायें, समस्त कर्मकलंकों को विनष्ट करके एक इस आनंद को प्राप्त कर लें तो यह सारभूत कर्तव्य है।

दु:खजाल― जब तक ये जन्म-मरण लग रहे हैं तब तक इस जीव को चैन नहीं है, एक दु:ख मिट नहीं पाया कि दूसरा दु:ख आ जाता है। तब यहाँ के समागमों में कुछ सुधार निग्रह-विग्रहविचारना, यह तो बंद करना चाहिये और अपने आपमें सम्यग्ज्ञान के निवास कराने की बात सोचना चाहिये। कोई भी स्थिति हो सर्वस्थितियों में सुख मिलता है ज्ञान से। जब कभी कोई पुरुष भोग भी भोगता हो, इंद्रिय के विषयों को भोगता हो, वहाँ पर भी जो सुख मिलता है वह एक कल्पना का सुख है। बाह्य पदार्थों का क्या सुख है? हम ज्ञान को ही करते हैं ज्ञान को ही भोगते हैं, ज्ञान का ही आनंद लेते हैं। यह बात सब स्थानों में सही है, किंतु इस पर श्रद्धा नहीं हैं सो ऐसा करने की श्रद्धा न होने के कारण सब बातें उल्टी-उल्टी पड़ती जाती हैं। इसी बात पर हम कुछ डटें तो सही। एक यही अपने जीवन में मान लें कि मैं अपने ज्ञान को करता हूँ, अपने ज्ञान को ही भोगता हूँ, चाहे किस ही रूप भोगूँ? किसी बाह्यपदार्थ का न मैं कर्ता हूँ और न भोक्ता हूँ, किसी बाह्यपदार्थ से कुछ भी मेरा संबंध नहीं है ऐसी दृढ़ता से रह जाय तो शांति का मार्ग स्पष्ट बन गया।

अंतर्ज्ञान का उपयोग― श्रद्धा में कायरता करना, यह तो अति अयोग्य बात है। जो जैसा है वैसा ज्ञान में आ जाय, इसमें कोई कष्ट नहीं है बल्कि यह तो आत्मा की प्रगति होना है। जो जैसा है तैसा ही ज्ञान में आये, और ऐसा होना स्वाभाविक बात है लेकिन एक मोह पिशाच ऐसा अंतर्निविष्ट कुभाव है जिसके कारण अपने ही घर में बड़ा अँधेरा छाया है, माना कि कर्मों का आक्रमण है, बड़ा क्लेश है, सब कुछ है, पर सब कुछ होते हुए भी हम अपने भीतर ही भीतर अपने आपमें अपने आपको ढूँढ़ लें, उसका यथार्थ ज्ञान कर लें तो कुछ आपत्ति है क्या ऐसा काम करने में? अरे एक निज का काम कर लेने में क्या कष्ट है? कौनसी आधीनता है? सारा क्लेश मोह रागद्वेष का है। सब घटनाएँ कह डालो, सुन लो, सर्वत्र यही बात है। केवल क्लेश हे तो मोह राग और द्वेष का है। जिस विधि से ये विभाव मिटें उस विधि में ही अपनी भलाई है।

गृहस्थी की सफलता― गृहस्थी मिली है तो इसलिये कि मिलजुलकर खुद धर्म में आगे बढ़ें और परिवार के लोग भी धर्म में आगे बढ़ें। संसार के सुख, साधन ये तो सब होते ही हैं उदयानुकूल आते ही हैं। प्रधान दृष्टि, प्रधान कर्तव्य तो इतना होना योग्य है परिवार में कि चलो हम भी धर्म में बढ़ें और ये स्त्री पुत्रादिक ये भी धर्म का विकास पायें, ऐसा यदि कार्य होता है घर में तो आपका वह परिवार आदर्श है, आप घर में भी रहें किंतु ज्ञान में लगें, शुद्ध ज्ञानप्रकाश जगे, इससे बढ़कर और गृहस्थ सीमा में वास्तविक सुख कुछ नहीं कहा जा सकता। बाकी बातें तो होती ही हैं। धर्म में न लगें तो भी हो रही हैं, बल्कि धर्म में लगने वाले के ये सुख और विशेषता से, अतिशय से हुआ करते हैं। धर्म हमेशा आनंद ही देता है। धर्म तो कष्ट देता ही नहीं है। पर कदाचित् धर्म के बजाय कोई पाप कार्य करें और उसमें ही धर्म की मुद्रा बनायें तो उसमें कष्ट है और इस ही नीति से धर्म का अपवाद है। यह पाप इतना चालाक है कि करता यह तो सब कुछ अनर्थ है किंतु धर्म का नाम लपेट देता है और धर्म को अपमानित कर देता है। लोगों की श्रद्धा धर्म से हटती है। अरे धर्म करने वाले तो ऐसा-ऐसा किया करते हैं।

पाप की चालाकी― एक किसान के तीन बैल थे। एक बैल को वह रोज अपने घर के आँगन में बाँध जाया करता था और दो बैल खेती करने के लिये ले जाया करता था। आँगन के पास एक दीवाल में एकअल्मारी थी, उसमें वह अपना खाना रखा करता था। रोज एक बंदर आये अल्मारी खोलकर दाल रोटी खाये और जो दाल वगैरह बच जाय उसे बैल के मुख पर पोत दे। बैल के मुख पर रोज दाल पुती हुई किसान देखे तो समझ जाय कि हमारा खाना इस बैल ने खा डाला है। यों रोज-रोज उस बैल को वह पीटता था। पड़ौसियों ने समझाया कि इस बैल को तुम क्यों पीटते हो? अरे यह कैसे अल्मारी खोलकर तुम्हारा खाना खा डालेगा और फिर अल्मारी बंद कर देगा। तुम तो छुपकर देखो कि ऐसा कौन करता है? उसने छुपकर देखा कि एक बंदर आया और उसने ये सारी क्रियायें की। उसने उस बंदर को पकड़कर पीटा, या कुछ भी किया समझ लो, पर प्रयोजन यह है कि जैसे क्रियायें तो सारी वह चालाक बंदर करता था और नाम लगता था बैल का, ऐसे ही सारे उपद्रव तो पाप किया करता है पर यह पाप धर्म की ओट में धर्म का नाम लगाकर अपवाद किया करता है। तो इससे कहीं धर्म अधर्म तो न बन जायेगा? जितने अपवाद हैं, जितने क्लेश हैं वे सब पाप के हैं, धर्म के नहीं हैं। धर्म तो सदा सुख शांति का ही बरसाने वाला है।

धर्म का स्वरूप― धर्म का लक्षण समंतभद्र स्वामी ने कहा है कि जो संसार के दु:खों से छुटाकर जीवों को सुख में पहुँचा देता है उसे धर्म कहते हैं। यह फलित अर्थ हुआ। जो धर्म करेगा वह दु:खों से छूटकर सुख में पहुँच जायेगा। शब्दार्थ क्या है? ‘‘पदार्थ: आत्मनि यं स्वभावं धत्ते स धर्म:।’’ पदार्थ अपने आपमें जो स्वभाव को धारण करता है उस स्वभाव का नाम है धर्म। अपने आपमें धर्म की खोज तो कीजिये, अर्थात् अपने स्वभाव की खोज कीजिये। पदार्थ का स्वभाव क्या है? पदार्थ का स्वभाव पदार्थ में निरंतर रहता है। उसका स्वभाव क्या क्रोध है? क्या मान, माया, लोभ इत्यादि हैं? ये कषायें बदल बदलकर चलती हैं, इनमें कोई भी क्रिया निरंतर नहीं रह पाती। तब जानो कि कषाय करना पदार्थ का स्वभाव नहीं है किंतु ज्ञान सदैव होता रहता है। क्रोध कर रहा हो वहाँ भी ज्ञान है, मान, कपट अथवा लोभ वगैरह कर रहा हो वहाँ भी ज्ञान है। ज्ञान कभीसाथ नहीं छोड़ता। ज्ञान स्वभाव है, ज्ञान धर्म है।

क्रोध के अनर्थ व आत्मधर्म― कषायें धर्म नहीं हैं, प्रत्युत कषायें आकुलता को ही उत्पन्न करती हैं। क्रोध होने पर कोई मनुष्य चैन में नहीं रहता है क्या? क्रोधी तो अति दुर्बल होता है, क्रोध में आकर यदि यह कुछ किसी को आज्ञा देता है डाट डपट दिखाता है तो उसकी आवाज साफ नहीं निकलती। घर में ही देख लो जब किसी बच्चे से आप बड़े जोर से बोलेंगे, डाटेंगे तो जो भी आप बोलेंगे वह बोल फसफस निकलेगा। तो क्रोध अंतरंग में जिसका उमड़ा उसकी सारी मशीन खराब हो गई। अब बोलेगा भी तो साफ आवाज न आयेगी। वह बच्चा समझ ही न पायेगा कि मुझे क्या कह रहे हैं? बच्चा आज्ञा मानेगा नहीं, तो यह और भी क्रोध करेगा। क्रोध में किसने चैन पाया है? क्रोध का ही तो परिणाम है कि द्वीपायन मुनि ने अपना भी विनाश किया और नगरी का भी विनाश किया। आप घी का डबला हाथ में लिये हों और आ जाय क्रोध तो आपको नुकसान की बात चित्त में न आयेगी। आप उस डबले को पटक देंगे। अरे नुकसान किसका हुआ? खुद का ही तो हुआ? क्रोधी आदमी अपना नुकसान भी नहीं सोचता। क्रोध से चैन कहाँहै? चैन मिलेगी धर्म में, ज्ञानदृष्टि में।

मान का अनर्थ― अब मान की बात देखो। घमंड में आकर कितने अनर्थ हो जाते हैं, घमंड करने वाला अपने आपको स्वाहा कर डालता हैऔर दूसरों को भी हानि पहुँचाने मेंकारण बनता है। उस मानी को कोई जबरदस्त मानी मिल जाय तो फिर वह सारी कसर निकाल देता है। आपको एक हठी स्त्री की कथा सुनायी थी। अब चलो उसकी दूसरी भी बात सुनो। उसके मन में आया कि पति के मूँछ मुड़ायें सो पेट दर्द का बहाना किया और अपने पति से कह दिया कि जो हमसे प्रेम करता है वह यदि अपनी मूँछ मुड़ायें तो हम ठीक होंगी नहीं तो मर जायेंगी।पहिले जमाने में मूंछ मुड़ाना बुरा समझा जाता था। पति ने मूंछ मुंडा ली।अब यह स्त्री प्रात: चक्की पीसते समय यह गाना गाय ‘‘ अपनी टेक रखाई, पति की मूँछ मुड़ाई।’’ पति यह सुनकर बड़ा पछताया। अब उसको छकाने के लिये स्वसुराल को खबर कर दी कि तुम्हारी लड़की बहुत बीमार है जो भी इससे प्यार करते हों वे सभी अपने मूँछ तथा सिर घुटाकर सवेरा होते ही दर्शन दें तो बचेगी, नहीं मर जायेगी, ऐसा एक देव ने स्वप्न में बताया है। स्वसुराल के कुटुंब ने ऐसा ही किया। जिस समय चकिया पीसते हुए वह यह गा रही थी कि ‘ अपनी टेक रखाई, पति की मूँछ मुड़ाई।’ उसी समय स्वसुराल के सभी लोग माँ, बाप, भाई, बहिन, बुवा सभी अपने-अपने मूँछ तथा सिर वगैरह मुड़ाकर पहुँच गये। स्त्री गाती है ‘ अपनी टेक रखाई, पति की मूँछ मुड़ाई।’ पति कहता है―‘‘पीछे देख लुगाई। मुंडन की पल्टन आई।’’ तो मानी का जब किसी जबरदस्त से मुकाबला पड़ता है तब उसका होश ठिकाने आता है।

लोभ का दाह― लोभ तो महान दाह उत्पन्न करता है, लोभी पुरुष लोभ के कारण भीतर ही भीतर छल कपट की बात सोच-सोचकर दु:खी होता जाता है। लोभ में जल-जलकर अपने को महा संक्लिष्ट बना देना यह भली बात नहीं है। यदि कषायें होती हैं तो समझो कि ये आफत है, किसी तरह इनसे निपट जायें और अपने आनंद का स्रोतभूत जो निज आत्मतत्त्व है उसकी दृष्टि बने, ऐसा भाव और ऐसा यत्न अपना बनाये रहना चाहिये।यहाँ धर्म धारण करने के लिये प्रेरणा की है। बुद्धिमान जनों को इन विषयकषायों की अभिलाषा को त्यागकर एक धर्ममय ही अपना उपयोग बनाये रहने का यत्न करना चाहिये।

धर्मपालक विचार― देखो धर्मपालन मूल से इन विचारों से हुआ करता है―यह मैं आत्मा सर्वविभाव देह रागद्वेषादिक भाव इन सबसे जुदा केवल ज्ञानप्रकाशमात्र हूँ। मेरे ही सत्त्व के कारण मेरा जो स्वरूप रह सकता है उस स्वरूपमात्र मैं हूँ, ऐसी अपने स्वरूप की भावना बने तो वहाँ धर्मपालन होता है। बाहरी जितनी भी व्यवहार धर्म की क्रियायें की जाती हैं उन सबका मूल में एक यही उद्देश्य रहता है। ज्ञानी संतपुरुषों की सब झुकाव की कला की बात है। स्वयं की ओरमुझे वहाँ आनंद बरसता है, पर की ओर उपयोग जायेगा तो उससे दाह ही उत्पन्न हुआ करती है। जरासी दृष्टि के फेर में कितना अंतर हो जाता है? हम सत्संग करके, ज्ञानार्जन करके गुरुसेवा, प्रभु भक्ति अनेकानेक उपायों से हम अपने को ऐसा बनायें कि भीतर हम अपने एकत्व की ओर झुके रहें, बाह्यपदार्थों में हमारी तृष्णा न जगे, इस भावमय यत्न मेंधर्म का पालन है और इस धर्मपालन का नियम से फल मिलता है।


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