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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 53

From जैनकोष



समत्वं भज भूतेषु निर्ममत्वं विचिंतय।

अपाकृत्य मन:शल्यं भावशुद्धिं समाश्रय।।53।।

समता का उपदेश―हे आत्मन् ! तू समस्त जीवों को एकसा जान, अन्य जीवों के ममत्व को छोड़करनिर्ममत्व का चिंतन कर। मन की शल्य को दूर करके भावशुद्धि का आश्रय कर। इस श्लोक में 4 बातों पर प्रकाश डाला है, पहिली बात यह कही है कि सर्वप्राणियों को तू समता से भज, इस समता की दो पद्धति हैं। प्रथम तो सर्वप्राणियों का स्वरूप है उसको दृष्टि में लो और सर्वजीवों को समान समझो। प्रत्येक जीव ज्ञानानंद पुंज एक स्वरूप है, ऐसी उनमें समता की दृष्टि करे। और दूसरी पद्धति यों है कि सर्व प्राणियों में तू रागद्वेष न करके समता परिणाम को कर। इन दोनों बातों का परस्पर में संबंध है। हम अपने में रागद्वेष न करके समता परिणाम को रखना चाहें तो हमारे लिये यह आवश्यक है कि हम सर्व जीवों का वह यथार्थ और समान स्वरूप समझ लें।

समता का प्रयोग― भैया ! जब किसी मनुष्य पर यह जोर दिया जाता है― अरे क्यों इतने राग में पड़ रहे हो? छोड़ो, इतना क्यों तुम अपराध और मोह कर रहे हो तो कहना तो सरल है और वह विपत्तियों से ऊब कर छोड़ना भी चाहे तो उसको भी छोड़ना कठिन है। यह छूटेगा तभी जब हम जिन जीवों में रागद्वेष मोह किया करते हैं, उन जीवों का परमार्थस्वरूप जान लें तब रागद्वेष मोह छूटने की बात बनेगी। इस परमार्थ ज्ञान के होते ही ये सब निवृत्त होने लगते हैं। इसलिये इस अंश का हम दो प्रकार से दर्शन करें। सर्वप्राणियों में वह स्वरूप निरखो जो स्वरूप सबमें एक समान है। जैसे पारिणामिक भाव की अपेक्षा किसी भी जीव में परस्पर असमानता नहीं है, ऐसे शुद्ध अनादि अनंत चित्स्वभाव रूप हम सब प्राणियों को निर्णय में लें तो ये रागद्वेष मोह दूर होंगे, ममता दूर होगी।

मोह किससे―भैया ! घर में बसने वाले जिन जीवों में गहरा राग चल रहा है और जिस राग के कारण निरंतर बेचैनी चल रही है उन जीवों के प्रति यह दृष्टि दें कि ये जो घर में बसने वाले लोग हैं, ये तीन प्रकार के पदार्थों के पिंड हैं। देख देखकर बोलिये, सोच सोचकर बोलिये। जीव और शरीरवर्गणायें और कार्माणवर्गणायें यों कुछ मुख्यता से कह रहे हैं। इन तीन बातों के ये पिंड हैं। इनमें से हमारा संबंध तो न कार्माणवर्गणाओं से है, न शरीर वर्गणाओं से है। अब रह गया वह एक जीव तो उस जीव से भी कोई क्या कुछ संबंध बनाये हुए है, वह जीव जैसा है वैसा विदित हो तो उससे कुछ क्या व्यवहार चलता है? उस जीव में भी परमार्थस्वरूप निरखें तो वहाँ फिर मोह नहीं ठहर सकता। अत: सर्व प्राणियों में से ऐसे समान स्वरूप की दृष्टि करें और उनमें समता धारण करें, किसी से राग न हो, किसी से विरोध न हो, केवल एक ज्ञातृत्व रहे, ऐसी समता को प्राप्त करें और अपने आपको निर्ममत्व विचारें।

स्वरूप की संभाल― मेरे में विभाव नहीं है, ये जड़ पौद्गलिक विभाव मेरे से अत्यंत भिन्न हैं, उनसे मैं रहित हूँ जिनका कि वर्तमान में बंधन है। स्वरूप को संभालें। मैं इस देह से भी रहित हूँ और अंत: पूर्ण हूँ। मोहादिक विभाव ये भी मेरे स्वभाव की कला से मेरे ही केवल सत्त्व के कारण सहज विकसित नहीं हुए हैं। ये परभाव हैं, परपदार्थों का निमित्त पाकर ये उत्पन्न हुए हैं। इन मिथ्यात्व आदिक भावों से भी मैं रहित हूँ, ऐसे द्रव्यकर्म, भावकर्म से रहित केवल एक चित्प्रकाशमात्र अपने आपका चिंतवन करो।

मन की शल्य का परिहार― तीसरी बात इस श्लोक में कही गयी है कि मन के शल्य को निकाल दो। शल्य कहो या क्लेश कहो। मन के क्लेश को दूर करो। जो क्लेश दृढता से चिरकाल तक वासना पूर्वक बना रहता है उस क्लेश को मिथ्या कहते हैं। मन की शल्यें कौन नहीं जानता है? शल्यों के कारण यह जीव कायर बन जाता है, अपने अंत:स्वरूप को खो देता है, प्रसन्नता नहीं रहती है। वह शल्य किसी बाह्यपदार्थ में ममता जगाने से होती है। वह शल्य किन्हीं जीवों के परस्पर के व्यवहार में एक मिथ्या आचरण करने से हो जाती है। किसी से कुछ कहा, किसी से कुछ कहा, यों छल-कपट की बात की अथवा बुरा व्यवहार किया, उससे भी शल्य बन जाती है, और अपने मन में ऐसा मनसूबा बाँधना अमुक पदार्थ मिले यों इस आशा से भी शल्य बन जाती है। हे आत्मन् ! यदि शांति चाहता है तो अपने मन से इन शल्यों को दूर कर। इन शल्यों को दूर करने में कोई विकट काम नहीं करना है, किंतु चित्त में एक साहस बनाकर निर्णय बना लेना, सर्वपदार्थ जुदे हैं, उनके संचय से उनके ग्रहण से, उनको उपयोग में लेने से यहाँ मेरी कुछ सिद्धि नहीं है। मैं सदा से अकेला ही था, अब भी अकेला हूँ, भविष्य में भी सदैव अकेला रहूँगा, ऐसा अपने मन में निर्णय बनाने से कितनी ही शल्य समाप्त हो जाती हैं। मन की शल्यों को तू दूर कर।

भावशुद्धि का अनुरोध― चौथी बात कही है कि अपने भावों की शुद्धि का आश्रय कर। भावशुद्धि नाम है रागद्वेष न रहने का। किसी का भी प्रसंग में चाहे गृह का प्रसंग हो, चाहे समाज का प्रसंग हो, चाहे ज्ञानचर्चा का प्रसंग हो, किसी भी काम में पक्ष न हो। उसमें अपने आपको प्रसन्न रखने के लिये जैसा जो विकल्प बनाया उस विकल्प का हठ न करना इससे भावशुद्धि प्रकट होती है। हे आत्मन् ! तू इन चार सद्उपायों का सेवन कर। सबमें समता धारण कर। अपने को निर्मोह विचार। मन के शल्य को दूर कर और अपने भावों की शुद्धि का आश्रय कर।


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