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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 56

From जैनकोष



अनित्याद्या: प्रशस्यंते द्वादशैता मुमुक्षुभि:।

या मुक्तिसौधसोपानराजयोऽत्यंतबंधुरा:।।56।।

भावनाओं की प्रशंसा― मुमुक्षु सत्पुरुषों ने अनित्य, अशरण, संसार, एकत्व, अन्यत्व, अशुचि, आश्रव, संवर, निर्जरा, लोक, बोधिदुर्लभ, धर्मचिंतन―इन बारह भावनाओं की प्रशंसा की है। ये बारह भावनायें मुक्तिरूपी महल पर चढ़ने के लिये सीढ़ियों के समान हैं। जैसे लोग सीढ़ियों का सहारा लेकर महल के ऊपर चले जाते हैं इसी प्रकार भव्यजन इन अनित्यादिक बारह भावनाओं के भाने का सहारा लेकर मुक्तिमहल में पहुँच जाते हैं। इस ज्ञानार्णव ग्रंथ में मोक्षमार्ग में सहायक ध्यान का प्रतिपादन मुख्यरूप से है। उस ध्यान में साधक 12 भावनायें हैं। इस कारण अब प्रथम ही प्रथम बारह भावनाओं का वर्णन किया जायेगा।

।।ज्ञानार्णव प्रवचन प्रथम भाग समाप्त।।


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