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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 766

From जैनकोष



लोकद्वयविशुद्धयर्थं भावशुद्धयर्थमंजसा।

विद्याविनयवृद्धयर्थं वृद्धसेवैव शस्यते।।

वृद्धसेवा के कर्तव्य का संदेश- जिन पुरुषों को इस लोक और परलोक की विशुद्धि चाहिए अर्थात् जो इस लोक में भी धार्मिक वातावरण सहित शुद्धि और निर्दोषता सहित जीवन बिताने के इच्छुक हैं और परलोक में भी धार्मिक वातावरण चाहते हैं; इस प्रकार जो शांतिपथ में चलने के इच्छुक हैं उन पुरुषों को वृद्धसेवा करना चाहिये। वृद्धसेवा को प्रशंसा के योग्य कहा गया है। वृद्ध का अर्थ है गुरुजन। जो ज्ञान और आचरण में बढ़े हैं ऐसे गुरुजनों की संगति व सेवा करना हितकारी है। जिन मनुष्यों को अपने आत्मा की उत्तरोत्तर निर्मलता चाहिए, विषय कषायों से हटकर एक निज ज्ञायकस्वरूप के चिंतवन में समय बीते ऐसी आंतरिक परिणति चाहिए उन मनुष्यों का कर्तव्य है कि वे गुरुजनों की सेवा विशेषतया करें। इस ही प्रकार विद्या और विनय ये दोनों गुण भी लोक में सुख को उत्पन्न करने वाले हैं। विद्या से इस मनुष्य की इस लोक में भी उन्नति है और यह विद्या आत्मविद्या का रूप रखकर परमनिर्वाण का कारण बनती है, इसी प्रकार विनयभाव, विनय का अर्थ है विशेषरूप से नय मायने ले जाना। मनुष्य को जो उन्नति मार्ग में विशेष रूप से ले जाय उस भाव का नाम है विनय। जितनी नम्रता होगी, जितना आत्मा की ओर झुकाव होगा उतनी ही पवित्रता बढ़ती है। तो विद्या और विनय की वृद्धि अति आवश्यक है, उसके लिए गुरुजनों की सेवा प्रशंसनीय कही गयी है। बड़ों को निकट रहने से जिनको सांसारिक विषय भोगों से वैराग्य हुआ है और जो आत्मा के हित की ही कामना रखते हैं ऐसे बड़े के निकट रहने से, उनका अनुगामी बनने से यह लोक और परलोक सुधरता है, अपने परिणाम भी शुद्ध रहते हैं, विद्या विनय आदिक गुण बढ़ते हैं, मान कषाय समाप्त होता है।

वृद्धसेवा में अहंकार विलय का पुण्य अवसर- गुरुजन के निकट अभिमान नहीं रह सकता क्योंकि जिसे चाहिए अपना सम्मान, अभिमान, वह पद पद में अपना अपमान महसूस करेगा, क्योंकि प्रकृत्या यह बात है कि जितनी पूछ गुरुजन की होगी उतनी साधारण पुरुष की तो न होगी, यह तो एक लोकपद्धति है। जिससे किन्हीं को कुछ लाभ मिलता हो, आत्महित का पद मिलता हो वे लोग तो उसका आदर करेंगे ही। अब साधारण पुरुष जिसे अभिमान है वह ऐसे गुरुजनों का सम्मान देखकर और अपना सम्मान नहीं हो रहा, यह देखकर दु:खी रहेगा, वह साथ कैसे निभ सकता है। तो अभिमान को पहले गलाना पड़ेगा तब गुरुजन के निकट रह सकते हैं। दूसरी बात- रहा सहा जो कुछ मानकषाय है वह भी गुरुजन के निकट रहने से दूर हो सकता है। और, जब अहंकार दूर हो गया तब ही वास्तविक विद्या अपने में प्रकट होगी। अहंकार तो एक बड़ा दुर्गुण है। अपनी पर्याय में अपने आपके किसी भी भाव में यह मैं हूँ, बड़ा हूँ, इस प्रकार के भाव में, इस प्रकार के अंधकार में तो प्रभुस्वरूप ढक जाता है। उसे प्रभु के दर्शन नहीं होते। तो जिन्हें भगवत् प्रभु के दर्शन करने की इच्छा हो उन्हें अहंकार तो पहले मिटाना चाहिए। जहाँ अहंकार रहे वहाँ भगवान के स्वरूप का बोध नहीं हो सकता।

अहंकारविनाश बिना परमात्मतत्त्वोपलब्धि की असंभवता- एक गाँव में एक नकटा रहता था। उसकी नाक कटी हुई थी। सो उसे सभी लोग चिढ़ाया करते थे। जब वह तंग आ गया तो सोचा कि किसी उपाय से अगर गाँव के सभी लोगों को नकटा बना दें तो फिर लोग मुझे चिढ़ायेंगे नहीं। सो जब कोई चिढ़ाने लगा तो वह नकटा कहता है कि तुम क्या जानो इस नकटेपन का स्वाद? जब तक हमारे भी नाक की नोक थी तब तक हमें प्रभु के दर्शन नहीं हुए, अब नाक कटा देने से प्रभु के साक्षात् दर्शन होते हैं। तो वह सोचता है कि अगर नाक कटा लेने से प्रभु के दर्शन हो जायें तो इसमें क्या नुकसान? प्रभुदर्शन से बढ़कर तो और कुछ नहीं है। सो उसने अपनी नाक कटा ली। जब नाक कट जाने पर भी प्रभु के दर्शन न हुए तो वह नकटे से कहने लगा कि हमें तो प्रभु के साक्षात् दर्शन नहीं हो रहे? तो वह पहले वाला नकटा कहता है कि तू बावला मत बन। नाक कटाने से कहीं भगवान के दर्शन नहीं होते। अब तो नाक कट ही गई। तू अब सबसे यही कह कि नाक कट जाने से प्रभु के साक्षात् दर्शन होते हैं। और, जो नाक कटावे उसकी नाक काटकर यही मंत्र दिया कर। तो वह भी सबसे यही कहने लगा। इस प्रकार गाँव के सभी लोग नकटे हो गए। केवल गाँव का मुखिया बच रहा। तो एक दिन गाँव में सभा हुई। सभी लोग जुड़े। तो मुखिया कहता है कि तुम सभी लोग तो बड़े अच्छे लग रहे, यह मेरे क्या टुनक सी लगी है जिससे हम अच्छे नहीं लगते? सो गाँव के सभी नकटे बोले कि मुखिया जी पहले हमारी भी नाक ऊँची उठी हुई थी। सो जब तक नाक की टुनक थी तब तक प्रभु के साक्षात् दर्शन न होते थे। प्रभु के साक्षात् दर्शन करने के लिए हम सभी ने अपनी नाक कटा डाली। तो मुखिया भी नाक कटाने को तैयार हो गया। परंतु जो प्रथम नकटा था, जिसका सब षड्यंत्र रचा हुआ था उसे उस पर दया आयी, उसने कहा, मुखिया जी हम तुमसे दो मिनट अकेले में बात करेंगे। तो मुखिया को अकेले में उसने समझाया कि मैं नकटा था, सभी लोग मुझे चिढ़ाते थे, सो मैंने एक ऐसा उपाय रचा था कि किसी तरह से सभी लोग नकटे हो जायें तो फिर मुझे कोई चिढ़ायेगा नहीं। कहीं नाक के कटा लेने से भगवान के साक्षात् दर्शन नहीं हो जाते। एक आदमी तो सही रहना चाहिए कि कैसा होता है मनुष्य। प्रयोजन यह है कि नाक का अर्थ, अहंकार कर दें। लोग कहते भी हैं कि उसने हमारी नाक ऊँची रखने के लिये यों किया। नाक का अर्थ अभिमान कर दो तो सारी कथा ठीक बैठ जायेगी। जब तक अभिमान रहेगा तब तक प्रभु के दर्शन नहीं हो सकते।

वृद्धसेवा के लाभ- तो गुरुजनों की सेवा करने से जो जो गुण प्रकट होते हैं वहाँ यह भी गुण प्रकट होता है कि उसके नम्रता बढ़ती है, अभिमान दूर होता है और फिर उसके ज्ञानप्रकाश होता है। अहंकार के अंधकार से ज्ञानरूपी सूर्य का प्रकाश ढक गया है। गुरुसेवा की कितनी प्रशंसा की जाय, सच पूछो तो इस आत्मा का शरण ही गुरुसेवा है। जिसका कोई गुरु नहीं है, जिससे अपने हित की कोई चर्चा नहीं की जा सकती है ऐसा पुरुष एक किंकर्तव्यविमूढ़ रहता है, अपना जीवन यों ही निर्यापन किया करता है। वृद्धसेवा से समस्त व्रत विशुद्ध बनते हैं और खासकर ब्रह्मचर्य महाव्रत की तो बहुत पुष्टि होती है। बड़ों की संगति न करके छोटे रागीद्वेषी मलिन पुरुषों की संगति से सभी प्रकार के विकार उत्पन्न होते रहते हैं। जिन्हें लोक में अपनी सिद्धि चाहिए, परिणामों में निर्मलता चाहिए, विद्या और विनय की बढ़वारी चाहिए उन्हें गुरुसेवा करना अनिवार्य है।



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