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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 769

From जैनकोष



स्वतत्त्वनिकषोद्भूतं विवेकालोकवर्धितम्।

येषां बोधमयं चक्षुस्ते वृद्धा विदुषां मता:।।

वृद्धजनों का परिचय- वृद्ध पुरुष का लक्षण कह रहे हैं। वृद्ध का अर्थ बूढ़ा नहीं है। वृद्ध का अर्थ है जो ज्ञान में बढ़े हैं, जिनमें गंभीरता बढ़ी है, जो ज्ञान, आचरण में बढ़े हैं। ऐसे वृद्ध पुरुषों के निकट रहने से सर्व गुण प्रकट हो जाते हैं। वास्तव में वृद्ध पुरुष वे हैं जिसमें आत्मतत्त्वरूपी कसौटी से उत्पन्न हुए भेदविज्ञान से ज्ञान बढ़ा है, अर्थात् जिनका ज्ञानचक्षु प्रकट हुआ है। आत्मा का ज्ञान स्वरूप है। यह ज्ञान प्रकृष्ट रूप से बढ़े, ऐसी स्थिति प्राप्त होती है ज्ञानस्वरूप आत्मतत्त्व के ध्यान से। और ज्ञानस्वरूप आत्मतत्त्व का ध्यान यह बनेगा भेदविज्ञान के उपाय से। जब हम अपने आपमें यह पिछान लेंगे कि रागद्वेष मोह परिणाम, ये तर्क-वितर्क ये तो मैं नहीं हूँ, और मैं केवल शुद्ध ज्ञानज्योति हूँ, ज्ञानप्रकाशमात्र हूँ, ऐसा भेद करेंगे तब तो रागादिक भावों को छोड़कर अपने ज्ञानस्वरूप को अंगीकार करेंगे तो भेदविज्ञान के उपयोग से ही ये समस्त कल्याण सिद्ध होते हैं। भेदविज्ञान बिना कुछ भी सिद्धि नहीं है। जितने भी महान आत्मा सिद्ध भगवंत बने हैं, संसार संकटों से छूटकर शुद्ध ज्ञानानंद का अनुभव करते हैं उन सबकी यह जो परमपद की परिस्थिति है वह भेदविज्ञान के प्रताप से है। वे भी संसार में रागी, द्वेषी, मोही बनकर जन्म-मरण किया करते थे। जब उनके भेदविज्ञान प्रकट हुआ और उसके प्रताप से फिर परतत्त्वों को लगाकर स्वतत्त्व को ग्रहण किया। मैं केवल ज्ञानमात्र हूँ, देह से भी न्यारा केवल ज्ञान स्वरूप हूँ ऐसे ज्ञानस्वरूप की जिन्होंने निरंतर भावना भाई है ऐसे पुरुष ही तो सिद्ध भगवंत महंत हुए हैं। और, जितने भी जीव आज तक इस संसार में बँधे पड़े है, जन्म-मरण कर रहे हैं वे सब एक भेदविज्ञान के अभाव से ही ऐसा बंधन पा रहे हैं। तो जिन्हें भेदविज्ञान प्रकट हुआ है ऐसे इस उपाय से जिन्हें अपना ज्ञान स्वभाव प्रतीति में आ रहा है मैं ज्ञान स्वभाव मात्र हूँ ऐसा जिनका अनुभव चल रहा है वे पुरुष वृद्ध कहलाते हैं, केवल अवस्था में वृद्ध होने को ही वृद्ध नहीं कहते हैं।

वृद्धसेवा से आत्मगुणों का लाभ- आत्महितंकर गुणों को संक्षेप में कहा जाय तो वे हैं तीन- सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र। जिन गुणों के प्रताप से हम उन्हें गुरु कहते हैं। गुरु का स्वरूप ज्ञान और वैराग्य की मूर्तिरूप कहा गया है। जो विषयों की आशा के वश न हों, आरंभरहित हों, परिग्रह से दूर हों, जिनका ज्ञान, ध्यान और तपश्चरण ही कार्य हो रहा हो ऐसे पुरुष गुरुजन कहलाते हैं और ऐसे गुरुजनों की सेवा से यह लोक भी विशुद्ध होता, परलोक भी शुद्ध होता, अपने परिणामों की निर्मलता भी बढ़ती, विद्या विनय सभी गुण वृद्धि को प्राप्त होते हैं, जिनका फल परमशांति है। तृष्णा से व्याकुल हुआ पुरुष किसकी शरण में जाय कि तृष्णा की व्याकुलता दूर हो? सीधा उत्तर है- जो तृष्णारहित हो, जो केवल ज्ञानमूर्ति हो, आनंद को जो निरंतर भोग सकता हो, ऐसे पुरुष के समीप बैठे तो वे सब व्याधियाँ दूर हो जाती हैं। तो जिन्हें प्रसन्नता चाहिए, आत्मकल्याण चाहिए उनका कर्तव्य है कि वे शुद्ध पुरुषों की सेवा में रहें अर्थात् रत्यत्रयसंपन्न गुरुजनों की संगति में अपना समय बितायें।


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