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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 779

From जैनकोष



सत्संसर्गसुधास्यंदै: पुंसां हृदि पवित्रिते।

ज्ञानलक्ष्मी: पदं धत्ते विवेकमुदिता सती।।

सत्संगसुधापूत हृदय में ज्ञानलक्ष्मी का वास- सत्पुरुषों के संसर्गरूपी अमृत के झरने से जब मनुष्यों का हृदय पवित्र हो जाता है तो उस हृदय में उस मनुष्य में विवेक से मुदित हुई यह सम्यग्ज्ञान लक्ष्मी अपना निवास करती है। ज्ञान का स्वच्छ बना रहना यही है सबसे अपूर्व लौकिक संपत्ति। बाह्य में जड़ पौद्गलिक पिंडों का कितना भी ढेर लग जाय अथवा जहाँ ढेर लगा है वहाँ निकट यह स्वयं पहुँच जाय तो इतने संबंध मात्र से निकटवर्ती होने से आत्मा को शांति कहाँ से प्राप्त होती है? शांति तो सम्यग्ज्ञान के साथ अविनाभाव रखती है, सम्यग्ज्ञान हो तो शांति मिलती है यह बात पूर्ण निश्चित है, अतएव जो शांति के अभिलाषी है उन्हें अपना हृदय बदल लेना चाहिए। पूर्व समय से चला आया हुआ मिथ्या निर्णय बदल लेना चाहिए। अपने आपमें शांति अपनी ही स्वच्छता के कारण प्रकट होगी, अन्य पदार्थों से शांति प्राप्त नहीं होती। लोग लक्ष्मी श्रीविभूति आदि नाम कहकर धन दौलत की लक्ष्मी की उपासना करते हैं, किंतु यह मालूम होना चाहिए कि जिन शब्दों को बोलकर हम लक्ष्मी की उपासना करना चाहते हैं वे समस्त शब्द आत्मा के ज्ञानस्वभाव के पर्यायवाची नाम हैं। जैसे श्री शब्द है। श्री का अर्थ है जो तादात्म्यरूप से आश्रय करे वह है ज्ञानस्वभाव। मेरे में मेरे अभेदरूप से आश्रय करने वाला भाव कौन है? ज्ञानभाव। तो ज्ञान का ही नाम श्री है। इसको दूसरे शब्दों में लक्ष्मी कहते हैं। लक्ष्मी का अर्थ क्या है? जो लक्षण का अर्थ है वही लक्ष्मी का अर्थ है। जो लक्षण हो उसका नाम है लक्ष्मी। चाहे लक्षण कहो, चाहे लक्ष्मी कहो, चाहे लक्ष्य कहो, सब एक शब्द हैं। तो मेरा जो लक्षण हो वही मेरी लक्ष्मी है। मेरा लक्षण है ज्ञानभाव, चैतन्य स्वभाव, उसका नाम लक्ष्मी है।

नाना उपासनाओं में ज्ञानलक्ष्मी की उपासना का संकेत- लोग लक्ष्मी कहकर किसी और की उपासना करते हैं। लेकिन शब्द लक्ष्मी एक ज्ञान का पर्यायवाची है। लोग विभूति शब्द कहकर लक्ष्मी धन दौलत की तारीफ किया करते हैं पर विभूति शब्द का क्या अर्थ है? विशेष रूप से जो हो उसका नाम विभूति है। मुझमें विशेष रूप से होने वाली बात कौन है, जो सदैव रहे, जो अपने गाँठ की बात हो? जो सहज अपने स्वरूप की बात हो, परकृत न हो, औपाधिक न हो, ऐसी कौनसी विभूति है? वह है ज्ञानपरिणति। तो सब एक इस ज्ञान के ही नाम है जिस नाम को लेकर लोग जड़ पौद्गलिक पदार्थों की उपासना किया करते हैं और इतना ही नहीं किंतु जिन देवी देवताओं के नाम लेकर हम किसी और प्रकार के जीवों की उपासना करते हैं उन देवी देवताओं के नाम भी यहाँ बतलाते हैं कि ज्ञानानुभूति के नाम हैं। देवी को प्रणाम हो। वह देवी कौन है? ज्ञानानुभूति। अपने ही ज्ञान का अनुभव बने, स्वयं ज्ञान ज्ञान को जाने ऐसी जो स्थिति है उसका नाम देवी है। कितने ही नाम लेते जाइये दुर्गा, चंडी, मुंडी, काली, चंद्रघंटा, सरस्वती आदि ये सब ज्ञानानुभूति के नाम हैं। दुर्गा का अर्थ है- दु:खेन गम्यते प्राप्यते या सा दुर्गा- जो बड़ी कठिनाई से प्राप्त हो, जो दुर्लभता से जानी जाय उसका नाम दुर्गा है। वह दुर्गा कौन है, जो बड़ी कठिनाई से प्राप्त होती है? वह है अपने आपके ज्ञानस्वरूप की अनुभूति। कितनी खुद के अंतरंगमें निकट की बात है और इन जड़ पौद्गलिक विषयों में मुग्ध होकर इतनी कठिन बात बन गई है। चंडी नाम किसका है- जो रागादिक शत्रुवों का खंडन कर दे उसका नाम चंडी, कलयति प्रेरयति स्वहिते इति काली- जो हित की कल्याण की प्रेरणा करे उसका नाम है काली। चंद्रघंटा- जो अमृत झराने में चंद्र से ईर्ष्या रखती हो उसका नाम है चंद्रघंटा। तो कितने ही नाम लेते जाइये, ये सब इस आत्मानुभूति के पर्यायवाची शब्द हैं। सरस्वती- जिसका बहुत बड़ा फैलाव हो उसका नाम है सरस्वती। दृष्टि विशुद्ध करके निरखो तो कि सबसे बड़ा फैलाव किसका होता है? सबसे बड़ा फैलाव है ज्ञान का। तो इस ज्ञान के अनुभव का नाम है सरस्वती।

ज्ञान की सूक्ष्मता और व्यापकता- यह ज्ञान अति सूक्ष्म है अतएव ज्ञानमय होकर भी आत्मा के द्वारा यह ज्ञान जाना नहीं जा रहा है। सबसे अधिक सूक्ष्म है अतएव यह सबसे अधिक व्यापक है। जो चीज जितनी अधिक पतली हो वह उतनी ही अधिक व्यापक होती है। जैसे मान लो कि यह पृथ्वी एक बहुत मोटी वस्तु है, और इस पृथ्वी के मुकाबले में जल पतला है, इस बात को हर एक कोई जानता है। आजकल के वैज्ञानिक भौगोलिक लोग भी यही कहते हैं कि समुद्र का घेर ज्यादा है पृथ्वी का घेर कम है। लेकिन सिद्धांत भी यही बता रहा है कि जंबूद्वीप...अखंड समस्त द्वीप का जितना विस्तार है उससे कई गुना अधिक विस्तार जल क्षेत्र का है। प्रथम तो जंबूद्वीप के आगे दूना समुद्र हैं, फिर असंख्याते द्वीप समुद्र जितना विस्तार रखते हैं उससे भी कुछ अधिक विस्तार स्वयंभूरमण समुद्र का है। तब जल ज्यादा हुआ ना? पृथ्वी से जल पतला है इसलिए जल का व्याप्य क्षेत्र अधिक हो गया, और, जल से पतली है हवा तो जल से अधिक क्षेत्र में हवा है। आजकल भौगोलिक विज्ञानी भी इस बात को कहेंगे और सिद्धांत भी कहता है कि जहाँ पृथ्वी नहीं, जहाँ जल नहीं वहाँ भी हवा है। तो हवा व्यापक है। और, ये सब चीजें जल भी, पृथ्वी भी इन सबका जो समूह है उसका नाम है लोक। उससे आगे भी आकाश है। तो आकाश हवा से भी पतला है ना, तो वह इन सबसे अधिक व्यापक है, किंतु एक बात और जानो कि इस आकाश से भी व्यापक वह ज्ञान है जिस ज्ञान ने पृथ्वी को जाना, जल को जाना, लोकालोक के समस्त आकाश को जाना और फिर वह भी उस ज्ञान में ऐसा स्वभाव है कि ऐसे-ऐसे अनेक लोक अलोक हों तो उन सबको भी यह ज्ञान जान लेता है। तो सबसे महान फैलाव है ज्ञान का। और, अधिक फैलाव वाली देवी का नाम है सरस्वती। अपने ही आत्मा में जो ज्ञानानुभूति होती है, संकल्प विकार हटकर जो अंतरंग में एक शुद्ध ज्ञानमात्र ज्ञानज्योति का अनुभव होता है उस स्थिति का नाम है सरस्वती। जरा शब्द का मर्म तो पहिचानो।

ज्ञानलक्ष्मी के अनेक परिस्थितियों में व्यक्त अनेक रूप- ऐसा भी लोग कहते हैं कि वह एक ही देवी है तभी तो सरस्वती का रूप रखती है और कभी प्रचंड क्रोधमय एक काली का रूप रखती है, जैसे प्रसिद्ध भी है यह बात कि कभी तो अनेक नरमुंडों की माला पहिने खप्पर हाथ में लिए भुजावों में हथियार लटकाये हुए उसका स्वरूप माना है तो कभी किसी पर्व में किसी दिनों में शांतमुद्रा में हंस भी पास में बैठा है, बड़े-बड़े ऋषिजन जिसकी उपासना कर रहे हैं, ऐसी मुद्रा में उस सरस्वती देवी का स्वरूप माना है। तो वह सरस्वती कोई एक हो और समय-समय पर विलक्षण विभिन्न विपरीत नानारूप रखा करे ऐसा कौन है? वह है यह खुद की अनुभूति। यह अनुभूति जब मोह में, विकार में बढ़ जाती है तो बड़ा प्रचंड क्रोधरूप अपना रख लेती है। सारे विश्व का विनाश करे ऐसी फैली हुई अनुभूति होती है और यह अनुभूति जब कषायें मंद होती हैं, ज्ञानविकास बनता है तो शांतमुद्रा में पर के विकल्प दूर करके एक निज तत्त्व का ग्रहण करता रहता है। ऐसी ही होती है सरस्वती की मुद्रा। सब कुछ अपने अंदर में निरखिये। सबका अर्थ अपने अंदर में घटाते जाइये तब तो होगी काम की बात और बाहर बाहर ही हम सब पदार्थों को निरखने का यत्न करें तो यह होगी उलझन की बात। भगवान एक भी अपने आत्मा में प्रयोग करें तो अपने शुद्ध स्वरूप को देखेंगे। वे भी बाहर में कहीं नहीं देखते। कल्पना से कुछ भी देख लेवें, जिसको जिस बात की धुन लगी है उसको वह मुद्रा आकाश में भी दिख जाती है। जैसे किसी गृहस्थ को किसी भाई से अत्यंत अधिक मोह हो और वह गुजर जाय, जल गया, अब कुछ नहीं रहा, लेकिन उसकी धुन उसके प्रति ऐसी लगी है कि उसे जब चाहे तब ही उसकी सकल कल्पना में दिख जाती है। ऐसे ही भगवान के बारे में बाहर में उस रूप हम कल्पनाएँ बनाते हैं तो वह धुन बन जाने से हमें यों लगता है कि आज तो भगवान ने हमें छत पर दर्शन दिया। अरे भगवान के दर्शन किसी बाहरी जगह में न होंगे और कदाचित् साक्षात् भगवान भी सामने हों जैसे समवशरण में प्रभु विराज रहे हैं वहाँ पर भी भगवान के दर्शन इन चमड़े की आँखों से न हो जायेंगे। वहाँ भी ज्ञान से ही उस अनंत चतुष्टयात्मक चैतन्यस्वरूप के दर्शन होते हैं।

सत्संग के फल में ज्ञानप्रकाश का अनुपम लाभ- यह ज्ञानप्रकाश सत्पुरुषों के संग का ही फल है। कुछ जब स्वाध्याय करते हैं, सत्पुरुषों की वाणी मन में समझते हैं वहाँ भी सच समझिये कि उत्तम सत्संग किया जा रहा है। तो सज्जन पुरुषों के संसर्गरूपी अमृत के झरने से जब पुरुषों का हृदय पवित्र होता है तब उस हृदय में उस ज्ञानलक्ष्मी निवास करती है। शरण हम आप सबका यह सम्यग्ज्ञान ही है, खूब निरख लो, परख लो, किसी भी स्थिति में जब भी आप सुखी होते हैं तो ज्ञान का प्रसाद मिलता है स्वयं का, उस प्रसाद से सुखी होते हैं। उस ज्ञानलाभ के लिए जितना सुगम सीधा उपाय एक सत्संगति का है उतना सीधा सरल उपाय अन्य कुछ न मिलेगा। ऐसा जानकर हम आपको वृद्धसेवा के लिए उत्साह बनाना चाहिए। बड़ों की सेवा करें। जो तप, व्रत, ज्ञान, संयम, नियम, उदारता इन समस्त गुणों में बढ़े हों ऐसे महान पुरुषों के सत्संग से स्वयं बहुत से विकार दूर होते हैं। बहुत सी भूलें नष्ट होती हैं। अपने कर्तव्य का भान जल्दी हो जाता है, तो अपने कल्याण के लिए सत्संग करने का हमारा ध्यान निर्णीत बना रहना चाहिए।


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