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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 792

From जैनकोष



एकैव महतां सेवा स्याज्जेत्री भुवनत्रये।

ययैव यमिनामुच्चैरंतर्ज्योतिर्विजृंभते।।

वृद्धसेवा से अनुपम विजय- महान पुरुषों की सेवा ही एक तीन लोक में जयशील है। सब कामों से विजयी परिणाम रखने वाली विद्या है बड़ों की सेवा। लोकव्यवहार में भी जो बड़े जन हों, गुरुजन हों, शिक्षा देने वाले हों, माता पिता हों, बुजुर्ग हों, अपने हितकारी कोई हों उनके सामने विनयपूर्वक रहना, भक्ति से रहना इससे आत्मा में बड़ी योग्यता बढ़ती है। और उसके पुण्य होता है और सुख समृद्धि उसके सामने आती है। बड़ों की सेवा करना यह बहुत बड़ा मूल गुण है, बड़े के दिन से कोई आशीष निकले, बड़े पुरुष किसी के हित का चिंतन करें तो उसके ख्याल से आश्वासन से बड़े-बड़े संकट दूर हो जाते हैं। दुवा आशीष का भी तो कुछ महत्त्व है, जिस पर बड़े की दुवा नहीं है, आशीष नहीं है वे पुरुष जीवन में सुखी शांत नहीं हो पाते। और, फिर उद्दंडता किस बात पर करनी? यहाँ अपना क्या साम्राज्य गाड़ जाना है, क्या करना है, किनके लिए अन्याय करना है, अपने बड़े बूढ़े माता पिता इनकी भक्ति करना, विनय करना, सेवा करना यह बहुत बड़ा गुण है, इससे बड़ी शांति मिलती है। उद्दंडता का व्यवहार करना, इससे कुछ तत्त्व की बात नहीं मिलती। और, फिर यहाँ लोकव्यवहार में बड़ों की सेवा करेंगे तो भगवान की भी भक्ति बन सकेगी और यदि दुर्व्यवहार करेंगे तो उनसे भगवान की भी भक्ति सेवा बन नहीं सकती। तो बड़ों की सेवा ही इस लोक में जयशील होती है। और, इससे ही बड़े विचारशील मुनियों के मन में ज्ञानरूपी प्रतीति का प्रकाश विस्त्रित होता है। बुद्धि ही तो है। यदि अच्छी ओर लग जाय तो बुद्धि और स्पष्ट निर्मल हो जाती है और थोड़ा मलिन काम की ओर बुद्धि लग जाय तो वह बुरा काम बुद्धि को मलिन कर देता है और जिससे बुद्धि बुरे काम में लगती ही चली जाती है। तो बुद्धि खोटे काम में न लगे, इसकी रोक करने वाली कोई और औषधि है तो वह है सत्संगति। सत्संग में, साधुसंतों की सेवा में रहने वाले व्यक्ति के कभी किसी पापोदय से कोई मलिन परिणाम भी हो जाय तो फिर सम्हाल हो जाती है। मलिन पापों का कारण है यह धन परिग्रह। इससे मूर्छा हटे और सज्जन पुरुषों की संगति में चित्त जमे तो उसका कल्याण अवश्य होगा।

परिग्रहसंपर्क से सद्भाववैभव का विनाश- एक कथानक है- दो भाई थे। दोनों धन कमाने के लिए परदेश चले गए। धन खूब कमाया और कई वर्ष बाद में सोचा कि चलो अपने घर चलें, उतना धन कैसे ले जाया जा सके? तो सब धन बेचकर दो रत्न खरीद लिए। दो रत्न लेकर चलें, रत्न बड़े भाई के हाथ में थे, समुद्र का रास्ता था। समुद्र में नाव पर बैठे जब चले जा रहे थे तो बड़ा भाई सोचता है कि ये रत्न तो हमने कमाये। घर जाकर बट जायेंगे, एक ही रत्न मिलेगा, सो ऐसा करें कि इस छोटे भाई को समुद्र में ढकेल दें। यह मर जायेगा तो हमें दोनों रत्न मिल जायेंगे। फिर थोड़ा संभला सोचता है, ओह मैंने यह क्या सोच डाला था इन रत्नों के कारण? यह सोचकर वह अपने छोटे भाई से कहता है कि ये रत्न अपने पास रख लो हम न रखेंगे। जब छोटे भाई ने अपने पास वे रत्न रख लिए तो उसके भी मन में वही खोटे भाव आ गए। वह सोचता है कि ये रत्न कमाये तो हमारी बुद्धि से गए हैं, घर जाकर बट जायेंगे, हमें एक ही रत्न मिलेगा, सो ऐसा करें कि इस बड़े भाई को ढकेल दें, यह मर जायेगा तो हमें दोनों रत्न मिल जायेंगे। वह भी संभला। सोचा- ओह मैंने क्या व्यर्थ की बातें सोच डाली थी इन रत्नों के कारण? खैर, किसी तरह जब घर पहुँचे तो वे रत्न अपनी बहिन को दे दिया। बहिन भी सोचती हैं कि ये रत्न तो भाई हमसे ले लेंगे, सो ऐसा उपाय कोई करे कि ये भाई मर जायें तो ये रत्न हमें मिल जायेंगे, फिर वह संभली, उसने भी अपने पास उन रत्नों को रखना स्वीकार नहीं किया, आखिर वे रत्न माँ के पास रख दिये। माँ भी सोचती है कि ये रत्न बड़े अच्छे हैं पर इन्हें लड़के छुड़ा लेंगे, अगर इन्हें अच्छी तरह छिपाकर रहें तो बुढ़ापा हमारा अच्छा कटेगा। न जाने बुढ़ापे में कोर्इ सेवा करे न करे, सो उसने भी उन रत्नों को छिपाकर रखने की सोची, बाद में वह भी संभली। अपने बेटों से बोली- यह क्या आफत लाये हो, ये तो बड़ी खराब चीज है। तुम इन्हें अपने पास रखो, हमें न चाहिए। आखिर सबने अपनी अपनी बात बतायी और अंत में यह तय हुआ कि इन्हें समुद्र में फेंक दिया जाय। गरीबी अच्छी है पर यह चीज अच्छी नहीं है, ऐसा ही किया। तब सब सुखी रह सके। तो बुद्धि बिगड़ती है इस परिग्रह में मूर्छा बुद्धि रखने में। आपस में भाई-भाई लड़ जाते हैं। अरे भाई किसी के पास संपदा कम भी हो और भाग्य अच्छा हो तो कुछ ही समय में सब कुछ संपदा आ जायगी, और अन्याय से कुछ ज्यादा रख ले और भाग्य साथ न दे तो कितने दिन रहेंगे? अपने भाग्य पर भरोसा रखना चाहिए।

विशुद्ध भावना से अपना भविष्य विशुद्ध बनाने का अनुरोध- किसी भी मनुष्य को मेरे कारण आपत्ति न आये, ऐसी शुद्ध भावना रखना चाहिए और अपने जान जितना बन सके दूसरे लोग सुखी रहें ऐसा उद्यम करें, थोड़े खर्च भी करने पड़ें, शरीर से सेवा भी करनी पड़े तो ये सब करके दूसरों को प्रसन्न रखने की, सुखी रखने की हमारी ओर से चेष्टा और इच्छा होनी चाहिए। तो सबका सुख चाहता है उसको सुख नियम से मिलता है, और जो दूसरे का दु:ख चाहता है तो वह दूसरा चाहे दु:खी न हो पर खुद को दु:ख अवश्य हो जाता है। जैसे कोई पुरुष हाथ में आग लेकर किसी दूसरे को मारे तो वह मारने वाला तो जल ही जाता है और जिसके मारा है वह जले या न भी जले। जो दूसरों की चीज हड़पने की, दूसरे के साथ अन्याय करने की कोशिश करेगा वह पहिले अपना पुण्य तो खतम ही कर लेगा। तो विशेष बात यह करने की है कि अपने भाव अच्छे रहें। किसी का बिगाड़ करने की बात मन में न आये। ये सब बातें महान पुरुषों की सेवा करने से मिलती रहती हैं। जो हमारे करने योग्य काम है हित अहित सबका विवेक महान पुरुषों की सेवा में होता है। तो सत्संग में ऐसा मुख्य साधन है कि जिससे हमें हित अहित की सुध रहती है और जिसमें हमारा हित हो उसमें लगे रहने की भावना और चेष्टा बनती है। इससे सत्संग को बहुत महत्त्वपूर्ण कार्य समझना चाहिए।


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