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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 795

From जैनकोष



यथात्र शुद्धिमाधत्ते स्वर्णमत्यंतमग्निना।।

मन:सिद्धिं तथा ध्यानी योगिसंसर्गवह्निना।।

सत्संग से सिद्धि लाभ- जैसे इस जगत में अग्नि के संयोग से स्वर्ण अत्यंत निर्मल हो जाता है इसी प्रकार योगीश्वरों की संगतिरूप अग्नि से ध्यानी मुनि अपने धर्म की सिद्धि को प्राप्त हो जाते हैं। स्वर्णमलिन हो तो अग्नि में तपाने से स्वर्ण निर्मल बनता है ऐसे ही जो मलिन मनुष्य है, जो विषयकषायों से मलिन परिणाम रख रहा है ऐसा मनुष्य भी सत्संग में रहकर अपनी मलिनता को छोड़ देता है, सत्संग बिना जीवन क्या, फिर तो जैसे पशु पक्षी का जीवन है, उनका काहे का सत्संग है? वे अपनी गोष्ठी में रहते हैं, विषयकषायों में मग्न रहा करते हैं। तो यह बात पशुवों में भी है, मनुष्यों में भी है, अंतर क्या पाया? अंतर तो यह है कि मनुष्य तो सत्संग करता है और पशुपक्षियों में सत्संग नहीं है। मनुष्य गुणी मनुष्यों का समागम करके अनेक विद्यावों का लाभ प्राप्त करता है, मुक्ति का पंथ इस मनुष्यभव से ही प्राप्त होता है। तो सत्संग से सर्व प्रकार के संकट दूर हो जाते हैं, निर्वाण की प्राप्ति हो सकती है। यद्यपि एक आत्मध्यान के करने से आत्मा में वह पवित्रता जगती है कि मुक्ति प्राप्त होती है। लेकिन आत्मध्यान वह कर सका, ऐसी आत्मध्यान की पात्रता उसे तभी तो जगी जब उसने सत्संग से गुरुजनों से कुछ अनुभव किया, इसके बाद वह आत्मध्यान में निपुण बन सका। तो जितनी भली बातें हैं वे सब सत्संग से प्राप्त होती हैं। जो परिणाम सत्संग में पहुँचने से शीघ्र निर्मल हो जाता है, इस कारण महामनुष्यों के संग का अधिकाधिक ध्यान रखना चाहिए। यह सत्संग ऐसी विलक्षण अग्नि है कि जिस अग्नि का संबंध पाकर विषयकषायों की मलिनता दूर हो जाती है और यह आत्मा शुद्ध स्वर्ण के माफिक निर्दोष बन जाता है, मनुष्य का धन ही यह है कि वह अपना चारित्र निर्मल रखें, अपने चित्त में विकार न आने दें, यही मनुष्य का धन है, यह धन यह ब्रह्मचर्य वृद्ध मनुष्यों की सेवा करने से प्राप्त होता है। जिसके ब्रह्मचर्य व्रत नहीं है उसके धर्म के नाम पर किए गए सारे काम व्यर्थ हैं। व्यभिचार की प्रकृति है तो उस मनुष्य को किसी भी धर्म का फल नहीं मिलता। ब्रह्मचर्यमूलक समस्त साधन और इस ब्रह्मचर्य की सिद्धि संत मनुष्यों के समागम से अनायास प्राप्त हो जाती है। यह सत्संग मन की शुद्धि का अद्भुत कारण है अतएव जो ज्ञानी मनुष्य है, संसार, शरीर, भोगों से विरक्त है, जिसका केवल आत्मकल्याण ही ध्येय है, जो आत्मनिरीक्षण का ही सदा उद्यमी रहता है ऐसे मनुष्य की सेवा मिले, संगति मिले, यह एक अद्भुत कार्य है।




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