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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 810

From जैनकोष



येषां वाग्भुवनोपकारचतुरा प्रज्ञा विवेकास्पदम्

ध्यानं ध्वस्तसमस्तकर्मकवचं वृत्तं कलंकोज्झितम्।

सम्यग्ज्ञानसुधातरंगनिचयैश्चेतश्च निर्वापितंधन्यास्ते शमयंत्वनंगविशिखव्यापारजाता रुज:।।

उपकारकोपदेष्टा विवेकी प्रज्ञ संतों के ध्यान का धन्यवाद- जिन योगीश्वरों के वचन लोक के उपकार के आधार हैं और प्रज्ञा विवेक के साधन हैं वे योगीश्वर धन्य हैं। देखिये मनुष्य के विशेष करके दो ही तो धन हैं। भीतर में विवेक और ऊपर में व्यक्त होने वाले वचन। जिस पुरुष में विवेक है और जिसके वचन लोक का उपकार करने वाले हैं वह पुरुष संत है, धन्य है। व्यक्त वचनों से तो लोक का उपकार होता है और विवेक से अपने आपकी रक्षा होती है- इन दोनों बातों पर जो विशेष उन्नति शील बना रहेगा वह उतना ही विशेष योग्य हो जाता है। विवेक का अर्थ क्या है? लोग यह समझते हैं कि विवेक मायने जानकारी। विवेक का सही अर्थ है- जो दो टुकड़े कर दे इसका नाम विवेक है। जानकारी का अर्थ तो पीछे लिया गया है। जानने की बात विच्लृ धातु में कुछ भी नहीं है, इसका अर्थ है दो टुकड़े कर देना। जिससे ध्वनित होता है कि भेद विज्ञान का नाम विवेक है। जिस आशय में भेदविज्ञान नहीं बसा है वहाँ कितना भी ज्ञान क्यों न हो, उस ज्ञान के होने पर भी विवेक तो कहते नहीं, लोग भी नहीं कहते। कोई बहुत बड़ा ज्ञान प्राप्त कर ले अध्ययन करके किंतु हित अहित की परख न हो तो लोग उसे कहते हैं कि पढ़ तो गया, पर विवेक कुछ नहीं है। तो उस पढ़ने से, अध्ययन से और ज्ञान से कुछ अलग बात है ना विवेक।

विवेक की अध्ययन से विशेषता- देखिये छुपी हुई बात को भी कोर्इ ज्योतिष गणित से बता सकें ऐसे भी लोग होते हैं। ऐसे ही एक दृष्टांत में कहते हैं कि कोई चार मित्र थे जो अपनी ज्योतिष गणित सी छुपी हुई बात को भी बता देते थे। चारों में सलाह हुई कि चलो अपने राजा महाराजावों के पास चलें और यह बात उनके दिल में प्रवेश कर दें, अच्छा तो चले वे किसी नगर के महाराजा के पास। चारों ने बताया कि तुम जो चाहे पूछो, हम अपनी ज्योतिष विद्या के द्वारा छुपी हुई बात को भी बता देंगे। तो महाराजा ने क्या किया कि हाथ में एक चीज उठा ली और मुट्ठी बाँध ली, पूछा बतावो हमारी मुट्ठी में क्या है? सो मुट्ठी में क्या चीज है फिर बतावेंगे। एक ने गणित लगाकर बताया कि आपकी मुट्ठी में कोई गोल गोल चीज है, दूसरे बताया महाराज गोल भी है और उसके बीच में छेद भी है, तीसरे से पूछा कि तुम बतावो क्या है? तीसरा कहता है महाराज वह चीज गोल भी है, उसके बीच में छेद भी है और साथ ही वह लोगों के काम भी आती है। चौथे से पूछा- अब तुम बतावो क्या चीज है? तो वह बोला- खोल दो महाराज मुट्ठी, इसमें चक्की का पाट है। अरे था तो उसकी मुट्ठी में जाप की माला का दाना। उन तीनों ने तो बिल्कुल ठीक बताया था पर उस चौथे ने बताया कि चक्की का पाट है। अरे इसे तो देहाती मूर्ख भी समझ लेगा कि चक्की के पाट मुट्ठी में नहीं आ सकता है। तो पढ़ लिख लेना, अध्ययन कर लेना और बात है, विवेक जगना और बात है। किसी गाँव में एक लालबुझक्कड़ नाम का आदमी था। वह गाँव की सारी समस्यावों को हल करता था। चाहे अट्ट बताये चाहे सट्ट, पर वह गाँव की सारी समस्याएँ सुलझाता था। एक बार रात्रि में वहाँ से एक हाथी निकला, गाँव के लोगों ने सुबह देखा तो हाथी के पैरों के बड़े-बड़े निशान बने हुए थे, लोग आश्चर्य में पड़ गए कि यह क्या चीज है? यह बात लालबुझक्कड़ के पास पहुँची। सभी लोगों ने कहा- लालबुझक्कड़ महाराज, हमारी इस समस्या को हल कर दो। तो लालबुझक्कड़ ने उस स्थान को आगे पीछे देखा और कहा- तुम लोग घबड़ावो मत। कहा देखो- लालबुझक्कड़ बुझ सके और बुझे न कोय। पैर में चक्की बाँधे हिरण भागा होय। एक हिरणा ने अपने पैर में चक्की बाँध ली और यहाँ से निकल गया, उसके ये निशान हैं। युक्ति तो बिल्कुल ठीक दी। चाक के पाट बराबर ही वे निशान थे और हिरण जब उछलता है तो दूर दूर पैर धर कर उछलता है। बातें तो ठीक थी, पर उसके यह विवेक न जगा कि ऐसा भी कहीं होता है क्या? तो विवेक बिना चित्त में शांति संतोष साता प्रकट नहीं होते हैं। तो वे योगीश्वर धन्य हैं जिन्होंने प्रज्ञा के द्वारा अपने आपमें स्वाधीनता प्रकट की है और इन वचनों के द्वारा लोक का उपकार किया है।

कर्मविध्वंसक ध्यान के अधिकारी को धन्यवाद- वे योगीश्वर धन्य हैं जिनके ध्यान ने कर्मबंधरूपी कवच को नष्ट कर दिया है। जैसे कवच बड़ा मजबूत होता है, लोग उसे अपने शरीर में ओढ़ लेते हैं तो बाण कोई मारे तो उस पर कोई असर नहीं होता। तो इस जीव के साथ यह कर्मबंध का ऐसा मजबूत कवच लगा हुआ है कि जिसके कारण सत्शिक्षा का असर नहीं होता। तो ऐसा शत्रुतारूप जो कवच है उस कवच को केवल ध्यान के बल के तोड़ा जा सकता है, ये रागद्वेष मोह आदिक भाव के बंधन, ज्ञानावरणादिक कर्मों के बंधन एक आत्मध्यान से ही तोड़े जा सकते हैं। लोग शांति के लिए बाहर में बड़ी खोज करके व्यग्र होते जा रहे हैं, पर शांति बाहरी खोज से मिल नहीं सकती। वह सत्संग धन्य है जिस सत्संग में रहकर बुद्धि ऐसी व्यवस्थित रहती है कि जिस बुद्धि के द्वारा यह पुरुष अपने आपमें अपने अंतस्तत्त्व के ध्यान से ही शांति और संतोष का अर्जन करता है; और वे योगीश्वर भी धन्य हैं, पूज्य हैं जिन योगीश्वरों के गुणों का स्मरण करने से अपने आपमें निर्मोहता का उत्साह जगता है और आत्मध्यान की प्रेरणा मिलती है, यों यह आत्मध्यान ही कर्मबंधन को तोड़ने में समर्थ है।

निष्कलंक ज्ञानस्वरूप योगीश्वरों को धन्यवाद- वे महायोगीश्वर धन्य हैं जिनके चारित्र कलंकरहित हैं। कलंक क्या है? विषय और कषाय। कहते हैं कि आतम के अहित विषय कषाय, इनमें मेरी परिणति न जाय। विषय और कषाय ये दो जीव के विकार हैं। प्रभु से हम आप यही प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभो ! इन विषय और कषायों में मेरा उपयोग न जाय। मैं रहूँ आपमें आप लीन। सो करहु होऊँ ज्यों निजाधीन। कवि दौलतरामजी ने बताया है कि आत्मा के अहित करने वाले ये विषय और कषाय के परिणाम हैं, इन रूप मेरी परिणति न हो। मैं अपने आपमें ही लीन रहूँ और हे नाथ ! यदि तुम कहते ही हो कि मांग लो कुछ हमसे तो मैं यह मांगता हूँ कि सो करहु होऊँ ज्यों निजाधीन। ऐसा काम बना दो कि मैं निज में लीन होऊँ। जिनको धर्म में रुचि है वे धर्मतत्त्व के वेत्ता चाहे गृहस्थ हों, चाहे साधु हों, चाहे आचार्य हों उत्तरोत्तर विशेषता तो जरूर है, मगर धर्म की रक्षा करने वाले पुरुष, ज्ञान की रक्षा करने वाले पुरुष ज्ञानवंत पुरुषों में अपूर्व गुणानुराग रखते हैं और इतना अधिक गुणानुराग होता है कि कदाचित् किसी एक बात में जहाँ सैकड़ों बातें बताई हैं कदाचित् किसी एक तत्त्व के अप्रयोजनभूत निर्देश में थोड़ा स्खलन हो जाय तो भी उतने के कारण उन ज्ञानी संतों में गुणानुराग कम नहीं करते हैं। जैसे माता का पुत्र में इतना अधिक अनुराग होता है कि कदाचित् थोड़ा अपराध भी हो जाय तो पुत्र से कितना स्नेह रखती है। हाँ कदाचित् असह्य अपराध हो जाय तो माता भी जो न्यायवती है वह पुत्र को छोड़ देती है। छद्मस्थ जन है फिर भी कितना विशेष ज्ञान था उन संतजनों का जिन्होंने किस किस तरह से इस तत्त्व का निरूपण किया है, यह उनके साहित्य का अनुसंधान करने पर विदित होता है। जो कोई तालाब की अवगाहना करेगा वही तो तालाब की गहराई माप सकेगा। अवगाहन किये बिना केवल ऊपर के देखने से गहराई का पता नहीं पड़ता है। एक लौकिक कथानक है कि राम रावण के युद्ध में बंदरों ने समुद्र को लाँघ लिया था और लंका में पहुँच गए थे। तो भले ही कल्पना कर लो कि वानरों ने समुद्र को लाँघ लिया मगर समुद्र में क्या रत्न पड़े हैं इसका पता क्या उन वानरों को हो सकता है? नहीं हो सकता। इसी प्रकार पोथी पन्नों के अध्ययन कर करके एक इस ज्ञानसमुद्र को कोई लाँघ भी ले, बंदरों की तरह पार कर ले, पर इस ज्ञानसमुद्र में मर्म क्या पड़े हुए हैं यह बात गुणानुराग की डुबकी लगाये बिना विदित नहीं हो सकती। वे योगीश्वर धन्य हैं जिनका चित्त सम्यग्ज्ञानरूपी अमृत के तरंगों से अशांत हो गया है। मोह रागद्वेष से व्यथित हृदय वाले को क्या कोर्इ ठंडा घर शांत कर सकता है? अरे मोह रागद्वेष की अग्नि से संतप्त हृदय वाला ज्ञानरूपी अमृत की तरंगों से ही शीतल किया जा सकता है। ज्ञान में ही ऐसी सामर्थ्य है कि उन विक्रम के संतापों को क्षणमात्र में नष्ट कर देता है। एक विचार ही तो है। बाह्य में कुछ परिणमन हो गया हो, हम मन के अनुकूल नहीं समझ रहे हैं तो हो गया परिणमन। जब हम उसको अपने आपमें मोहवश अधिक महसूस करते हैं तो हम दु:खी होते हैं। और जब यह विचार बन जाता है कि क्या है, संसार असार है, सब भिन्न है, हो गया जो कुछ हो गया। वे मुझसे तो सब न्यारे ही हैं। मैं तो देह से निर्मल केवलज्ञान हूँ, मैं इतना ही हूँ, मेरा क्या बिगाड़ हुआ? एक विचार ही तो बनाया कि वे सारे संकट क्षणमात्र में नष्ट हो जाते हैं। तो मोह रागादिक उपद्रवों से संतप्त हृदय को शीतल करने वाला सम्यग्ज्ञान ही है।

आत्मपोषण के कार्य में संलग्न होने का अनुरोध- अब अपने आपके बारे में थोड़ा स्वयं विचार तो कर लो कि यहाँ काम दो ही तो हैं- शरीर का पोषण करना और एक अपने आत्मा का पोषण करना। इन दो कामों में शरीर के पोषण में कितना तन, मन, धन, वचन व्यय करते हैं और इस आत्मा के पोषण में अर्थात् ज्ञानार्जन में कितना इन तन, मन, धन, वचनों का उपयोग करते हैं। वर्ष में बारह महीने होते हैं, इन बारहों महीनों में शरीर के पोषण में कितना समय व्यतीत होता है और ज्ञानार्जन के काम में कितना समय व्यतीत होता है? इस पर जरा विचार तो करें। वर्ष में एक दो माह के लिए किसी सत्संगति में ज्ञानार्जन के उद्देश्य से रहना चाहिए। योग्य सत्संग से ज्ञान और ध्यान की प्रेरणा मिलती रहती है। शेष 11 महीनों में एक दो घंटा नियमित ज्ञान की साधना और उपासना में लगायें। इस प्रकार अपने ज्ञान द्वारा अपने आपके पोषण के लिए सभी प्राप्त हुए समागमों का अधिक से अधिक सदुपयोग कर लें। इन सर्व प्राप्त हुए समागमों से अपने आत्मतत्त्व की प्राप्ति का उपाय बना लिया जाय तो इससे बढ़कर भी कोई पुरुषार्थ हो सकता है क्या? ऐसे ही उपायों से प्रारंभ करके जिन्होंने आत्मध्यान और नि:संगता का आलंबन लिया है वे योगीश्वर धन्य हैं, और ऐसे योगीश्वर इस कामवाण से उत्पन्न हुई पीड़ा को शमन करे। यह ब्रह्मचर्य व्रत का प्रकरण है ना, तो जिसका प्रकरण हो उसका ही तो पालन किया जाता है। ऐसे योगीश्वरों के ध्यान से मेरे चित्त में कामविकार की गंध भी न रहे, ऐसी वांछा रखते हुए भक्तजन उन योगियों के गुणों का अनुराग कर रहे हैं।


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