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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:द्रव्‍य संग्रह - गाथा 24

From जैनकोष



संति जदो तेणेदे अत्थित्ति भणंति जिणवरा जम्हा ।

काया इव वहुदेसा तम्हा काया य अत्थिकाया य ।।24।।

अन्वय―जदो एदे संति तेण अत्थित्ति जिणवरा भणंति, जम्हा काया इव वहुदेसा तम्हा काया, य अत्थिकाया ।

अर्थ―जिस कारण ये पूर्वोक्त पांच द्रव्य जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म और आकाश हैं याने विद्यमान हैं उस कारण इन्हें “अस्ति” ऐसा जिनेंद्रदेव प्रकट करते हैं और जिस कारण से ये काय के समान बहुत प्रदेश वाले हैं, इस कारण इन्हें काय कहते हैं । ये पांचों पदार्थ अस्ति और काय हैं, इसलिये इन्हें अस्तिकाय कहते हैं ।

प्रश्न 1―सत् का क्या लक्षण है?

उत्तर―उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत् जो उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य करि युक्त हो उसे सत् कहते हैं । उक्त पाँचों पदार्थ उत्पादव्ययध्रौव्य युक्त हैं, इसी कारण ‘अस्ति’ संज्ञा उनकी युक्त है ।

प्रश्न 2―उत्पाद किसे कहते हैं?

उत्तर―नवीन पर्याय (वर्तमान पर्याय) के होने को उत्पाद कहते हैं ।

प्रश्न 3―व्यय किसे कहते हैं?

उत्तर―पूर्वपर्याय के अभाव होने को व्यय कहते हैं ꠰

प्रश्न 4―जो है उसका नाश तो नहीं होता, फिर पूर्व पर्याय का अभाव कैसे हो गया?

उत्तर―पर्याय सत् नहीं है, किंतु सत् द्रव्य की एक हालत है । पूर्वपर्याय के व्यय का तात्पर्य यह है कि द्रव्य पूर्व क्षण में एक हालत (परिणमन) में था अब वह वर्तमान में अन्य परिणमनरूप परिणम गया । द्रव्य का परिणमन स्वभाव है । वर्तमान परिणमन पूर्व परिणमन नहीं है, अत: पूर्वपर्याय का व्यय हुआ ।

प्रश्न 5―ध्रौव्य किसे कहते हैं?

उत्तर―अनादि से अनंतकाल तक पर्यायों से परिणमते रहने याने बने रहने को ध्रौव्य कहते हैं ।

प्रश्न 6―काल भी तो सत् है उसे “अस्ति” में क्यों ग्रहण नहीं किया?

उत्तर―यहाँ अस्तिकाय का प्रकरण है, केवल ‘अस्ति’ का नहीं हैँ । कालद्रव्य ‘अस्ति’ तो है, किंतु काय नहीं है, अत: पांचों द्रव्यों से अस्तिकाय बनाने में “अस्ति” घटाया है ।

प्रश्न 7―उत्पादव्ययध्रौव्य भिन्न समय में होते हैं या एक ही साथ?

उत्तर―ये तीनों एक ही साथ याने एक ही समय में होते हैं, क्योंकि वर्तमान परिणमन है उसे ही नवीन पर्याय की दृष्टि से उत्पाद कहते हैं और उसे ही पूर्वपर्याय का व्यय कहते हैं और ध्रौव्य तो सदा रहने का नाम है ही । अनंत पर्यायों में जो एक सामान्य चला ही जाता है उस एक सामान्य स्वभाव का ध्रौव्य निरंतर है ।

प्रश्न 8―काय शब्द का निरुक्त्यर्थ क्या है?

उत्तर―‘चीयते इति काय:’ जो संगृहीत हो उसे काय कहते हैं ।

प्रश्न 9―क्या द्रव्यों के प्रदेश संग्रहीत हुए हैं?

उत्तर―द्रव्यों के प्रदेश संग्रहीत नहीं हुए हैं, अनादि से द्रव्य सहज स्वप्रदेशमय है । किंतु संगृहीत आहारवर्गणाओं के पुंजरूप काय याने शरीर की तरह द्रव्यों में भी बहुप्रदेश हैं, अत: इन पांचों द्रव्यों को भी काय कहते हैं ।

प्रश्न 10―क्या शुद्ध द्रव्य में भी बहुप्रदेशीपना रहता है?

उत्तर―धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य व आकाशद्रव्य―ये तीन अस्तिकाय तो सदा शुद्ध ही रहते हैं और बहुप्रदेशी हैं । पुद्गलस्कंध में से किसी पुद्गलद्रव्य के शुद्ध होने पर भी याने केवल परमाणु रह जाने पर भी शक्ति की अपेक्षा बहुप्रदेशीपना है । जीव द्रव्य के शुद्ध होने पर याने द्रव्यकर्म, भावकर्म और नोकर्म इन सबसे मुक्त होने पर भी वह बहुप्रदेशी रहता है ।

प्रश्न 11―अशुद्ध द्रव्य के शुद्ध हो जाने पर सत्ता कैसे रहती?

उत्तर―पुद्गल स्कंध में से पुद्गल परमाणु के शुद्ध होने पर भी और संसारी जीव के संसार से मुक्त होने पर भी सत्ता रहती है, क्योंकि उनमें उत्पादव्ययध्रौव्य निरंतर रहता ही है ।

प्रश्न 12―परमाणु में उत्पाद व्यय ध्रौव्य कैसे है?

उत्तर―स्कंध रूप की विभावव्यंजन पर्याय का व्यय शुद्ध परमाणुरूप स्वभावव्यंजन पर्याय का उत्पाद शुद्ध परमाणु में है और द्रव्यत्व अथवा प्रदेश वही है सो ध्रौव्य है, इस तरह शुद्ध परमाणु में उत्पादव्ययध्रौव्य है । यह व्यंजनपर्याय की अपेक्षा उत्पादव्ययध्रौव्य हुआ ।

प्रश्न 13―शुद्ध परमाणु में अर्थ पर्याय की अपेक्षा उत्पादव्ययध्रौव्य कैसे है?

उत्तर―शुद्ध परमाणु में वर्तमान रूप, रसादि गुणों की पर्याय का उत्पाद व पूर्व की रूप, रसादि पर्याय का व्यय और परमाणु वही है सो ध्रौव्य इस प्रकार उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य है ।

प्रश्न 14―शुद्ध जीव में उत्पाद व्यय ध्रौव्य कैसे है?

उत्तर―मनुष्यगतिरूप विभावव्यन्जन पर्याय का व्यय व सिद्धपर्यायरूप स्वभाव व्यंजनपर्याय का उत्पाद और जीव प्रदेश वही है अथवा द्रव्यत्व वही है सो ध्रौव्य इस प्रकार शुद्ध जीव में उत्पाद व्यय ध्रौव्य है । यह व्यंजनपर्याय की अपेक्षा उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य है ।

प्रश्न 15―अर्थपर्याय की अपेक्षा शुद्ध जीव में उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य कैसे है?

उत्तर―परमसमाधिरूप कारणसमयसार का व्यय और अनंतज्ञान, दर्शन, आनंद विकास रूप कार्यसमयसार का उत्पाद व जीवद्रव्य वही है सो यही है ध्रौव्य, इस प्रकार शुद्ध जीव में उत्पाद व्यय ध्रौव्य है ।

प्रश्न 16―यह तो मुक्त होने के समय का उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य है, क्या मुक्त होने पर भविष्यत्कालों में भी उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य सिद्ध जीवों में होता है?

उत्तर―वर्तमान केवलज्ञान आदि शुद्ध विकास का उत्पाद व पूर्वक्षणीय केवलज्ञान आदि शुद्ध विकास का व्यय व द्रव्य वही, इस प्रकार उत्पाद व्यय ध्रौव्य रहता है । सिद्ध जीवों में शुद्ध विकासरूप शुद्ध परिणमन ही प्रतिसमय नव-नव होता रहता है ।

प्रश्न 17―किस द्रव्य में कितने प्रदेश हैं?

उत्तर―प्रदेशों की संख्या का वर्णन आगे की गाथा में किया जा रहा है, सो उस गाथा से जानना चाहिये ।

अब किस द्रव्य के कितने प्रदेश हैं, यह वर्णन करते हैं―


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