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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 117

From जैनकोष



सुरणरणारयतिरिया वण्णरसप्फासगंधसद्दण्हू।

जलचरथलचरखचरा बलिया पंचेंदिया जीवा।।117।।

पंचेंद्रिय जीव―अब पंचेंद्रिय के प्रकार की सूचना इस गाथा में दी जा रही है। देव, मनुष्य, नारकी और तिर्यंच जो कि कोई जलचर हैं, कोई थलचर हैं, और कोई नभचर हैं, ये सब पंचेंद्रिय जीव हैं। वर्ण, रस, गंध, स्पर्श और शब्द के जाननहार हैं। इन सब जीवों में पंचेंद्रियावरण का क्षयोपशम होता है। इनमें से जिनके नो इंद्रियावरण का उदय है वे तो असंज्ञी पंचेंद्रिय हैं। मानसिक ज्ञान का उनके विकास नहीं होता है। वे केवल स्पर्श, रस, गंध, वर्ण और शब्द को ही जानते हैं, पर जिनके नो इंद्रियावरण का भी क्षयोपशम होता है वे जीव संज्ञी हैं। इन समस्त पंचेंद्रिय में से देव, मनुष्य और नारकी जीव ये तो नियम से मनसहित ही होते हैं। तिर्यंचों में दोनों प्रकार के पंचेंद्रिय पाये जाते हैं। कोई पंचेंद्रिय सैनी और कोई असैनी, उनमें भी प्राय: सैनी पंचेंद्रिय होते हैं, असैनी पंचेंद्रिय अत्यंत कम हैं।

तिर्यंच पंचेंद्रियों के भेद―पंचेंद्रिय तिर्यंचों के ये तीन भेद किए गए हैं―जलचर, थलचर और नभचर। ये तीन भेद पंचेंद्रिय तिर्यंचों के हैं अर्थात् जो जीव पंचेंद्रिय हैं और तिर्यंच हैं उनके ये प्रकार हैं। जैसे इनका अर्थ है ना―जो जल में चले सो जलचर, जो थल में चले सो थलचर और जो आकार में चले सो नभचर। इन शब्दों

की व्याख्या मात्र ही सुनकर जो इन भेदों का स्वरूप समझते हैं उनसे पूछा जाय कि बतावो मक्खी कौन चर है? तो अक्सर ऐसा उत्तर देने लगते हैं कि नभचर होगी, क्योंकि वह तो आकाश में उड़ती है, लेकिन मक्खी कोई चर नहीं है, क्योंकि तीन भेद पंचेंद्रिय तिर्यंचों के किए गए हैं। मक्खी उड़ती है, तिर्यंच भी है, पर पंचेंद्रिय नहीं है। और पूछा जाय कि बतावो मनुष्य कौनसा चर है? तो लोग अक्सर उत्तर देते है थलचर है, जमीन पर मनुष्य चलते हैं। ठीक है, जमीन पर चलते हैं, किंतु मनुष्य को यहाँ थलचर नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ये तीन भेद पंचेंद्रिय तिर्यंचों के कहे गए हैं। मनुष्य भले ही थल पर चलता है, पंचेंद्रिय भी है, किंतु तिर्यंच नहीं है। इन तीन के प्रति पूछा जय तो जो पंचेंद्रिय हों और तिर्यंच हों उनमें छांटना चाहिए कि ये जलचर हैं या नभचर हैं?

इंद्रियविषयव्यामोह का फल―संसार के ये जीव इंद्रिय सुखों में आसक्त होकर बहिर्मुख हो जाते हैं अर्थात् आत्मस्वरूप में न ठहरकर बाहरी पदार्थों की ओर अभिमुख होते हैं ।यह एक उनका मोह का ही कार्य है । यह इंद्रियसुख वास्तविक आनंद से अत्यंत विपरीत है । वास्तविक आनंद यह है जहाँ झूठे आनंद का अंश भी न हो । इस इंद्रिय में तो झूठा ही झूठा सुख भरा पड़ा है । ऐसे झूठे सुख को भोगने में मौज तो माना जाता है, पर शांति नहीं कही जा सकती । वास्तविक आनंद तो दोषरहित शुद्ध प्रतिभासस्वरूप ज्ञानस्वभाव के ध्यान से ही उत्पन्न होता है । ऐसे आनंद से विपरीत इंद्रियसुख में आसक्त होकर व किसी अंश में अमूर्च्छित रहकर इस जीव ने जो पंचेंद्रिय जाति नामकर्म का बंध किया था उसके उदय को पाकर आज उनकी यह स्थिति है कि वे पंचेंद्रिय हुए हैं और कोई-कोई तो नौ इंद्रियावरण के उदय से असैनी हुए हैं, किन्हीं के नो इंद्रियावरण का क्षयोपशम मिला तो वें संज्ञी हुए ।

मन का कार्य―मन का काम है कि मन वाले जीव शिक्षा उपदेश ग्रहण करने की योग्यता पायें । वे शिक्षा और उपदेश ग्रहण कर सकते हैं, विवेक पा सकते हैं । असंज्ञी जीवों में विवेक शक्ति नहीं होती है । जहाँ पंचेंद्रिय के भेद किए जायें वहाँ संज्ञी और असंज्ञी हैं । जहाँ संसारी जीवों के भेद किए जाये वहाँ एकेंद्रिय, दोइंद्रिय, तीनइंद्रिय, चारइंद्रिय और पंचेंद्रिय ग्रहण करके यह खोज लेना है कि एकेंद्रिय से लेकर चारइंद्रिय जीव तक तो शुद्ध असंज्ञी होते हैं । शुद्ध का अर्थ है केवल, उनमें और न पाया जायगा, वे सिर्फ असंज्ञी-असंज्ञी ही होंगे । पंचेंद्रियों में कोई जीव संज्ञी होते हैं और कोई-कोई जीव असंज्ञी होते हैं ।

संज्ञाओं का असर―कुछ ऐसी आशंका की जा सकती है कि ये चींटियां अपना घर भी बनाती हैं, जमीन में से एक-एक कण चोंच में लाकर ठीक ऐसी, जगह पटकती हैं कि जिससे उनका बिल न ढके, और सही क्रम से डालती हैं । कही बहुत ऊपर खाने की चीज मिठाई वगैरा रखी हो तो वहाँ पहुंच जाती हैं । इन बातों को देखकर तो यह समझना चाहिए कि उनके भी मन है, विकल्प है तब इन्हें असंज्ञी क्यों कहा? समाधान उसका यह है कि प्रत्येक जीव में आहारसंज्ञा, भयसंज्ञा, मैथुनसंज्ञा और परिग्रहसंज्ञा―इन संसारी जीवों में दशम गुणस्थान तक सबमें जितना, संभव है लगी हुई हैं, वे इस ही जाति स्वभाव के हैं, उनकी गंध विषय में प्रगति है । इससे उनके आहारसंज्ञा आदिक की चतुराई अधिक है, .और वे आहारसंज्ञा, भय-संज्ञा आदि इनसे प्रेरित होकर इतना काम कर डालते हैं । मन की संभावना उन जीवों में करनी चाहिये जिन जीवों में यह भी संभव हो सके कि वे कभी तत्त्व की बात, ज्ञान की बात, विवेक की बात भी ग्रहण कर सकें । मन से कदाचित् आहार आदिक संज्ञावों को भी करें तो वहाँ मन की बात मानी जा सकती है । जहाँ शिक्षा, उपदेश, ग्रहण, विवेक ये कभी संभव ही नहीं हैं उन चेतनों में जो आहार वगैरह की इतनी प्रवृत्ति देखी जाय वह सब इन संज्ञावों के माहात्म्य से होती रहती है ।

उत्कृष्ट मन―मन तो परमात्मा आदि तत्वों को भी जानने में समर्थ है । जो परमात्मत्व तीन काल, तीन. लोक के समस्त पदार्थों के जानने में समर्थ है ऐसे विशुद्ध तत्त्व को भी जानने की शक्ति मन में है । उत्कृष्ट मन की बात तो यों समझ लीजिए कि मन तो यद्यपि परोक्ष है; पर परोक्षरूप से होकर भी परोक्ष परिच्छेदन कर के भी एक सामान्यतया समग्र की दृष्टि से यह परोक्षज्ञान विषय में केवलीप्रभु के समान है । वह कैसे? इसे यहाँ देखिये―जिसको समस्त द्वादशांग का पूर्ण ज्ञान है और उनके मन के अनुसार सब परोक्षरूप से, सामान्यरूप से सब जान लिया गया जो कि केवलज्ञान जानता है । केवलज्ञान ने जान लिया कि आकाश अनंत है तो इस मन ने भी जान लिया कि आकाश अनंत है जाना अस्पष्ट, परोक्ष और स्थूलरूप से । केवलज्ञान ने स्पष्ट जाना और विशेष याने सूक्ष्मरूप से भी जाना, आत्मीय शक्ति से भी जाना, उसकी पद्धति और है, मन की पद्धति और है, केवलज्ञान की प्रत्यक्ष पद्धति है और मन की परोक्ष पद्धति है । यह मन चतुरिंद्रिय पर्यंत जीव के कभी भी संभव नहीं है । इस प्रकार पंचेंद्रिय के प्रकार बताते हुए यह भेद कर दिया गया है कि देव, नारकी और मनुष्य ये तो नियम से संज्ञी ही होते हैं । तिर्यंचों में पंचेंद्रिय में दो प्रकार संभव हैं, चतुरिंद्रिय तक असंज्ञी ही हैं ।


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