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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 121

From जैनकोष



ण हि इंदियाणि जीवा काया पुण छप्पयार पण्णत्ता ।

जं हवदि तेसु णाणं जीवोत्ति य तं परूविंति।।121।।

भेदों में जीवत्व का परमार्थ से अभाव―इससे पहिले जो जीव का विस्तार बताया गया है इसमें इंद्रियों का वर्णन है, कायों का वर्णन है और उन वर्णनों से व्यवहार में ऐसा विदित हुआ कि जो इंद्रियाँ हैं ये ही जीव हैं । कोई एकेंद्रिय, दोइंद्रिय, तीनइंद्रिय, चारइंद्रिय और पंचेंद्रिय है ये इंद्रियों जो बाह्य में दिख रही हैं ये ही सब जीव हैं, और ये 6 प्रकार के जो काय हैं―पृथ्वीकाय, जलकाय, अग्निकाय, वायुकाय, वनस्पतिकाय व त्रसकाय, ये ही जीव हैं । ऐसी बुद्धि लोगों की व्यवहार में क्यों बनती है? इस कारण बनती है कि यहाँ सर्वत्र जीव और पुद्गल का परस्पर अवगाह पाया जा रहा है तो जो सामने दिखा, जिससे हमारा व्यवहार चलता है उसकी प्रधानता से हम जीव की प्रधानता करने लगते हैं और यह कहने लगते हैं कि ये सब जीव हैं और ऐसा व्यवहारनय से है भी ।

जीवनिकार्यों में अजीवत्व के एकांत में आपत्ति―यदि हम इन सजीव शरीरों को अजीव ही सर्वथा मानकर अपना एक कोई निर्णय बना लें तो फिर हिंसा नाम किसका है? जो जीव है असल में उसे तो कोई छू नही सकता । उसकी हिंसा कोई क्या करेगा? जिसको छुवा जाता है उसको एकांत से मान लिया अजीव पुद्गल, तो जैसे राख को चूर कर दिया तो उसमें हिंसा तो नहीं लगती, क्योंकि वह पुद्गल है, अजीव है, ऐसे ही इन कायो को चूर देने में फिर हिंसा क्यों लगना चाहिए, ये भी पुद्गल हैं । तो यद्यपि ये सब जीव हैं व्यवहारनय से, यह बात ठीक है, फिर भी निश्चयनय से देखा जाय तो उन सब संसारी जीवों में जो ये स्पर्शन आदिक इंद्रियाँ पायी जाती हैं ये सब जीव नहीं हैं, और पृथ्वी आदिक शरीर पाये जाते हैं ये सब जीव नहीं हैं, क्योंकि इनमें जीव का लक्षणभूत चैतन्यस्वभाव नहीं पाया जाता, इस कारण ये सब अजीव हैं, जीव नहीं हैं ।

भवों में जीवत्व के प्रतिषेध का भाव―यहां एक सूक्ष्मदृष्टि का अंतर भी निरखिये । इन 6 कायों और इंद्रियों को एक इस पद्धति से कहे कि ये जीव नहीं हैं और एक इस पद्धति से कहें कि ये अजीव हैं तो इनमें भी कुछ अंतर आ जाता है । ये इंद्रियाँ और काय जीव नहीं हैं, इनमें तो संभाल बनी हुई है । जीव चैतन्यस्वरूप है, ये जीव नहीं हैं और ऐसा जोर दिया गया कि इंद्रिय और काय ये सब अजीव हैं । इससे निर्णय की संभाल में कमी आयी है । ये एकांतत: अजीव ही हैं, पुद्गल ही हैं―इस प्रकार की ध्वनि जगने लगती है । यद्यपि ये व्यवहारनय से जीव कहलाते हैं तो भी निश्चयनय से ये इंद्रियाँ और ये काय जीव नहीं हैं, फिर कौन जीव है सो सुनिये ।

परमार्थ से जीवत्व का निर्देशन―इन सब इंद्रिय जातियों में इन सब द्रव्यास्तिकायों में अंत: जो स्वपर का परिच्छेदन करने रूप से प्रकाशमान ज्ञान है वह ज्ञान ही जब गुणगुणी के कथचित् अभेदरूप से निरखा जाता है तो आपको विदित होगा कि लो यह जीव है, अर्थात् इन समस्त देहधारियों में जो प्रकाशमान एक ज्ञानभाव है वह ज्ञान ही जीव है । ऐसा सीधा कहने में थोड़ी अटक वह आ जाती है कि ज्ञान तो एक स्वभाव है, धर्म है, वह तो जीव नहीं है । जीव में ही यह ज्ञान पाया जाता है, लेकिन जीव और ज्ञान भिन्न-भिन्न चीजें तो नहीं हैं । एक ही पदार्थ को जब हम उसके किसी धर्म की मुख्यता से कहते हैं तो वह धर्म धर्मी बन जाया करता है । किसी भी धर्मी को कोई शब्दों में कह नहीं सकता । कहेगा तो किसी धर्म का नाम लेकर कहेगा । तो यह ज्ञान गुण हुआ और ज्ञान में तन्मय पदार्थ गुणी हुआ । इस गुण और गुणी का अभेद करके जो बात निरखने में आती है वह ही जीव है ऐसा प्ररूपण करना चाहिए, ऐसा मानना चाहिए ।

आत्मदृष्टि के लिये भेदपरिज्ञान―जीव पदार्थ का प्रथम वर्णन चल रहा है, उसमें जीव के प्रभेद का कुछ अनेक प्रकार से विस्तार किया गया है । इंद्रियों की अपेक्षा से, शरीर की अपेक्षा से, जन्म और मरण की अपेक्षा से, भव्यत्व और अभव्यत्व की अपेक्षा से यों अनेक प्रकारों से जीवपदार्थों का वर्णन किया है । वे सब भेद विस्तार उपदेश की बातें व्यवहारनय से है । इनमें प्रयोजनीभूत जिसकी श्रद्धा करने से जीव को सम्यक्त्व होता है, शांति का मार्ग मिलता है उस जीवका स्वरूप यहाँ ध्यान में लेते रहना चाहिये । ये इंद्रियां और ये सब काय जीव निश्चय से नहीं हैं, किंतु इन सब देह के धारियों में .जो अपने को और दूसरे को जान लेने का स्वभाव रखने वाला ज्ञान पाया जाता है उस ज्ञान को उस ज्ञान के आश्रयभूत उससे असंख्यात प्रदेशों से अभेदरूप कर देने पर, क्योंकि स्वभाव से स्वभाववान भिन्न होता ही नहीं है, उस दृष्टि से जो एक ज्ञानमयता दृष्टि में आयी है उसे जीवरूप समझना चाहिए । और यह मैं हूं―इस प्रकार का विश्वास करके अपने को निराकुल अनुभव में लेना चाहिए ।


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