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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 124

From जैनकोष



आगासकालपुग्गलधम्माधम्मेसु णत्थि जीव गुणा,

तेसिं अचेदणत्तं भणिदं जीवस्स चेदणदा ।।124।।

उपादेय व अनुपादेय पदार्थों का निर्देश―जीव पदार्थ का व्याख्यान करके अब जीवपदार्थ से विपरीत जो स्वरूप रखते हैं उन अजीव पदार्थो का व्याख्यान किया जा रहा है । ये अजीव पदार्थ शुद्ध जीव पदार्थ से भिन्न हैं और ऐसा ही समझ में लाने के लिए अजीव पदार्थ का वर्णन किया जाता है । इस जीव के उपादेयभूत शुद्ध जीव पदार्थ हैं अर्थात् इस जीव में जो सहज निज ज्ञायकस्वभाव है तावन्मात्र ही मैं हूँ, इस प्रकार की रुचि करना, ऐसी ही दृष्टि करना और इसमें ही रमण करना, यही है शुद्ध जीवपदार्थ की उपादेयता । यह शुद्ध जीवपदार्थ अशुद्ध समयसार नाम से कहा जाता है । अपने आपमें जो औपाधिक भाव जगे हैं उन औपाधिक भावों का स्वभाव में अधिष्ठान न मानकर केवल एक चैतन्यस्वभावमात्र अपने को निरखना, यही है शुद्ध समयसार का ग्रहण । जीवादिक जो 9 पदार्थ हैं उनका जो कुछ भी वर्णन है उन सब वर्णनों में मर्मभूत अंतर्गत लक्ष्य यही एक शुद्ध समयसार है । जो केवलज्ञानादिक अनंत गुणों के स्वरूप वाला है अर्थात् जिस स्वभाव का शुद्ध विकास ही अनंत ज्ञानादिक कहा जाता है जिसमें भावकर्म, द्रव्यकर्म और नोकर्म का अभाव है । जहाँ नर-नारकादिक गतियों का अभाव है, मतिज्ञानादिक विभाव गुणों का अभाव है, ऐसा जो शुद्ध चैतन्यमात्र जीवास्तिकाय है वह उपादेयभूत है, उससे विलक्षण जो अजीव पदार्थ हैं उनका इस गाथा में वर्णन किया गया है ।

चेतक और अचेतक पदार्थ―आकाश, काल, पुद्गल, धर्म और अधर्म में जीव के गुण नहीं हैं, इस कारण इन पदार्थों को अचेतन कहा गया है । अचेतनता तो केवल जीव में है । चेतकपना उसे कहते हैं जो स्व और पर का परिच्छेदक हो । जीव में समस्त सत् के ज्ञान करने का स्वभाव है । ज्ञान में स्वयं ऐसी सीमा नहीं पड़ी है कि ज्ञान यहाँ तक ही जाने । यह ज्ञान पदार्थ के निकट जा जाकर जानता होता तो उसमें सीमा भी अनुमान में लायी जा सकती थी । जहाँ-जहाँ यह ज्ञान जाता वहाँ-वहाँ का ज्ञान करता, किंतु ज्ञान में ऐसा स्वभाव है कि ज्ञान अपनी जगह अपने आधार में रहता हुआ यह जो कुछ सत् है उस सबका ज्ञाता हो जाता है । यों तीन लोक, तीन कालवर्ती का समस्त पदार्थों का परिच्छेदक यह जीव ही है, क्योंकि चेतकता इस जीव में ही पायी जाती है । बाकी के समस्त द्रव्य चूंकि अचेतकता का सामान्यतया उनमें सद्भाव है अत: सभी अचेतन हैं । एक जीव में ही चेतनता है क्योंकि समस्त जीवों में चेतनत्व पाया जाता है ।


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