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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 91

From जैनकोष



जीवा पुग्गलकाया धम्माधम्मा य लोगदोणण्णा ।

तत्तो अणण्णमण्णं आयासं अंतवदिरित्तं ।।91।।

लोक की द्रव्यों से अनन्यता―जीव, पुद्गल, धर्म और अधर्म ये सभी द्रव्य और कालद्रव्य भी लोक से भिन्न नहीं हैं । इनका पिंड समूह ही तो लोक है । लोक का जहाँ स्थान है उसे लोकाकाश कहते हैं । इस लोकाकाश से वह आकाशद्रव्य अन्य भी है और अनन्य भी है, ऐसे आकाशद्रव्य अनंत है । इस गाथा में बात मुख्य यह बतायी है कि आकाश लोक से है बाहर । लोक नाम है समस्त द्रव्यों के समूह का और आकाश नाम है अवगाहना देने वाले एक पदार्थ का । तो यह आकाश इस लोक से भिन्न भी हो गया और अभिन्न भी हो गया ।चूँकि आकाश एक अखंड द्रव्य है अतएव वह लोकाकाश में भी है और अलोकाकाश में भी है ।

निश्चय से प्रत्येक पदार्थ की मात्र स्वस्वरूपता―यहाँ समस्त पदार्थों के समूह को इस लोक से अभिन्नता बताई गई है, तो भी निश्चय से वहाँ भी प्रत्येक पदार्थ अपने आप में अपने आपका एकत्व लिए हुए है । यह व्यवहारदृष्टि का कथन है । यह लोकाकाश है और समस्त द्रव्यों के समूह का नाम लोक है । जीवद्रव्य में तो जीव के अतिरिक्त शेष के सभी द्रव्य से भिन्नता है? मूर्तिरहित केवलज्ञान और सहज परम आनंद और निरंजन होना इन लक्षणों को देखा जाये तो जीव शेष द्रव्य से भिन्न है और सब द्रव्य इस जीव से भिन्न हैं, समस्त उपदेशों का प्रयोजन सब द्रव्यों से अपनी भिन्नता का सम्वेदन करना है, और इस जीव को शरण और आनंद भी इस भेदविज्ञान से ही मिलता है ।

केवलदृष्टि में शंका का अभाव―यह समस्त लोक बहुत बड़ा है, इस लोक में यह एक अकेला जीव यत्र-तत्र कहाँ-कहाँ भ्रमण कर रहा है, इसका कोई ठौर भी नियत है क्या? जिस जगह आज यह जीव उत्पन्न हुआ है, क्या उस जगह इस जीव का ठौर है । इस जीव का कोई वैभव नियत है क्या? जिस समागम और वैभव में हम आप पड़े हैं, यह हम आप से बँध गया है क्या? एक ममत्व परिणाम इस जीव को बेचैन किये जा रहा है । यों जीव को क्लेश एक ममत्व का है, मिथ्यात्व का है, अन्यथा जीव को क्लेश क्या है? हे सुख चाहने वाले मुमुक्षुजनों, सुख चाहने के लिए बाहर में यत्न नहीं करना है । बाहर के समागम तो पुण्य पाप के उदयानुसार मिला करते हैं, उसमें तुम्हारे यत्न का कुछ प्राधान्य भी नहीं है, वहाँ तुम्हारा कुछ चल भी नहीं सकता, अपने आप में अपना अंत: ज्ञानमयी प्रयत्न करें तो सिद्धि होगी । जब कभी यह आत्मा केवल रह जाये, सबसे न्यारा रह जाये, फिर इसमें कोई बाधा है क्या, कोई क्लेश है क्या? कोई शंका भय है क्या? वह तो अपने आपके स्वरूप में केवल ज्ञानमग्न रहकर अपने को कृतकृत्य कर लेगा ।

एकत्वदर्शन का आशय―भैया! यह प्रोग्राम सोचो यहाँ, हमें तो केवल बनना है ।केवल बनने के लिए अभी से अपने स्वरूप को केवल मानने लगें तो केवल बन जायेंगे । यह आत्मतत्त्व अन्य समस्त द्रव्यों से भिन्न है । यद्यपि इस लोक में बड़ा अवगाह हो रहा है । जहाँ मैं हूँ वहीं पुद्गल हैं, वहीं धर्म अधर्म हैं, वही आकाश, काल हैं, हम कहाँ जाये कि जहाँ केवल हम ही हम रहें और वहाँ शेष द्रव्य न हों । ऐसा कोई स्थान आपको विदित है क्या? कहाँ जायेंगे आप? लोक से बाहर तो आप जा न सकेंगे । रहेंगे तो लोक में ही । सर्वत्र जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, काल पड़े हुए हैं, आकाश तो व्यापक है ही । कौनसी जगह जायें कि आप अकेले रह सकेंगे? अरे बाहर में अकेलापन नहीं खोजना है । कहीं रहा आये यह जीव, अपने आपके स्वरूप का कैवल्य देखकर यह अपने आपको अकेला समझे । मैं सबसे न्यारा केवल अपने स्वरूपमात्र हूँ, निर्लेप केवल ज्ञानमात्र अपने आपकी प्रतीति हो वहाँ शंका नहीं, भय नहीं ।

ममत्व का बंधन―जो मनुष्य दुःखी हैं, शंकित हैं, भयभीत हैं उनके क्लेश का कारण यह है कि बाह्यपरिग्रहों में ममत्व परिणाम लग रहा है । जैसे किसी गाय को ले जाना है तो उसकी जो छोटी बछिया है उसे आप ले जाइये । अधिक नहीं चल सकती है तो आप उसे गोद में उठाकर चलने लगें तो वह गाय अपने आप पीछे-पीछे भागती है, तो जैसे यह गाय ममता के कारण पराधीन है ऐसे ही ये समस्त संसारी जन ममता के कारण परपदार्थों के इतने तीव्र आकर्षण में पराधीन हो गए हैं । इस जगत में इस जीव के लिए कोई दूसरा सहाय होगा क्या? कोई किसी के दुःख को मिटा देगा क्या? किसी इष्ट वियोग वाले पुरुष या महिला को समझाने के लिए मित्र जन व नाते रिश्तेदार सभी आते हैं तो वे सब उसके दुःख को मेटने में समर्थ हैं क्या? अरे वे कोई भी उसके दुःख को मेटने में समर्थ नहीं हैं । वह ही खुद अपने ज्ञान की संभाल करे तो उसका वह दुःख मिट सकता है । जहाँ उसने इतना ज्ञान बनाया कि इस संसार में मेरा कहीं कुछ नहीं है, मैं तो अकेला हूँ, आज इस भव में अन्य किसी गति से आ गया हूँ, यहाँ कौन किसका है, सभी न्यारे-न्यारे जीव हैं, यहाँ किसका शोक करना? यों ज्ञान बनाते ही वे सारे दुःख अपने आप टल जाते हैं ।

इक आवत इक जात―एक कवि ने कहा है, उस स्थिति का चित्रण खींचा है जब कि बसंत ऋतु के आने का समय होता है, जब पुराने पत्ते झड़ने लगते हैं―‘‘पात गिरता यों कहे―सुनो वृक्ष बनराय । अब के बिछुड़े कब मिले दूर पड़ेंगे जाये ।।’’वृक्ष से बिछुड़ता हुआ पत्ता मानो कह रहा है कि हे वनराज अब हम तुम से बिछुड़ रहें हैं, न जाने तुम से बिछुड़कर कहाँ के कहाँ उड़ जायेंगे? अब हम तुम से कहाँ मिल सकते हैं, कहाँ मिल सकेंगे? तब उत्तर में वृक्ष कह रहा है―‘‘वृक्षराज यों बोलियो, सुन पत्ता इक बात । या घर या ही रीत है इक आवत इक जात ।।’’तब वह वृक्ष कहता है कि अरे पत्ते! एक बात तो सुन ले, तुम इसकी क्या फिक्र करते हो? यह तो इस संसार की रीति है कि एक आता है तो एक जाता है, एक जाता है तो एक आता है । ऐ पत्ते ! यदि तुम हम से बिछुड़ रहे हो तो दूसरे नये पत्ते तुम्हारी जगह पर आ जायेंगे । तो इस जगत में किसका शरण ढूंढ़ते हो, यहाँ कोई सहाय न होगा ।

अपनी संभाल―भैया! यह संसार अशरण है, इस अशरण संसार में अपने आपकी जिम्मेदारी संभालनी होगी । भेदविज्ञान करके सर्व से भिन्न अपने आपके स्वरूप का प्रतिबोध करना और अपने को केवल रखकर अपने ज्ञान और आनंद स्वरूप से तृप्त बने रहना, यही है अपनी संभाल । मैं समस्त द्रव्यों से भिन्न हूँ । यद्यपि जहाँ मैं हूँ वहाँ सभी द्रव्य हैं, फिर भी मेरे स्वरूप में किसी अन्य द्रव्य का प्रवेश नहीं है तथा कभी भी मैं अपना गुण अथवा पर्याय किसी द्रव्य को देने में समर्थ नहीं हूँ । हूँ मैं यहाँ लोक में और इसी लोक में है सभी पदार्थ ।रहने दो, जान लिया इन सब परपदार्थों को । समस्त पदार्थों का जो समूह है इस समूह का नाम लोक है, किंतु आकाश अनंत है, वह लोक में भी वही है और लोक के बाहर भी वही है अर्थात् आकाश जो लोकरूप से है लोक से बाहर नहीं है और बाहर है जो वह केवलरूप से है ।इस प्रकार इस गाथा में लोक से बाहर यह आकाश है, अखंड असीम, इसकी प्ररूपणा की गई है । आकाशद्रव्य नित्य शुद्ध है । इसकी चर्चा में विषयप्रवृत्ति का अवकाश नहीं है । विषयवासना से दूर रहना आत्मकल्याण ही तो है ।


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