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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:परमात्मप्रकाश - गाथा 100

From जैनकोष



अप्पसहावि परिटि्ठयइ एहउ होइ विसेसु ।

दीसइ अप्पसहावि लहु लोयालोउ असेसु ।।100।।

जो पुरुष आत्मा के स्वभाव में प्रतिष्ठित हैं उनके स्पष्ट तो यह विशेषता होती है कि आत्मस्वभाव में उनको सारा लोक-अलोक शीघ्र दिख जाता है । अपना स्वभाव शीघ्र दिख जाता है और इसके प्रसाद से समस्त लोक-अलोक शीघ्र दिख जाता है । तुम्हें चाहिए क्या? आनंद ना तो जिस विधि से आनंद मिलता है उस विधि से क्या भय करना? आनंद ही तो चाहिए । मोह के छूटने से आनंद मिलता है तो मोह के छूटने का भय क्यों करते हो? आनंद तो वास्तव में मोह के छूटने में ही है । पौराणिक पुरुषों पर निगाह करिये, राम, कृष्ण आदि जब तक मोह के संसर्ग में रहे तब तक कितने-कितने कष्ट उठाये और जब सुमति जगी, वैराग्य बढ़ा और निजब्रह्म के स्वरूप में झुके तब वे समस्त संकटों से दूर हो गए । क्या कोई जन्म लेते ही भगवान् हो जाता है? जन्म के समय वह बलस्वरूप है । इसी प्रसंग में वह विरक्त है, शुद्ध है, ज्ञानी भी है फिर भी भगवान् नहीं है । जब सर्व बाह्यतत्वों को छोड़कर केवल ज्ञानस्वरूप अपने स्वभाव में प्रतिष्ठित होता है तब भगवत्ता प्राप्त होती है । इस मन को समझाना और इसे धर्म के प्रकरण में लगाना, यह बहुत बड़ा विवेक है ।

भैया ! स्नेह का फल तो क्लेश है । स्नेह करके किसी का भी पूरा नहीं पड़ता । यदि किसी से स्नेह है तो वियोग के समय में अत्यंत क्लेश होते हैं । जितना सुख 10-20 वर्ष में पाया है वह सारा सुख वियोग के समय एक ही दिन में खत्म हो जाता है और 10-20 वर्ष का दुःख मानों इकट्ठा होकर उस समय आता है । स्नेह ही बंधन है । बंधन और किसी दूसरी चीज का नहीं है । आपका शरीर सबसे अलग है । आपका आत्मा सबसे अलग है । आप अपने आपमें ही रहकर जितना चाहें विचार बना डाल सकते हैं । फिर बंधन क्या है? मकान से बँधे नहीं, परिवार से बँधे नहीं, वैभव से बँधे नहीं । आप छुट्टा, खुले, अकेले ही विराज रहे हैं ना । लेकिन भीतर में जो कल्पनाएं छायी हैं उन कल्पनाओं का तो ऐसा बंधन है कि बंधन के स्थान से रंच भी हिल नहीं सकता है । बस, जो आत्मस्वभाव में प्रतिष्ठित हैं उनको तोषधन है और इस समाधि के कारण उनमें इतना विकास होता है कि वे समस्त लोकालोक को शीघ्र देख लेते हैं । अर्थात् वही बात हुई कि एक आत्मा को जान लो तो सब कुछ ज्ञात हो जाता है ।

भैया ! एक आत्मा को ही न जान पाया तो सारी विडंबनाएँ हो जाती हैं । अपने निजी घर का पता न हो तो पर घर डोलते फिरो । वहाँ कोई साधन न दे देगा । विश्राम किया जा सकता है तो अपने घर में ही किया जा सकता है । अपना घर वास्तविक क्या है? इस पर तो दृष्टि करो । मेरा घर मेरा ज्ञानस्वरूप है । जहाँ से कोई हटा नहीं सकता । मैं ही खुद भ्रमरूप होऊँगा तो हो जाऊंगा । मेरे क्लेशों का फल मुझे ही भोगना पड़ेगा । मेरा घर सर्वसुख से भरपूर है । उसको तो छोड़ दिया, और परद्रव्यों की आशा में जुट गए । ये बाह्य समस्त चेतनपदार्थ, जिनसे कुछ लेना न देना; भिन्न हैं । फिर भी ये दिन-दहाड़े लूटते चले जा रहे हैं । ये नहीं लूट रहे हैं, हम खुद पर चेतन-अचेतन में उपयोग फँसाकर लुटते चले जा रहे हैं । सब केवल अपने विषयकषायों के साथी हैं।

एक सेठ थे । उनके चार लड़ के थे । 5 लाख की जायदाद थी । सब जायदाद का उसने बँटवारा कर दिया और अपने हिस्से का 1 लाख रुपयों प्रमाण धन अपने कमरे में भींत में चुनवा दिया । अब सेठजी बूढ़े हो गये, मरणासन्न अवस्था हो गई । पंच लोग आकर कहते हैं कि तुम्हें दान करना हो, पुण्य करना हो तो करलो । उस समय सेठजी की जबान थक गई थी । भेंभें उनकी आवाज हो रही थी । बोल तो नहीं सकते थे । हाथ का इशारा करके बतला रहे थे कि देखो जी ! इन भींतों में रखा है वह सारा धन, उस धन को ले लें, पंच लोग और वहीं दान में लगा दें । अब इस बात को पंचों में से कोई न जान सका कि यह इशारे से क्या कहता है ? लड़कों को बुलाया और पूछा, बच्चों ! यह तुम्हारे पिताजी क्या कह रहे हैं? बच्चों ने सब जान ही लिया था कि यह सब दान की कह रहे हैं । पर बच्चे लोग क्या कहते हैं कि मेरे पिताजी साहब यह फरमा रहे हैं कि मेरे पास जितना धन था वह सब इन भींतों में खर्च कर दिया । अब मेरे पास कुछ नहीं है । वह सेठ यह सुन रहा था तथा सोच रहा था कि मेरी तो इच्छा थी कि पाप से धन कमाया तो अब अपने ही हाथ से अपने जीते-जी इस धन को सुकृत कार्य में लगा जायें । पर ये बेटे लोग उस बात को घुमा रहे हैं कि एक पैसा भी दान में नहीं लगने देते ।

सब प्राणी अपने विषयकषायों के साथी हैं । मिला कोई आपको ऐसा निरपेक्ष बंधु, जो कुछ अपेक्षा न रखे और आपके हित की बात सोचा करे । छोटा बच्चा भी ऐसा न होगा । उसके भी खेलने में, स्वार्थ में बाधा हो गई तो आप से बिगड़ जायेगा । कौन है ऐसा, जो निरपेक्ष आपकी सेवा कर सकता हो? फिर जो तन, मन, धन पाया; वह सब इन मोही, कुटुंबीजनों पर ही न्यौछावर करने के लिये है क्या? अरे ! उनका भी गुजारा चलाओ और अपना भी मार्ग साफ रखो और परिवार को भी धर्म के मार्ग में लगाओ । स्वार्थ की साधना, विषय पूर्ति की कामना न रहे । यह जगत् धोखे से परिपूर्ण है । जैसे बच्चे लोग किसी लड़के को छकाने के लिये बिना चुनी चारपाई पर चद्दर तान देते हैं और कच्चे डोरे से पावा से चद्दर का छोर कस देते हैं और आते हुए बालक से कहते हैं आइये, बैठिये । वह बैठता है तो बैठते ही सिर और पैर बराबर हो जाते हैं । जैसे वह तनी सफेद चादर एक धोखा है इसी प्रकार ये चिकने-चाकने वैभव, परिवार, शकलें; ये सब धोखा हैं।

सिद्ध भगवान् के आनंद को कौन प्रकट करता है? उनका आनंद उनकी आत्मा में से ही प्रकट होता है । इसी प्रकार आपके आनंद को कौन प्रकट करता है? आपका आनंद आपमें से स्वयं प्रकट होता है । यदि एक आत्मा को जान लिया तो सब कुछ जानने में आ गया । कहते हैं लोग ना, कि एक बड़े को पकड़ लो फिर सारा काम बन गया । तो जगत् में बड़ों में बड़ा अपना आत्मतत्त्व है । इस आत्मतत्त्व की उपासना करो, प्रेक्टिकल, ज्ञानमात्र ही मैं हूं―ऐसा परिणमन करके एक निजी पुरुषार्थ प्रकट करें तो शाश्वत सुख इसके प्रकट हो जायेगा । अब इसी अर्थ का दृष्टांत के द्वारा समर्थन करते हैं ।




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