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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:परमात्मप्रकाश - गाथा 102

From जैनकोष



तारायणु जल बिंबियउ णिम्मलि दीसइ जेम ।

अप्पए णिम्मलि बिंबियउ लोयालोयवि तेम ।।102।।

जैसे जल में तारागण प्रतिबिंबित हो जाते है उसी प्रकार निर्मल आत्मा में ये लोकालोक प्रतिबिंबित हो जाते हैं । इस जीव के दुःख का कारण मुख्य तो इच्छा है और उसका सहकारी है ज्ञान की कमी । किसी पुरुष के ज्ञान की कमी नं हो तो इच्छा नहीं हो सकती । सर्वज्ञान होता है तो इच्छा काहे की । पता नहीं, वह चीज मेरे पास आयेगी यान आयेगी; ऐसी दुविधा में इच्छा उत्पन्न होती है । ज्ञान हो गया, फिर इच्छा क्या? तो इस इच्छारूपी डाकिनी का सहकारी कारण ज्ञान की कमी है । यह ज्ञान जितने आत्मप्रदेश हैं उतने में ही रहता है । मगर इसमें सारा लोक और अलोक प्रतिबिंबित हो जाता है । दर्पण चार छ: अंगुल का ही है मगर प्रतिबिंब जो रहता है वह दस-पंद्रह हाथ का पदार्थ प्रतिबिंबित हो रहा है । एक थाली जो एक या डेढ़ वेथा की है उसमें कितने ही तारागण प्रतिबिंबित हो जाते है । तारागणों का तो हजारों मील का माप होगा । हजारों मील में फैले हुए तारागण एक बेथा लंबी थाली में प्रतिबिंबित हो जाते हैं । यह तो दृष्टांत है । पर आत्मा का ऐसा विलक्षण प्रताप है कि यह एक जगह है, पर लोकालोक इसमें प्रतिबिंबित हो जाते हैं ।

भैया ! सुख किसी दूसरों से नहीं मिल सकता है । या तो कान से ही आनंद लूटो या स्त्री, पुत्र, धन; इनके राग और कल्पना का ही स्वागत कर लो । दो बातें एक साथ नहीं हुआ करती । या मोक्ष ही पालो, मोक्षमार्ग पर ही चल लो या मोही बनकर संसार पदार्थो में ही अपना अंधकारपूर्ण उपयोग बना लो । क्या रखा है इन बंधनों में? अरे ! इन बंधनों से क्षोभ पा रहे हो तो इन बंधनों को छोड़ दो । बच्चे लोग भी भावों के लड्डू-पेड़ा बनाकर कंकड़-पत्थर की पंगत किया करते हैं । धूल परोस दिया तो लो यह बूरा है । कुछ मोटा कंकड़ है तो लो ये बूंदी हैं । कुछ ढेलासा हुआ तो लो ये लड्डू हैं । वे बच्चे अपने भावों को ही बनाकर प्रसन्न रहा करते हैं । आप उत्कृष्ट अभीष्ट भाव बनाकर प्रसन्न रहो ।

भाई ! यद्यपि शरीर का बंधन छूटा हुआ नहीं है, कर्मों के बंधन से हम-आप जुदा नहीं हैं । हम बुरे फंसे हैं । पता नहीं, अभी अच्छे भाव हैं, इस ढंग का भी विश्वास नहीं है । एक सम्यग्दृष्टि ऊंची श्रेणी में चढ़कर ग्यारहवें गुणस्थान से भी गिर पड़ता है, ऐसा विकट यह संसार-बंधन है, लेकिन परवाह नहीं है । इस बंधन को तोड़ने की कुंजी तो एक ही है । अपने शुद्ध ज्ञानस्वभावरूप अपने आपका विश्वास बनाना । दूसरी औषधि ही नहीं है । आनंद लो, सत्य आनंद लो । छोटे आनंद का संकोच भी न करो । जैसे गाड़ी आने का टाइम है और कुछ मुसाफिर या रिश्तेदारों से मिलने के कारण, सत्कार के कारण बैठ गए, तो बैठ लो । गाड़ी तो छूट गई । तो ऐसा ही यह जीवन चला जा रहा है । यह तो बहुत मूल्यवान् धर्मसेवन करने का अवसर था और इन इने-गिने 10-20-50 मोहियों में ही फँसकर अपनी प्रगति से चूक जायें, तो लो, गाड़ी तो छूट जायेगी । अब मिल लो उन मोहियों से, इन मोहियों से प्रीति अधिक है तो कुछ डर नहीं है । तुम प्रभु ही तो हो । खूब इन मोहियों से मोह कर लो । खूब डटकर मोह कर लो । यहाँ क्या मिलन हो रहा है? आपका शरीर अलग बैठा है, इन मोहियों का शरीर अलग बैठा है । यह क्या मिलन है? बढ़िया मिलन तो वह है कि शरीर एक हो और उसके अधिकारी जीव अनंत हों । ऐसी मिलन बढ़िया मिलन कहलायेगा । पसंद करो अच्छा, यह मिलन क्या मूल्य रखता है । हम आपके शरीर से प्रेम चाहें और आपका शरीर अलग रहा, हमारा शरीर अलग रहा, हम और आप एक नहीं हो पाते हैं । तो यह मिलन क्या मिलन है? निगोद पर्याय में एक में एक मिल जायेंगे । शरीर एक मिल गया और अनंत जीव उसके अधिकारी हैं, तो अब मिल लो खूब । यह मिलने का फल है ।

विवेकी पुरुष वही है जिसके अंतर में अलौकिक दुनियां चलती है । भीतर से परमार्थ आत्मा के लिए रहता है और ऊपर से यथार्थ धर्म के लिए रहता है । विवेकी पुरुष वही है जिसको जीवन में कभी आकुलता नहीं होती । सम्यग्ज्ञानी पुरुष में इतना साहस है कि समय आए और सब छोड़ना पड़े तो सबको छोड़ने में विलंब नहीं करता । बड़े-बड़े महाराजा लोग जाते हैं गुरुओं के दर्शन करने के लिए ठाठ-बाट से, सेना सजाकर श्रृंगार करके और जितने आभूषण हों सब पहिनकर बड़े साज से जाते हैं, साधुओं के पास दर्शन को और ज्ञान की मणि का चमक जाये तो वह मुकुट, हार सब त्याग करके वहीं निर्ग्रंथ हो जाते हैं । यह है सम्यग्दृष्टि का सार । चाहे ऐसा जीवन में कभी न कर पाये, किंतु अपने उपयोग से तो पूछो । क्या अपने में इतना साहस है कि अवसर यदि आये तो सब कुछ त्यागकर हम अपने एकत्वस्वरूप को संभाल सकें? जिसमें इतना साहस है उसको ही श्रावक कहते हैं, उसको ही उपासक कहते हैं । गृहस्थ उसका नाम है जिसके यह भावना रहती है कि मैं मुनि बनूँ । तो क्या केवल वचनों से कहने की बात है । मुनि बनने का अर्थ यह है कि मैं कब सकल संन्यास करके निजी शुद्ध एकत्व स्वरूप को देखूँ ।

सम्यग्दृष्टि ज्ञानी गृहस्थ तो यहाँ बेकारसा रहता है । चाहता है आत्मध्यान पर उसकी पूर्ति नही है । चाहता नहीं है परिवार का राग, उसका उसे बखेड़ा लग रहा है । उस परिवार को वह नहीं चाहता है । ज्ञानी गृहस्थ बच्चे को गोंद में लेकर खिला रहा है, पर ध्यान इस ओर है कि इन परवस्तुओं की आपत्ति से छूटकर मैं कब अपने ज्ञानानंदस्वरूप आत्मा में रमण करूँ? जब यह भावना है तो बच्चे को खिलाने का शौक है क्या? नहीं, और रह रहा है घर में जो भावना कर रहा है उसका आनंद है क्या? वह तो दोनों आनंदों से गया । ज्ञानी गृहस्थ न परिवार का मजा लेता है और जो उसके अंतरंग की भावना है, न उसका आनंद उसे मिलता है । तो क्यों भैया ! इससे तो मिथ्यादृष्टि ही अच्छा होगा । वे मिथ्यादृष्टि कम से कम लड़कों का तो डट कर आनंद पा रहे हैं । इस सम्यग्दृष्टि को तो न राग का आनंद आया और न वैराग्य का आनंद आया । तो क्या सचमुच में वह ज्ञानी गृहस्थ बेकार है? नहीं । इस सम्यग्ज्ञानी के मूल में ऐसा सम्यग्ज्ञान पड़ा हुआ है कि कैसी भी स्थिति में हो, सब जगह वह अनाकुल रहता है । इसकी प्रकृति ही ऐसी है ।

बरुवासागर में एक सेठ मूलचंदजी थे । तो उनके यहाँ एक नौकर था । उसका हँसने का स्वभाव बहुत था । बात-बात पर हँसता था । मनुवा नाम था । सो उनकी सेठानी के बीमारी चल रही थी । एक दिन वह गुजर गई । सो गुजरने पर तो बहुत से काम करने पड़ते हैं, चंदन लाना, कफन लाना, घी लाना आदि । तो कहा कि मनुवा को बुलाओ, वह बाजार से कफन, चंदन आदि ले आवे । वह नहीं आया । जब बड़ी देर से वह आया तो सेठजी ने कहा कि तू कहाँ गया था? यहाँ सारा काम करना है । बोला, सेठजी ! हमारा-हंसने का स्वभाव है । आपकी तो मर गई सेठानी और मैं हंस देता तो अच्छा न होता । सेठजी भी उसकी बात को सुनकर हंसने लगे ।

तो ज्ञानी के ऐसी विरक्ति की प्रकृति पड़ी हुई है । लोगों में ऐसा जंचता है कि जैसे और गृहस्थ हैं वैसे ही यह है । इसने कौनसा काम किया? वैसी ही दुकान है जैसी कि एक मिथ्यादृष्टि की है । जैसा एक मिथ्यादृष्टि देख रहा है वैसा ही यह देख रहा है । जैसे झंझट औरों के लगे हैं वैसे ही इसके भी लगे हैं, ‘‘किंतु ज्ञानी अपने भीतर में अपने साहसपूर्ण ज्ञान को निहारता है, जिसके बल पर वह स्वाधीन है, सुखी है ।’’

इस जगत में दूसरे जीवों से न कुछ लेना है, न कुछ देना है, न साथ आये हैं, न साथ जायेंगे, न कोई संबंध है । फिर इस मोही जीव को दूसरे जीव प्रियतर क्यों लग रहे हैं? प्रियतर ही नहीं, प्रियतम लग रहे हैं । जो कुछ हैं, ये ही तो हैं । ये ही मेरे हैं और कोई कुछ नहीं है । अरे ! इस मिथ्यात्व की आड़ को तोड़े बिना जीव को शिवमय पद नहीं मिल सकता । व्यर्थ का यह झंझट और तुम ममता करते हो तो वे खुश हैं, और न ममता करो तो वे खुश हैं । वे आनंद से अपना जीवन बिता रहे हैं । तुम्हारी चिंता से घर का पालन-पोषण नहीं हो रहा है । उनके पुण्योदय से उनका पालन यों ही हो रहा है । तुम उनकी चिंता करो तो क्या, न करो तो क्या? यह आत्मा जब ज्ञानबल से अपने आपको रागद्वेषरहित अनुभव करता है तो इन रागद्वेष विकल्पजालों से रहित इस आत्मतत्त्व में सारा लोकालोक प्रतिबिंबित हो जाता है ।

भैया ! वही बात कल कही, वही बात परसों कही, वही बात आज कही; फिर भी नई-नई सी बातें मालूम पड़ रही हैं । ‘दृष्टोऽपि समारोपात्तादृक्’ यह न्याय सूत्र है । जानी हुई चीज को बार-बार जानना न्याय में दोष बताया है । जान लिया कि यह चौकी है, यह चौकी है । कोई सुनता होगा तो पागल बतायेगा । जानी हुई चीज को बार-बार जानना अप्रमाण है । पर जानी हुई चीज भी यदि विस्मृत हो जाये तो उसका जानना अप्रमाण नहीं है, इस आत्मतत्त्व को रोज पौण घंटा बैठकर जानते हैं, सुनते हैं; पर 23।। घंटे में वह सब भुला देते हैं । जब भूल गए तो वही बात फिर कर लो; क्या हर्ज है? उसमें कोई दोष नहीं है । कल वही भोजन किया । आज भी वही किया और कल भी वही करेंगे, क्योंकि वह भोजन पच चुका । वह भोजन के रूप में पेट में कहाँ है । तो फिर भोजन करना पड़ रहा है और कल भी पूजन को, दर्शन को आए और आज भी । यह क्या है कि रोज-रोज आते हैं । अरे ! आ गए, देख लिया, ऐसी मूर्ति है, हो गया । अरे ! देखा न हो तो आये देखने कि मूर्ति कैसी है? यह क्या कर रखा है कि रोज-रोज सुबह हुआ नहीं कि पूजा में पहुंच गए । फिर दूसरा दिन हुआ नहीं कि पूजा में पहुंच गये । यह क्या कर रहे हैं? कल देखा था, फिर भूल गए । क्या करें, कि वह देखा अनदेखा बन गया । उस बीच के पीरियड के कारण वह अनदेखा बन गया । फिर देखा बनाने को आते हैं । तो यह आत्मा जब निर्मल बनता है तो उसमें यह समत लोकाकाश प्रतिबिंबित हो जाता है ।

अब यह बतला रहे हैं कि यह आत्मा और परपदार्थ जिस ज्ञान से जाने जाते हैं, जिस आत्मा के द्वारा जाने जाते हैं उसको तुम स्वसंवेदन ज्ञान के बल से जानो । अपने इस जीवन में कभी तो हिम्मत बनाओ कि हमें कुछ नहीं सोचना है । जो बिगड़ना होगा, बिगड़ जायेगा । कहा जायेगा? जब ये उसके मंत्री प्रेसीडेन्ट कुछ साल पहिले जब यहाँ आये और जब यह सुना कि उनके स्वागत में लाखों रुपया खर्च हो गए । ऐसा सुना था तो लोग यह सोचते थे कि भारत ने 25 लाख, 50 लाख व्यर्थ में खर्च कर दिये । थोड़ी देर बाद ऐसा ध्यान आया कि खर्च कर दिया तो कहाँ गया? जिन्होंने काम किया वे भारत के ही तो हैं । उन्होंने ही तो खाया । जिन्होंने झालर बनाई, बिजली जलाई और जिन्होंने श्रृंगार किए, उनमें ही तो वह पैसा लगा । वे भारत के ही तो थे । भारत का पैसा भारत में ही रहा । कहा गया? तो ऐसा ही मान लो कि परिवार भी चला जाये, धन भी चला जाये तो सब चला जाने दो, लोक में ही तो हैं सब । यदि हम आज मनुष्यभव में न होते और होते किसी गधा-सूअर के भव में । तो यहाँ की चमक-दमक, चटपट-अटपट क्या थी हमारे लिए? चमत्कार, चांदनी मेरे लिए कुछ न थी ।

भैया ! लो एक-दो मिनट के लिए ही बात कह रहे हैं । केवल 2 मिनट के ही लिए अपने अंतर में से सारा भार निकाल कर फेंक दो । केवल दो मिनट की बात है । अपने को निर्भार अनुभव करलो । अरे भाई ! कैसे निर्भार अनुभव कर लें? घर के इन 10-15 जीवों का तो हमारा ही आधार है । अरे ! नहीं है आधार । उनका म से अधिक पुण्य है कि वे तो मजे में आराम से बैठे हैं और श्रम करना पड़ता है खुद को, आपको । उनका बुरा कुछ नहीं होगा । यदि उनका बुरा भी होगा तो उनसे अधिक बुरा आपका अपना होगा । क्योंकि आप पुण्यहीन हैं और जिनकी चिंता करते हो वे आपसे पुण्य में अधिक हैं । आपको उनकी चिंता करनी पड़ी, इसलिए आपसे अधिक पुण्य उनका है, जिनकी चिंता करते हो । केवल 2 मिनट की बात कह रहे हैं । अपने मन को समझा-बुझाकर एक-दो मिनट को निर्भार तो बन जाओ । अपने ज्ञान का प्लेटफार्म क्लियर तो कर दो । केवल 2 मिनट की बात है । इन दो मिनटों में ही यदि आपको सहजस्वरूप ज्ञानज्योति, विद्युत की तरह झलक दिखा दे तो सदा के लिए निहाल हो जाओगे ।

उम्र तो सारी पड़ी हुई है मोह के लिए । हम आपको धर्म लिए कम वक्त है और मोह के लिए कम वक्त नहीं है । मोह के लिए तो सारी जिंदगी पड़ी है । पर कभी तो दो मिनट के लिए अपने को निर्भार अनुभव करो । यदि यह जीव अपने को निर्भार अनुभव कर ले तो ऐसा ज्ञानप्रकाश प्रकट होगा कि जिसमें अलौकिक आनंद मिलेगा । फिर आप उसे सदा स्मरण ही करते रहेंगे । जिस आत्मा की खोज के लिए बड़े-बड़े महाराजाओं ने सारी विभूति का त्याग किया, उस आत्मा की खोज गृहस्थी में भी की जा सकती है और साधुपद में भी की जा सकती है । यह तो ज्ञान है । यदि अज्ञान की योग्यता है, मोह का कलंक है, और यदि वह सकल सन्यास भी कर ले, साधु पद भी पा ले तो भी वहाँ क्या होगा? जिसके तेज जुकाम है, नाक बह रही है, ऐसे पुरुष को साबुन से नहलाकर बढ़िया रेशमी कपड़े पहिनाकर, सिर पर चंदन, इत्र आदि लगा कर बैठाल दें, तो क्या होता है? अभी 1।। मिनट के बाद में नाक की बत्तियां निकलेगी । अज्ञान की योग्यता वाले पुरुष बड़ा व्रत, तप व संयम भी करते हो; मगर मोक्षमार्ग के हक में उनकी क्या उठती है? वे तो संसार के खंभे ही बने हुए हैं । इस अज्ञान ने ही हम-आप, सबको बरबाद किया है ।

भैया ! गुप्त ही गुप्त, भीतर ही भीतर अपना अनुभव कर लो । अकेले अपने को जानकर, सर्वपदार्थों में जो होता हो, हो । किसी पर वास्तव में अधिकार भी नहीं है । सब पदार्थों का स्वरूपास्तित्व जुदा-जुदा है, स्वतंत्र-स्वतंत्र है । क्या होता है? एक बार भी तो अपने को निर्भार अनुभव करो । कोई साझेदारी की दुकान है और कुछ साझेदारी से जरा मन बिगड़ गया है और इस समय यदि कुछ स्पष्ट बात कह देते हैं तौ इसमें 15 हजार का टोटा पड़ेगा । तो दब रहे हैं, अशांत हो रहे हैं, व्याकुल हो रहे हैं और कहो इस संकोच में 15 के बजाय 25 की संख्या हो जाये और हिम्मत करलो कि मेरे 15 तो गए, स्पष्ट चर्चा करलो तो व्याकुलता भी खत्म हुई, सही मार्ग भी आया और देखो अब चिंता भी नहीं रही, क्योंकि पहिले ही मान लिया कि अब साहस करो और सुखी होओ ।

कितनी चिंताएं हैं अपने को । जरा एक कापी में तो लिख लो । अमुक बीमार है, न जाने यह मर जायेगा तो क्या होगा, अमुक मुकदमा है, कहो इसमें 10 हजार चले जायें, अमुक घर में बिगड़ रहा है, न जाने यह रूठ ही जाये । एक बार में ही सबको कबूल लो । वैभव गया तो जाने दो । यह गुजरता है तो गुजर जाये । जितनी भी अनिष्ट शंकाएं हैं उन सबको कबूल कर लो और एक औषधि पी लो कि आखिर ये सब परद्रव्य ही तो हैं । इनमें यदि कुछ हो गया तो क्या हुआ, कौनसी बात मेरे स्वरूप में घट गई । किसी भी प्रकार की बात सामने आए तो अपने को निर्भार अनुभव कर लो । केवल एकत्व स्वरूपमय ज्ञान प्रकाशमात्र, आकाश की तरह अमूर्त निर्लेप अनुभव करलो । इससे ही प्रभुता के दर्शन होते हैं । उस प्रभुता की भेंट होने पर फिर यह निश्चित हो जाता है कि अब संसार के जन्म-मरण न रहेंगे । जिस आत्मा को जान लेने पर संसार के सारे संकट टल जाते हैं, आचार्यदेव इस उत्थानिका में कहते हैं कि तुम उस निज आत्मतत्त्व को स्वसंवेदन ज्ञान के बल से जानो । केवल जाना ही क्या, अपने आपमें उसको उस रूप में अनुभव करते हुए समझो । जैसे कोई चीज बनी हो ना । बढ़िया इमरती बनी हो तो क्या कहते हैं? दूसरे मित्र से कि अजी ! जरा इस इमरती को देखो । उसका अर्थ इतना विकला कि मित्र ने मुँह पसारा और खा लिया । अरे ! तुम से देखने को कहा था कि इस इमरती को देखो और तुमने तो खा लिया । इमरती का देखना आंखों से होता ही नहीं है, वह तो खाकर ही होता है । सो कहते हैं कि जरा अब इस निज आत्मा को जान लो, इसका जानना इन इंद्रियों से होता ही नहीं है । उस आत्मतत्त्व को स्वसंवेदन ज्ञान के बल से अपने आपके स्वरूप को चबाकर, अनुभव करना ही आत्मा का जानना कहलाता है । सो कह रहै हैं कि तुम उस आत्मा को स्वसंवेदन ज्ञान के बल से जानो, इस प्रकार का अब कथन करते हैं ।


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