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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:परमात्मप्रकाश - गाथा 122

From जैनकोष



णियमणि णिम्मलि णाणियहं णिवसइ देउ अणाइ ।

हंसा सरवरि लीणु जीम महु एहउ पडिहाइ ।।122।।

निर्मल मन में अर्थात् जो रागादिक से रहित मन है, उसमें, यह अनादि देव निवास करता है, अपने आत्मा का जो सहज स्वरूप है वही देव है और वह अनादिकाल से एकस्वरूप है । ऐसा यह देव ज्ञान के निर्मल मन में निवास करता है । इसमें एक दृष्टांत बतलाते हैं कि जैसे हंस सरोवर में लीन होता है, स्वच्छ सरोवर में हंस निवास करता है, इसी प्रकार स्वच्छ मन में यह परमात्मा निवास करता है । हे प्रभाकरभट्ट ! उसका ऐसा प्रतिभास होता है यहाँ परमात्मा को दी गई है हंस की उपमा और निर्मल मन को दी गई है सरोवर की उपमा । जैसे महान् सरोवर कल्लोलों से रहित है तभी तो गंभीर कहलाता है । तो यह मन भी रागादिक तरंगों से, मायाजालों से रहित है । ये तरंगें क्यों उत्पन्न होती हैं? स्त्री के रूप का अवलोकन, भोगों का सेवन, विषयसाधनों की चिंताएँ आदिक विकल्पों से ये रागादिक तरंगें उत्पन्न होती है । ये समस्त तरंगे चित्त में आकुलता को उत्पन्न करने वाली हैं । ऐसा रागादिक तरंगों के मायाजाल से रहित निज मन में परमात्मा लीन होता हुआ ठहरता है । जैसे सरोवर नीर से भरा हुआ होता है जिसमें कि हंस निवास करता है । इसी प्रकार यहाँ यह निर्मल मन आनंदरस के जल से भरा हुआ है । यह आनंदरस परम सुख की सुधा है । यह रागद्वेषरहित है, निज शुद्ध आत्मद्रव्य के श्रद्धान ज्ञान और आचरण से यह आनंद अमृत प्रकट होता है । यह मैं आत्मा अपने आपको सत्ता के कारण जिस रूप हूँ उस रूप में अपना अनुभव हो जाय तो यह आनंद अमृत प्रकट होता है । ऐसे निर्मलज्ञान नीर से भरे हुए मानसरोवर में, जो वीतराग स्वसंवेदन ज्ञान से तैयार किया हुआ है ऐसे निर्मल मन में परमात्मा लीन होता हुआ ठहरता है ।

हंस जैसा स्वच्छ निर्मल होता है वैसी ही निर्मलता को बताने के लिए परमात्मा को हंस की उपमा दी है । वैसे तो हंस कहाँ तो संसारी जीव, दुःखी प्राणी, तिर्यंच गति का; किंतु इस बात को नहीं देखना है, केवल एक स्वच्छता का दृष्टांत निरखना है । जैसे हंस निर्मल सरोवर में रहता है, इसी प्रकार परमात्मा निर्मल मन में विराजता है हंस शब्द में पहले परम और लगा दो तो उसका नाम होता है परमहंस । और परमहंस नाम के साधु भी बताये जाते हैं । परमहंस का अर्थ तो है उत्कृष्ट हंस, स्वच्छ, निर्मल । परमहंस शब्द का और भी अर्थ देखो । परं अहं स: । परं का अर्थ है उत्कृष्ट परमात्मा, अहं के मायने ‘मैं’ यानी अंतरात्मा और ‘स:’ मायने वह अर्थात् बहिरात्मा । इसमें बहिरात्मा अंतरात्मा और परमात्मा की बात कही गई है । उसमें क्या छोड़ना चाहिए, क्या ग्रहण करना चाहिए―इस बात को समझना है । अथवा जो परमात्मा है सो मैं हूँ यह अर्थ निकलता है परमहंस का । परं अहं स: । जो अपने आत्मा की परमात्मा के स्वरूप से तुलना करता है वह महात्मा संसार की बेड़ियों से शीघ्र निपट जाता है और जो अपने आपको जिस पर्याय में उत्पन्न हुआ उस पर्यायरूप अनुभव करता है वह संसार में रुलता रहता है ।

हमें धर्मदृष्टि प्राप्त हुई या नहीं, इसकी परीक्षा तो बड़ी सीधी है । आपको अपने संबंध में यदि यह जानने की उत्सुकता है कि हमारे उपयोग में धर्म का प्रवेश हुआ है या नहीं, तो यह देखो कि हम अपने को क्या समझ रहे हैं? यदि अपने को पुरुष हूँ, स्त्री हूँ, खंडेलवाल हूँ, अग्रवाल हूँ, परिवार वाला हूँ, अमुक पोजीशन का हूँ, इन्सान हूं―इस रूप विश्वास है तो यह समझो कि धर्म का प्रवेश नहीं हुआ । मैं आत्मा आकाश की तरह अमूर्त निर्लेप निरंजन हूँ । कहां तो इन्सान है, कहां परिवार पोजीशन वाला है । यह तो शुद्ध ज्ञानस्वरूप है जैसे कि भगवान् अरहंत और सिद्ध हैं । अपने आपमें यदि यह विश्वास बन गया हो कि मैं तो केवल एक चैतन्यस्वरूप हूँ और चूंकि परपदार्थ प्रति समय बर्तते रहते हैं, परिणमते रहते हैं, सो यह मैं आत्मा भी प्रत्येक समय परिणमता रहता हूं―यदि ऐसा विश्वास है तब तो धर्म का प्रवेश है ।

पर्यायबुद्धि की बलिहारी तो देखो कि एक कन्या, जिसका विवाह नहीं हुआ तो कैसी निर्भयता और स्वतंत्रता पूर्वक अपने संरक्षक जनों के बीच रहती है । कपड़े कैसे ही पहिने है तो परवाह नहीं है; किंतु भांवर पड़ जाने के 2 मिनट बाद ही उसकी चाल-ढाल तो देखो, कैसे कपड़े संभाल कर चलती है, और कैसी उसकी चाल हो जाती है? भांवर पड़ने के बाद किसी ने शिक्षा नहीं दी; माता, चाची, भाभी, किसीने सिखाया नहीं, पर यह तो पर्यायबुद्धि की बात है ।

उसके मन में यह विश्वास आ गया कि मैं वधू हूँ । तो उसे वधू के योग्य ही सब काम करने पड़ते हैं । उसे सिखाता कौन है? यह जीव तो स्वयं चैतन्यस्वरूप है, पर मनुष्यपर्याय में है तो कौन उसे सिखाता है? पर मनुष्य के योग्य वह कार्य कर रहा है । तिर्यंच में यह जीव पहुंचता है तो कौन वहाँ सिखाता है, चार पैरों से चलना और हरी घास खाना कौन सिखाता है? जिस गति में यह जीव पहुंचता है स्वत: ही वहाँ उसकी चाल-ढाल वैसी ही हो जाती है । तो इस पर्याय में जो अटका है, बस वही परमात्मा से भेंट न होने का कारण है ।

भैया ! जैसे घर के कमरे की तिजोरी में उसके भीतर संदूक में रखी हुई आप अपनी अंगूठी तुरंत कैसे जान जाते हैं? अपनी अंगुली में आप देखते हैं तो सोचते हैं अरे ! अंगूठी कहाँ गई? ओह ! पाव सेकंड भी नहीं लगा कि यह ज्ञान किवाड़ को तोड़कर, भींत को चीरकर, संदूक के अंदर पहुंच जाता है । ज्ञान हमारा इतना पैना है । वह ज्ञानशरीर को फोड़कर, रागद्वेष आदि भावों को तोड़कर क्या अपने ज्ञानस्वरूप में नहीं पहुंच सकता है? पर प्रयत्न नहीं किया । काम सुगम है, सरल है, पर यत्न न करने के कारण वह सब कठिन मालूम पड़ रहा है । आत्मा का सुख केवल आत्मा की दृष्टि में है, दूसरों से अपने को शरण मानना, अपने को अशरण अधिक बना देता है । तो इस लोक में हमारा आपका साथी कोई नहीं है । सब स्वार्थ साधने के साथी हैं । वास्तविक साथी अपना है तो मात्र आत्मदर्शन है ।

पहले समय में जब राजाभोज का जमाना था बहुत से कवि लोग अपनी-अपनी कविताएँ सुनाने आते थे । राजा उन्हें खूब इनाम देता था । तो एक बार चार देहातियों के मन में आया कि हम भी कोई कविता ले जाएं, राजा को सुनाएँ तो मनमाना इनाम मिलेगा । सो उन चारों देहातियों ने यही ठाना कि दरबार में चलना चाहिए । सो चले । रास्ते में एक जगह एक बुढ़िया रहँटा कात रही थी उसे देखकर एक देहाती बोला कि मेरी कविता तो बन गई । क्या बन गई? सुनो―‘चनर-मनर रहँटा भन्नाय ।’ उसे रहँटा दिख गया कि वह चनर-मनर कर रहा है सो कविता बना डाली । फिर आगे चले तो देखा कि तेली का बैल दूर बंधा खली भुस खा रहा है । दूसरा बोला कि हमारी कविता बन गई । क्या बन गई? सुनो―‘कोल्हू का बैल, खली भुस खाय ।’ अब आगे बड़े तो तीसरे देखा कि एक धुनिया कंधे पर बीजना लिए चला आ रहा है । तीसरा बोला कि हमारी भी कविता बन गई । क्या बन गई, सुनो―‘वहां से आ गए तरकसबंद ।’ अब तीन की तो कविता तैयार हो गई । अब चौथे से कहा कि कविता तैयार करो । उसने कहा कि हम कविता पहले से नहीं बनाते है । हम आशुकवि हैं । हम मौके पर ही बना लेते हैं । सो मौके पर ही बनाकर तुरंत बोल देंगे । चारों देहाती राजा भोज के दरबार में पहुंचे । दरबार में द्वार पर पहरेदार था । उस पहरेदार से कहा कि राजा साहब से बोल दो कि आज चार महाकवीश्वर आए हैं । उसने राजा से कहा महाराज ! आज तो चार महाकवीश्वर आए हैं । उन्हें बड़े विनय से राजा ने बुलाया ।

चारों देहाती दरबार में खड़े हो गए । उन्होंने कहा महाराज ! छंद तो बनाया है एक, मगर हम लोगों की कला अद्भुत है, एक-एक चरण बनाया है । राजा ने कहा सुनाओ । वे क्रम से बोल रहे हैं । अब चौथे ने जो बोला वह भी बता दें । तीन चरणों के बाद में जो अंत में चौथा चरण होगा वह समझ लेना कि चौथे की कविता है । सुनो ‘चनर-मनर रहँटा भन्नाय, तेली का बैल खली-भुस खाय । वहाँ से आ गए तरकस बंद, राजाभोज है मूसरचंद ।’ अब इस कविता को सुनकर राजा-दंग रह गया । तो राजा साहब पास में और बैठे हुए पंडितों से कहते हैं कि इस कविता का अर्थ लगाओ । कविता तो सुनकर लगी मूर्खता भरी, पर जब राजा ने यह देखा कि पंडित लोग भी इसका अर्थ नहीं सोच पा रहे हैं तो यह कविता अवश्य गहरे मर्म की है । तभी तो पंडित लोग इसका अर्थ नहीं लगा पा रहे हैं । एक चतुर वृद्ध ब्राह्मण बैठा था । कहा, महाराज ! हम अर्थ लगाते हैं । यह कविता बड़े ही गहरे रहस्य की है । पहले भाई का यह कहना है कि ‘चनर-मनर रहँटा भन्नाय’ मायने हमारे महाराज चनर मनर, चनर मनर रहंटा से 24 घंटा मन्नाया करते हैं ।

इस 24 घंटा मन्नाने को तो महिलाएँ ही जानती है । जब सुबह होता है तो मंदिर में आना, फिर मंदिर से आकर रसोई बनाना, बच्चों को खिला पिलाकर स्कूल भेजना, फिर सबके खिलाने के बाद स्वयं खा लेना, तब तक बज गए 2 । अब बर्तन मांजना, दूसरे दिन के खाने के सामान की व्यवस्था करना; अब बज गए चार । फिर दुबारा शाम के लिए भोजन बनाना, फिर सब बच्चों को खिलाना-पिलाना और सबको खिलाकर स्वयं खा लेना । इस तरह से 2 मिनट भी नहीं बैठ पाती हैं । जब अंथोउ करवा दिया तो फिर शाम हो गई । अब फिर वही मंदिर से आना, मंदिर से आने के बाद अब हो गई रात, सो बच्चों जाकर सुलाना, बच्चों को सुलाने के बाद में मुश्किल से स्वयं ने भी थोड़ी नींद ली । जब नींद थोड़ीसी ले चुकी, तो फिर वही सवेरा हो गया । फिर मंदिर जाना, भोजन बनाना, फिर वहीं सारी क्रियायें चला करती हैं । तो इस तरह स्त्रियों का रहंटा चलता है ।

अब पुरुषों का रहंटा देख लो । जब सुबह हुआ तो जिन्हें मंदिर का शौक है वे मंदिर जाते हैं सूर्योदय से पहले पूजन किया, पाठ किया, फिर समाजसेवा की बातें करना; भोजन करके दुकान जाना, दुकान वाले दुकान गए, आफिस का काम करने वाले आफिस गए, फिर शाम हो गई, फिर भोजन किया । ऐसी ही चर्या चलती रहती है ।

हे महाराज ! आप भी चनर मनर रहटा सा भन्नाया करते हैं । यह बात तो प्रथम कवीश्वर साहब ने कही । दूसरे की बात सुनो महाराज! दूसरे कविराज यह फरमा रहे हैं कि ‘कोल्हू का बैल खली भुस खाय’ याने महाराज कोल्हू के बैल की तरह से रात-दिन जुत रहे हैं और खाने को क्या मिलता है केवल खली और भूसा । इसका अर्थ यह है कि रात-दिन कोल्हू के बैल की तरह से जुत रहे हैं, फिर भी आराम से भोजन भी नहीं मिलता है । क्योंकि चिंता तो कमाई व व्यवस्था की रहती है । यहाँ गए, वहाँ गए; कभी दो बज गए, कभी चार बज गए । ठीक-ठीक खाने को भी नहीं मिलता है । तो महाराज दूसरे कवीश्वर ने यह कहा है तीसरे कवि महोदय का यह कहना है कि ‘वहाँ से आ गए तरकसबंद ।’ मायने इतने में यमराज आ गए, आयुक्षय आ गया, तरकस बंद आ गया, मायने मरण का समय आ गया । फिर ये चौथे कवीश्वर जो आशुकवि हैं, यह कर रहे हैं कि आफत तो ऐसी बीत रही है, पर ये राजा भोज इतने मूसरचंद हैं कि अपने कल्याण की बात भो नहीं सोच रहे हैं । लो, अर्थ लगा दिया । मूसरचंद कहते हैं मूर्ख को, जैसे मूंग होता है धान कूटने वाला । तो उसमें कोई कला नहीं है । वह तो सीधा गिरे और सीधा उठे, उसमें कुछ चतुराई नहीं है । इसी तरह मूर्ख पुरुष में कोई चतुराई नहीं होती है ।

तो ऐसी इस संसार की स्थिति है । जो अपने घर से हटकर परपदार्थों में फिर रहे हैं उनको शांति नहीं है, उन्हें जन्ममरण ही भोगना पड़ता है । अरे ! जिनको प्रसन्न करने के लिए इतनी चेष्टाएं और विकल्प करते हो, वे समागम सदा न रहेंगे । यह पर्याय भी सदा न रहेगी । सब बिछुड़ जायेंगे । प्रसन्न करो अपने आपको । निर्मल बनाओ अपने आपको प्रसन्न बनाने का अर्थ है निर्मल बनना । सो निर्मलचित्त बने तो वहाँ परमात्मदेव बसता है । मलीन आशय से ज्ञानस्वरूप को कैसे खबर पड़ सकती है? ज्ञान का अनुभव तो तभी होता है जब इस ज्ञान के साथ कोई राग, द्वेष की टो न रहती हो । सो ऐसा निर्मलचित्त बने, वहाँ ही देव का निवास है ।

दो भाई थे । सो मान लो बड़े भैया ने कहा छोटे भैया से कि जाओ, आज तुम भगवान् की पूजा करो और आज रसोई के लिए लकड़ी नहीं है, सो मैं जंगल से लकड़ी बीनकर लाता हूँ । छोटा भैया पूजा में गया और बड़ा भैया जंगल में लकड़ी बीनने चला गया । पर पूजा करने वाला भाई सोचता है कि मुझे कहां आफत में डाल दिया, यहाँ मन ही नहीं लगता है और वह भाई आम के पेड़ पर चढ़ा होगा, जामुन के पेड़ पर चढ़ा होगा और बढ़िया-बढ़िया आम जामुन खा रहा होगा । बड़ा भैया सोचता है कि मैं यहाँ कैसी आफत में आ गया । वह भैया तो भगवान् के भजन गाने में मस्त होगा, भगवान की पूजा कर रहा होगा । यहाँ मन लगने की कोई बात नहीं है । मैं बंधसा गया हूँ । अब यह, बतलाओ कि पुण्यबंध किया है जंगल में रहने वाले भैया ने कि मंदिर में गए हुए भैया ने? जंगल में लकड़ी बीनने वाले भैया ने ही पुण्यबंध किया । इस तरह भावों की विचित्रता देखो कि जंगल में लकड़ी बीनता हुआ भी भगवान् की पूजा कर रहा है और पुण्यबंध कर रहा है और वह मंदिर में खड़ा हुआ भी पाप बंध कर रहा है ।

मंदिर तो साधन है । कहीं यह नियम नहीं है कि मंदिर में आकर पुण्य ही बंधे-बंध तो भावों के अधीन है । जिसका परिणाम संसार, शरीर और भोगों से विरक्त है, इस संसार की किसी भी वस्तु की वह वांछा नहीं करता है । क्या देखना है इस लोक में? जो होगा वह पुद्गल ही तो होगा और भी क्या विशिष्ट रस चखना? ‘घाटी नीचे माटी’ गला घाटी है और चलाया और माटी हो गया । अव्वल तो यह देखो कि गले के नीचे उतरा क्या ? जब तक थालों में था, एक-एक बूंद का दाना चमक रहा था और कितनी शोभा पा रहा था । अब क्या हुआ कि लड्डू को जैसी स्थिति बनाकर गले से उतार लिया । गले से उतारते समय मुँह दबाकर जरा एक्सरे से मुख देखो तो जी मचला जायगा । और गले से उतारते समय ही उगल दो और फिर उसे देखो तो क्या देखने को जी चाहता है? नहीं । फिर पेट के अंदर उसे गले से उतार दिया तो फिर वह मिठाई बन गया । उसी को खाकर लोग आनंद मानते है, जिसको कि आंखों से देखने पर जी मचला जायगा । खैर मान लो आनंद; पर गले के नीचे उतारने पर फिर तो वह मिट्टी की तरह हो गया । फिर कितना ही जोर लगावें कि उसका स्वाद मेरे उपयोग में वापिस हो जाये, सो नहीं हो सकता है ।

भैया ! क्यों विषयों पर इतराते हो? संसार में कोई भी पदार्थ सारभूत नहीं है जो कि तुम्हारे सुख का साधक हो । फिर संसार में किस चीज को चाहें? इस शरीर को क्या चाहें? इसमें तो सारी अपवित्रता ही भरी हुई है । इसमें कुछ भी सार नहीं है और भोगों को भी क्या चाहें? भोगों के विकल्प जब तक रहते है तब तक यह जीव मोक्षमार्ग से जुदा बना रहता है । तो संसार, शरीर और भोगों से विरक्त रहकर अपना जीवन व्यतीत करो और शुद्ध ज्ञानस्वरूप आत्मभगवान् की सुधि लेते रहो तो इस दुर्लभ नरजीवन को सफल समझो ।


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