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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:परमात्मप्रकाश - गाथा 37

From जैनकोष



जो परमत्थे णिक्कलुवि कम्मविभिण्णउ जो वि ।

मूढा सयलु भणंति फुडु मुणि परमप्पउ सो जि ।।37।।

जो आत्मा परमात्मा शरीर से रहित है, कर्मों से रहित है यदि ऐसा ही बनने का भाव हो कर्म नोकर्म रहित अपने आपकी भावना करना चाहिये ।

मुनिजन अपने को शरीररहित कर्मरहित देखते हैं । ज्ञानी संत उसे अपना अस्तित्वमात्र देखता है । अपने स्वरूपमात्र जो ज्ञानस्वभाव आत्मा है उसे परमात्मा जानो । मूर्ख पुरुषों को तो जो आंखों दिखे वही सच है, जो इंद्रिय के द्वारा ज्ञात हो वही सच है । उनकी छोटी बुद्धि में जितनी बात समाई है वही सच है । जैसे एक हँस उड़कर आया और एक कुएं के पाट पर बैठ गया । कुए में था एक मेंढक तो वह मेंढक बोलता है कि तुम कौन हो? हम हंसराज हैं । कहां रहते हो? मानसरोवर में रहते हैं । वह मानसरोवर कितना बड़ा है । बहुत बड़ा है आखिर वह मेंढक एक टाँग पसार के बोलता है कि क्या इतना बड़ा है । अरे इससे बहुत बड़ा है । दूसरी टाँग पसार के बोला कि क्या इतना बड़ा है । भाई वह तो बहुत बड़ा है । तीसरी चौथी टांग पसारकर बोला कि इतना बड़ा है । अजी इससे बहुत बड़ा है । तो वह मेंढक एक पार से दूसरी पार पहुंचता है तो क्या इतना बड़ा है? अजी बहुत बड़ा है, तो फिर मेंढक कहता है कि इससे बड़ी तो दुनियां भी नहीं जितना कि मैंने उछलकर नापा है । इससे बड़ी तो दुनिया भी नहीं है, तो मूर्ख की बुद्धि में जो बात आती है उसके लिये वही सच है । और यहाँ झगड़ा किस बात पर चलता है, मूर्खों को अपनी बुद्धि पर ही विश्वास है कि विवेकी है तो हम हैं और बुद्धिमान हैं तो हम हैं । इस जगत् में डेढ़ अकल है । एक पूरी अकल तो हमें मिली और आधी अकल सारी दुनियां को बट गई, ऐसी दृष्टि होती है मूर्ख की, वह तो आंखों देखी सच मानता है । जो आंखों से देखा गया है यह है भौतिक जाल । नास्तिक जन इस शरीर को ही तो प्रमाण मानते हैं, जीव इससे अलग कुछ नहीं है । लोग कह भी देते हैं कि―‘‘यावज्जीवेत्सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत् । भस्मीभूतस्य देहस्यपुनरागमनं कुत: ।’’ जब तक जीवे, सुख से जीवे । ऋण हो जाय तो भी घी पीवे, भोजन करे तो अच्छा, रूखे सूखे नहीं रहो खूब घी खाये । अरे यह शरीर भस्म हो जायेगा, फिर आयेगा नहीं । यह तो उपहासकों का कहना है पर नास्तिकों में से पड़े लिखे तो यह कहते हैं कि तर्कोऽप्रतिष्ठ: श्रुतयो विभिन्ना, नासौ मुनिर्यस्य वच: प्रमाणम् । धर्मस्य तत्त्व निहितं गुहायां, महाजनों येन गत: स पंथा ।।

मैं किसका सहारा ढूँढू? जितनी बुद्धियां हैं उनकी कोई प्रतिष्ठा नहीं । वकील लोग जानते हैं कि सत्य क्या है झूठ क्या है ? सत्य को झूठ बना देते है और झूठ को सत्य, तर्क की कोई प्रतिष्ठा नहीं है । आगम की बात देर के तो सब जुदे-जुदे भिन्न-भिन्न हैं, ऐसा कोई आचार्य है नहीं एक, जिसके वचन प्रमाण माने जायें और फिर धर्म का तत्त्व तो गुफा में रखा है इस तरह बहुत गुप्त है, अँधेरे में है? सो हम तो यही जानते हैं कि जिस रास्ते से महाजन निकले हैं, जैसे आचार को महाजन लोग करते हैं, हम तो इसही को मार्ग समझते हैं । यह पड़े लिखे नास्तिकों का कथन है । यह सब ऊपरी-ऊपरी भ्रमण है ।

जैसे कोई एक ऐसा खेल होता है । बच्चे उसमें गोली रख देते हैं और उसे हिलाते रहते है जब तक कि वह गोली निश्चित किए हुए गड्ढे में नहीं आ जाती तब तक वह गोली फिरती रहती है । कब तक हमारे तर्क विचार, कल्पनाएं घूमती रहेंगी, जब तक एकस्वरूप निज ज्ञानमात्र आत्मतत्व में उपयोग नहीं पहुंचे, घूमती है । कारण यह है कि कुंडली कोई ऐसी वस्तु जिसमें चित लगा दें तो उस वस्तु की तरफ से धोखा नहीं हो, चाहे हम अपनी कल्पना से हट जायें किंतु उस वस्तु में धोखा नहीं हो, ऐसी जगत में कोई वस्तु है? नहीं है । स्त्री पुत्र है उनमें ऐसी विचित्र कषाय भरी है, आपके भाव के अनुकूल सबके परिणमनकार्य भी मुश्किल हैं । 8-10 वर्ष का बालक है, खेल में लगा हुआ है । तुम उससे कहो कि एक गिलास पानी ला दो, हमें प्यास लगी है । वह सुनेगा ही नहीं, आपका प्रिय बालक है पर उसके कषाय में आये तो सुनेगा । आपकी कषाय के कारण नहीं सुनेगा । किसी दूसरे से मन भी मिले जाय तो वह मेल क्षणिक है, नष्ट हो जाने वाला है, नष्ट हो जायेगा तो उसका सहारा क्या है? और परमात्मतत्व की तो यह बात है कि जो परद्रव्य शुद्ध परमात्मा है उसका सहारा तो होता ही नहीं क्योंकि आत्मा अपना ज्ञानदर्शनस्वरूप है । केवल आधार लेगा तो वह अपना ही लेगा आपमें पर आधार लेने की सामर्थ ही नहीं । कदाचित् कहें कि अरहंत सिद्ध भगवान का सहारा मिले तो वह तो धोखा न देंगे । वे अपने स्वरूप में लीन हैं, आप कितने ही जोर से स्तवन पढ़ें । तपस्या कर करके थक जाते हैं पर अपना उन्हें जरा भी ध्यान नहीं है । वे अपना ज्ञान संभालें या इस मलीन आत्मा का उद्धार करें । उनका क्या सहारा है? हां सहारा इसमें है कि हम उनके गुणों का स्मरण करते रहें । हम अपने आपकी स्वभाव दृष्टि में लीन रहते हैं तो सारा काम बन जाता है । यह तो तीनों काल में सर्व पर से व सर्व परभाव से जुदा है । यदि मेरे कहने से भगवान अपना निजासन छोड़ करके मुझे उठाने आ जायें तो समझो कि जैसे खोटे संग से खोटी बातें यहाँ लोकों में जल्दी आ जाती है, उसी तरह भगवान में भी खोटापन जल्दी आ गया । फिर महिमा क्या रही? भैय्या वह तो शुद्ध है अनंत केवलज्ञानदर्शन शक्ति व आनंद के लिये है । यदि बे कुछ करने लगे तो उसकी सब इज्जत धूल में मिल जायेगी कि हजारों आप जैसे करो के पुरुष उनका तो ध्यान करते हैं, फिर तो उनका बहुत काम बढ़ जायेगा । सो निश्चय करो―परमात्मा अपने में ही अपना काम करता है । किसी का सहारा लें यहाँ जो अशुद्ध प्राणी हैं, उनका सहारा लेने से लाभ नहीं और जो शुद्ध परमात्मा है वह परद्रव्य है उनका सहारा उन्हें स्वीकार नहीं । फिर किसका सहारा लें कि हम अपने को संकटों से बचा सकें । वह सच्चा सहारा है अपने आपके सहजस्वरूप को अपने आपमें देखना । इस प्रकार कि केवल मैं अपने सत्व के कारण जैसे स्वरूपवाला हूँ । दर्पण यद्यपि किसी न किसी छायारूप परिणमता रहता है, उसे कहीं भी ले जाओ, ट्रक में बंद कर दोगे तो ट्रक के पड़ला की छाया आ जायेगी और कपड़े में बांध देंगे तो कपड़ों की छाया आ जायेगी । आप उसे जहाँ भी रख देंगे तो उसके पास जो भी उपाधि होगी उसकी छाया आ जायेगी । पर ज्ञान बल से उस साफ स्वच्छ दर्पण के कारण दर्पण का क्या स्वभाव है? क्या छाया पड़ना स्वभाव है? उसका तो स्वच्छ स्वभाव है । इसी तरह यह पुरुष घर में रहता है तो वहाँ भी विकल्प हो जाता है और समाज में बैठता है तो वहाँ भी विकल्प, राग, द्वेष कल्पनायें चलती रहती हैं । उदय है,फिर भी अपने आपमें सोचो तो मेरे अपने आपके अस्तित्व के कारण आत्मतत्व के नाते मेरा क्या स्वरूप है । क्या विकल्प करना? रागद्वेष करना, यह मेरा स्वरूप है? नहीं । मेरा तो केवल प्रतिभासमात्र स्वरूप है । जगत के सर्वपदार्थों से उत्कृष्ट विलक्षण स्वरूप इस आत्मा का तत्त्व है । कल्पना करो कि दुनियां में ये तो सारी चीज हों, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल । एक जीव भर नहीं हो तो इस लोक की क्या स्थिति होगी? कुछ है ही नहीं समझिये । जीव किसी को जानते है तब वह है का काम कर रहा प्रतीत होता है । तो ज्ञात होता है कि उसकी व्यवस्था करने वाला, उसे जानने वाला अव्वल है । जीव नहीं होता तो यह सब कुछ नहीं होते । जो कुछ ये नजर आते हैं वे सब जीव के शरीर हैं । यह खंभा खड़ा है । अब जीव नहीं है पर खान से लाये थे, खोदा था वहां पर पृथ्वी का जीव था । यह जो कपड़ा बिछा हुआ है, अगर जीव नहीं होता तो यह दरी नहीं हो सकती । दरी सूत से बनी है और सूत कपास का अंग है और कपास पौधे का अरज है, पौधा एक वनस्पति जीव है, उस जीव का यह शरीर है । एक कोई सी ककड़ी उठाकर बता दो कि जो जीव का शरीर नहीं है । तिनका कछु भी चीज कोई बता दे कि यह जीव का शरीर नहीं है, ऐसा कुछ है ही नहीं । इस पत्थर का भी आकार बना, यह भी जीव के संबंध से बना, शरीर बना और बढ़ा यह भी जीव के संबंध से बना । इस कारण इसे कुछ लोग कहते हैं कि यह सब जीवमात्र है, ब्रह्म है, एक है, सर्व व्याप्त है । सब जीव तो चैतन्य चमत्कार हैं और उन्हें अपने स्वरूप का अनुभव हो जायेगा तो ज् स चमत्कार का कहना ही क्या? राजा भरत चक्रवर्ती रानियों के बीच, राजाओं के बीच, संपदा के बीच रहता हुआ भी उदास था । समझ में आ गया कि सर्व का अस्तित्व भिन्न-भिन्न है । इतने समझने का वह प्रताप है कि घर में रहते हुए भी उसके कर्म का निर्जरण होता रहा । भैय्या सुख के लिये अनेक यत्न किये जाते हैं । इन यत्नों में जितना श्रम करता है उसका दवा हिस्सा भी यदि वह इस ज्ञान के अर्जन में लगा दे, फिर देख लो गृहस्थ की शोभा, बहुत बड़े शृंगार । कोई सेठ बड़ी सभा में बैठा है जो वह बड़ा धनी है और उस सेठ पर इस धन के साथ-साथ ज्ञान और विद्या का अक्षय भंडार हो, वह सेठ उस समाज में, पंडितों आदि से टक्कर ले सके तो और सम्मान बढ़ जाता है । इस प्रकार बाहर के शृंगार का क्या देखना? जिसका सम्यग्ज्ञान जग गया तो भीतर में उसका आनंद झरता रहता है । केवल प्रताप है सम्यक्त्व का । सच है तो मान लो और न सच है तो मत मानो । एक सब्जी बेचने वाला कहे कि आम मीठा है चूसकर देख लो मीठा न निकले तो दाम मत दो । और आम चूसकर देखो कि मीठा है अथवा नहीं, तो वहाँ दोनों का ही विश्वास नहीं है और वह चूसना भी नहीं चाहता तो वहाँ भीतर से और तरह से विश्वास करें । ग्राहक सोचता है कि कलमी आम चूसा और उसको चूसने पर पसंद नहीं आया तो क्या यह दाम नहीं लेगा और वह सोचता है कि चूसने के बाद झूठ मूठ बोल दूंगा । तो दोनों को अविश्वास है । यहाँ तो आचार्य कह रहे हैं कि लोग एक बार उस आत्मस्वरूप की झलक कर लें और तुमको पसंद आये तो उसे स्वीकार कर लें और नहीं आये तो छोड़ दें । यहाँ तो अविश्वास की बात नहीं है, हिम्मत बनाने की बात है । मोह से आपका पूरा तो पड़ेगा ही नहीं तो मोह को छोड़ देने में उलझन क्या है? गृहस्थी को राग छोड़ने की बात कह रहे हैं । केवल मोह छोड़ने की बात से धन कमाना सरल है या क्या आत्मा की सुधि लेना सरल है? धन परद्रव्य है । दूसरे की पेटी में पड़ा है । धन का क्रय-विक्रय रूप है उस पर आपका अधिकार नहीं है और जोर लगाने पर भी धन सुरक्षित रह सके तो उसका भी आज के जमाने में विश्वास नहीं है । किसी की चीज ली, निकल आई चोरी में दंद फंदे हैं पैसा के आगे आने में । जो आत्मा अपने में आप है । आप अपनी सुधि लेना चाहते हैं, सबसे दृष्टि हटाकर एक ज्ञानस्वरूप की सुधि लेनी चाहिये तो तुरंत ले सकते हो । पैसा तो बड़ा

सरल लग रहा है पर आत्मा की सुधि लेना बड़ा कठिन लग रहा है । यही तो मोह की लकड़ी फिरी हुई है कि कठिन चीज सरल लग रही है और सरल चीज कठिन लग रही है । आप स्त्री से प्रसन्न रह सकें यह बहुत कठिन बात है । नाना प्रकार के कषायभाव स्त्री के हैं, किस किसकी पूर्ति का विकल्प करेंगे । न मानों तो कर के भी देखो तो नए-नए विचार आयेंगे । इन विकल्पों को छोड़कर अपने आपको अकेला ज्ञानमात्र निरखकर अपने को प्रसन्न सुगमतया रख सकेगा । यह सरल काम है बहुत सरल काम है । पर लग रहा वह सरल जो सब मोह का काम है पराधीन काम है । बड़ा साहस चाहिये, बड़ी हिम्मत चाहिये । आप अपनी आय से कोई दुकान या मिल कुछ भी खोलते है, आपको उसमें 2-3 लाख रुपया लगाना ही पड़ता है और दो साल तक क्या आशा की जाय कि उसमें से कुछ निकाल सकें खर्च कर डालें । पर विधिपूर्वक काम बने तो 2 साल बाद ही मन माना सब कुछ मिलता है तो यह आर्थिक प्रसंग की बड़ी तपस्या है । मोह का त्याग करना, सत्य बात को समझते रहना, राग के बहकावे में नहीं आना, यह सब परमार्थ की बड़ी तपस्या है । इसमें कठिनाई है, बड़ा बलिदान है, त्याग है, यह सब कुछ त्याग विवेकीजन कर सकते हैं । पर इस तपस्या के एवज में जो उन्हें आनंद आता: है वह स्वाधीन सहज, सत्य आनंद आता है । अपनी 24घंटे की जीवनी में ही देख लो कि जब यह ध्यान हो जाता है कि अब मेरे को करने को काम नहीं रहा । इस समय शांति रहती है और जब मेरे करने को काम पड़ा है यह भाव है तब तो शांति नहीं रहती । जब आत्मा की ओर कुछ झुकाव होता है तब संतोष होता है, जब बाह्य की ओर झुकाव होता है तब असंतोष होता है । हम सब केवल भूल में ही दुःखी बने हैं । दुःखी कर कोई नहीं रहा । कर्म के उदय भी मेरा दुःख परिणमन नहीं करते वह तो अपने विपाक समय में हाजिर होता है । यह तो उसका निमित्त पाकर अपने आपके परिणमन से दुःखी हो रहा है । कोई बाहर के लोग मेरे को दुःखी नहीं कर रहे हैं । मैं विचित्र कल्पना कर अपने आपमें दु:खी होता हूँ । एक कथा एक टीका में है । वेदांत जगदीश टीका में है कि 10 जुलाहे थे । बड़े मित्र थे । सबके सब कपड़ा बेचने बेचारे एक गांव में गये । उस गांव के बीच में नदी पड़ती थी । जब वे लौटकर घर को आये तो नदी में से निकल आये तो उनमें से एक ने कहा कि अपने सब मित्रों को गिन तो लो कि 10 के 10 ही हैं ना, कोई बह तो नहीं गया । जब वे गिनने लगे तो सामने वालों को तो सबको गिन लें पर खुद पर दृष्टि नहीं पहुंचे । उनके ध्यान में तो गिनने वालों को 9 के 9 लगे । दूसरे ने भी ऐसे ही गिने, अब सबके सब रोने लगे । गए थे दो तीन रुपये का नफा लेने को और एक मित्र खो आये । दसों ने गिन डाले, सबको 9 ही लगे, तब दसवें ने कहा कि वास्तव में हम 9 ही हैं तो यह बात पक्की हो गई और वे सबके सब पास में पड़े हुए पत्थर कंकड़ियों से सिर फोड़ने लगे । कुछ देर बाद वहाँ से एक घुड़सवार निकला देखा कि ये सिर फोड़ रहे हैं कारण पूछा तो उन्होंने बता दिया । उसने एक निगाह में देख लिया कि ये सबके सब दस हैं । वह कहने लगा कि तुम 9 तो जरूर हो पर अगर 10वें को हम तुम्हें दिखा दें और मिला दें तो क्या दोगे? सब बोले महाराज आपका बड़ा ऐहसान होगा और आपके नाम को जन्म भर नहीं भूलेंगे । उसने एक छोटी लाठी ली । वह मारता हुआ कहता जाय कि 1-2-3-4-5-6-7-8-9 और तू ही तो 10वां है और उसने फिर दूसरे से शुरू किया और फिर जोर से कहा कि तू ही तो 10वां है । इस तरह वे बड़े खुश हुए । अब इस समय की स्थिति देखो पहिले जो उन्हें भ्रम था कि एक मर गया । इस भूल में जो घबराहट थी । वह घबराहट अब है क्या? मगर उस घबराहट के समय सिर फोड़ दिया था वह वेदना अवश्य है। घबराहट नहीं है । भ्रम की वेदना नहीं । है किंतु सचमुच की वेदना है । इस प्रकार जब यह जीव मोह में रहता है अज्ञान में बसा है, जबकि घबराहट का वर्णन कौन कर सकता है ? सहज चैतन्यस्वरूप भगवान की भूल की घबराहट का कोई भी वर्णन नहीं कर सकता है । केवलज्ञान अनंत है, यह मोह भी अनंत है । मोह से होने वाली विह्वलता बहुत कठिन विह्वलता है और कभी मोह मिट जाय तो मोह के मिट जाने पर भी पुराने संस्कार के कारण जो राग है अभी उस राग की वेदना है । ऐसे भी जीव होते कि उन्हें राग की भावना नहीं मगर राग की वेदना सताती है । एक बूढ़ी बुढ़िया जब अपने बाप के घर से ससुराल को जाती है, बुढ़िया के भी ससुराल होती है, चाहे उसके मां बाप नहीं है पर, नाती तो होते हैं, नातियों को छाती से लगाकर रोकर के ससुराल जाती है पर उसे रोने में मोह है । कम से कम 225 बार बुढ़िया ससुराल जा चुकी होगी और अब 226वीं बार फिर जा रही है । पद्धति का राग है । उस राग के कारण बुढ़िया रो करके जा रही है । पद्धति के कारण इतनी वेदना तो उस बुढ़िया को भी है । ज्ञान वाले को अज्ञान की वेदना नहीं है किंतु जो राग है उसकी वेदना तो सहनी पड़ती है । राग की वेदना भी इतनी प्रबल हो जाती है कि जब राजा रामचंद्रजी वन को गए और वहाँ कुछ समय बाद सीता हरी गई तब सीता के हरे जाने के समय उनको कितना राग था, लक्ष्मण के गुजर जाने पर कितना राग किया, उस प्रवृत्ति को आप सुनें और भगवान् रामचंद्र का नाम न लें तो क्या निर्णय होगा? एक आदमी था उसका छोटा भाई गुजर गया और उसकी लाश को ले लेकर फिरा और फिर लाश को धरकर के कहा कि भैया ! खाना तो खा लो । एक ऐसा आदमी है तो आप उसे क्या कहेंगे? भगवान् श्री रामचंद्रजी का पूर्व चरित सुनाओ तो कहोगे, उनके अंतर में सम्यक्त्व, परचेष्टा राग की इतनी प्रबल थी कि बाहरी सम्यक्त्व के कारण ऐसी वृत्ति हुई । तभी तो अवसर आने पर सर्वविकार दूर हो गये । सम्यक की वर्तना से उनका भी उद्धार हो गया । परोपकार की बात धर्म की धुनि में आ करके हमें बड़ी सुहा जाती है और पहिले सरल लगती है । परोपकार करने वाले में कोई ऐसा भी पुरुष है जो निश्चल पर का उपहार कर सके विरला ही कोई है । हम लोक में बड़े हैं, लोग हम को बड़ा समझते हैं ऐसी बात जब चित्त में बैठी है तो उस बड़प्पन की संभाल भी इस तरह होती है कि दूसरे की बात को करें ढोंग रचे । यह बात कह रहे हैं एक सत्य कार्य की । कोई पुरुष ऐसा है जो इस भाव से उपयोग करता है कि यह जीव भी शुद्धतत्त्व की प्रतिमूर्ति है । इसकी सेवा में कुछ समय लगाए तो मेरे में विषयकषाय की बात का विकल्प नहीं आये । अपने आपके विषयकषाय के विकल्पों से बचाने की भावना से जो उपकार किया जाता है वह तो है सही पद्धति का उपकार और इस लक्ष्य को छोड़कर जो उपकार किया जाता है तो वह तो उस प्रकार का उपकार है जैसे कोई मारबल में नाम खुदवा दिया । इस प्रकार के उपकारी दुनियां में मिलते हैं । यह चाहते हैं कि इस मारबल पर लिखे मेरे नाम को बांचकर सब लोग जाया करें । धन्य है वह विवेकी पुरुष जो विषयकषाय के विकल्पों से बचने के ध्येय से दूसरे जीवों का उपकार करता है । यह संपदा आ पड़ी है, मेरे घर में जरूरत से कई गुनी है और मेरे विकल्पों का कारण बनी है और उसे छोड़कर जाना पड़ेगा । व्यय कर दे धर्म हेतु उपकार हेतु, इस प्रकार की भावना से जो धन का व्यय होता है वह है पद्धति का त्याग, इस भाव से धन का त्याग करना और इस भाव से उपकार करना यह है सही पद्धति का उपकार । जो कुछ भी करे अपने बचाव के लिये, निर्मलता रखने के लिये करें । इसका उपाय बताया जाता है कि हम किसकी शरण जाएँ कि हमको वहाँ सत्य आनंद प्राप्त हो । सबसे बड़ी संपदा यह है कि हमें वस्तुतत्त्व का सही स्वरूप दृष्टि में आ जाय । यह बात कुछ कठिन लगती है और कठिन नहीं भी है । थोड़ा सा कुछ अध्ययन करने पर मनन होने पर यह बात सुगम हो जाती है । बड़े-बड़े ग्रंथकारों ने जो आपके कुंदकुंद महाराज समंतभद्र महाराज अकलंकदेव इत्यादि अनेक आचार्य हुए उन्होंने ज्ञान पर बल दिया है उनकी टीकाओं में वस्तुस्वरूप का वर्णन आया है । यह समझो कि उन्होंने विशेष आवश्यकता नहीं समझी कि ये सब लिख जायें कि लोग यों रहें या करें या सभ्यता सीखें जिसे इंसानियत कहते हैं, नागरिकता कहते हैं । ऐसा वर्णन किसी ग्रंथ में नहीं आया और आ गया तो कभी एक सूत्र में आ गया सो वह भी तत्त्व का प्रकरण है तो आ गया जैसे सूत्रजी में लिखा है―


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