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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:परमात्मप्रकाश - गाथा 41

From जैनकोष



जसु अव्भंतरि जगु बसइ जगु अरव्भंतरि जोजि ।

जगजि वसंतुवि जगुजि णवि मुणि परमप्पउ सोजि ।।41।।

जिस परमात्मा के केवलज्ञान में यह सारा जगत बस रहा है और इस सारे जगत के बीच में यह परमात्मा बस रहा है फिर भी यह परमात्मा ही है और जगत जगत ही है, परमात्मा जगतरूप नहीं बन सकता है । उसे परमात्मा जानो । जैसे नाव पानी में रहती है, तो नाव का कुछ बिगाड़ होगा क्या ? पानी के ऊपर तैरने से नाव की कीमत है? नाव पानी में तैरती हैं तो शोभा है, अगर नाव में पानी भर जाये, तो उसे नाव का भला नहीं है । जगत में हम आप बसते है, भली बात है । किसी आत्मा ने आत्मा का शुद्ध ध्यान किया, और इस जगत के विकल्पों को छोड़कर एकदम बड़ी तेजी से श्रामण्य को ग्रहण किया, पवित्रता बढ़ी सो वे अरहंत भगवान होकर हैं में छोड़कर भाग गये, पर भगकर वे जायेंगे कहां? वे इस लोक में ही तो बसेंगे। लोक के अंत में चले जायेंगे तो क्या हुआ? रहे तो इस लोक में ही । यह, समस्त लोकालोक? उनके केवलज्ञान के द्वारा ज्ञेय हो रहा है । या कहो इस जगत के भीतर यह ज्ञानस्वरूप भगवान भी बस रहा है, पर जगत में बस कर भी जगत में यह तन्मय नहीं हुआ ।

जैसे हमारी आँखें रूप के विषय में रहा करती हैं पर आँखें कभी रूपमय नहीं बन जाती हैं । आंख-आंख ही रहती है और रूप रूप ही रहता हैं । वह किसी अन्य पदार्थ के आकार रंग रूप में नहीं बन जाती इस प्रकार यह ज्ञान सारे जगत को जानता है मगर ज्ञान, ज्ञान रूप ही रहता है और यह सारा जगत अपने रूप ही रहता है । तन्मय नहीं होता ? ऐसा यह निराला आत्मतत्त्व है जैसे पानी में मिट्टी का तेल डाल दें तो वह तेल पानी पर तैरता रहता है । पानी पानी है और तेल तेल है । पानी तेल नहीं हो सकता और तेल पानी नहीं हो सकता, यह ज्ञान जगत में फैल गया सो ज्ञान जगत पर तैर रहा है, किंतु ज्ञान ज्ञान ही है जगत जगत ही है । हाँ, हम ही ज्ञानी अपने ज्ञानस्वरूप को छोड़कर राग द्वेष में जायें तो हम अपने ही अपराध से अपने आपको मलिन कर डालते हैं ।

हे प्रभाकर भट्ट ! उक्त प्रकार वर्णित जो सहज चैतन्यतत्त्व है उसे परमात्मा समझो, अर्थात् उस परमात्मतत्त्व में ठहरकर, वीतराग निर्विकल्प समाधि में रहकर परमात्मा को भावो । प्रभु तो प्रकाशमय है और हमारी स्थिति अंधकारमय चल रही है मगर स्वप्न के उजेले में रहकर अंधकार की चीज को हम नहीं देख सकते हैं, किंतु अंधकार में बैठे हुए भी उजेले में रखी हुई चीज को देख तो सकते हैं । अपने उपयोग को उस प्रकाश में रहने वाली वस्तु नजर आ जायेगी और वह मेरे निज प्रकाश को बढ़ाकर इस आत्मा को प्रकाशमय कर लेगा ।

परिवार, वैभव, धन जो, कुछ समागम मिले हैं, यह मेरा कुछ नहीं है । रह गई बात जीवन गुजारने की सो हम भीतर में अशांति बनाये रहें, और बाहर का लौकिक चिकना वातावरण बनायें तो इससे मुझे आनंद व शांति नहीं मिलेगी । यह सब अपनी ज्ञानकला पर निर्भर है कि हम अपने आपको कैसा समझें कि शांति मिले? और हमें अपने आपको कैसा मान लें कि अशांति मिले ? यह सब हमारे ज्ञान की कला पर निर्भर है ।

कोई यदि जाड़े के दिनों में तालाब में नहाने के लिए घुसता है तो कैसे धीरे-धीरे घुसता है और जब घुटने तक पानी आया तो हाय-हाय करता है और जब जाँघ तक पानी आया तो प्राण निकले जाने का अनुभवसा कर रहा है । केवल पाव सेकेंड तक का ही तो दुःख है फिर दुःख समाप्त है । जो वह जाड़ा-जाड़ा भोग रहा है वह दुःख धीरे-धीरे पानी में पैर रखने से ही हो रहा है । अरे तू पाव सेकेंड को ही सब कुछ छोड़कर प्रभु के ध्यान में बैठ जा मेरा कुछ नहीं है सो ऐसा देख तो तुझे धर्ममय प्रभु के दर्शन हो जायेंगे । तो कभी भी भगवान का ध्यान करें, धर्म करें, चाहे एक सेकेंड के लिए ही क्यों न करें पर उस समय अन्य सबको भूल जाना चाहिए, मेरा मैं ही हूँ, मात्र चैतन्यस्वरूप हूँ यही अनुभव करने का यत्न करना चाहिए ।

भैया ! परमात्मा के केवलज्ञान प्रकाश में यह लोक बस रहा है और लोक के बीच में वह परमात्मा बस रहा है । यह व्यवहार से कहा जा रहा है कि भगवान के ज्ञान में सर्व लोक बस रहा है और लोक में भगवान बस रहा है । भगवान का और लोक का दो का संबंध बताया जा रहा है । जिसमें जो बातें देखी जाती हैं वह तो व्यवहार है और जहाँ केवल एक देखा जाये वह निश्चय है । ज्ञान में ज्ञान है, लोक में लोक है ऐसा देखना यह निश्चय है । केवलज्ञान के भीतर ये तीनों लोक ज्ञेयभूत होकर बस रहे हैं, सो कहीं यह तीनों लोक ज्ञान में चला नहीं गया । उस ज्ञान में ये तीन लोक ज्ञेयभूत हैं, इसी से कहा जाता है कि जगत में वह ज्ञायक भगवान बस रहा है । जैसे रूप विषय में चक्षु लग रहा है फिर भी रूप अलग है, चक्षु अलग है ।

जो सारे विश्व को जानकर भी तन्मय नहीं होता उसको तुम परमात्मा जानो । जो इतने पदार्थों को जानते हुए भी इन पदार्थों में तन्मय नहीं होता, अपने ही प्रदेशों में रहता है उसको तुम अपना परमात्मा जानो । इस प्रकार से परमात्मा को वीतराग निर्विकल्प समाधि में स्थित होकर भावना करो, परमात्मा को इस प्रकार से तुम स्पष्ट जान सकोगे । वीतराग निर्विकल्पसमाधि परिणाम में ठहरकर ही परमात्मा को विशद जान सकते हैं । जो परमात्मतत्त्व केवलज्ञानादि की व्यक्तित्वरूप मोक्ष का कारण है वह परमात्मा कौन है? वह यही आत्मा है । अपनी विषयकषाय की परिणति को त्यागकर इस ज्ञानतत्त्व के आलंबन से जब अपनी स्वच्छ परिणति आती है तो यही परमात्मा कहलाता है । यही उपादेय है । हम सब मुमुक्षुओं को अब आगे योगींदुदेव बतलाते हैं कि यह परमात्मा देह में बस रहा है तो भी जिनके बोधि समाधि नहीं है, समता परिणाम नहीं जगा वे लोक सम्मत महापुरुष भी हैं तो भी उस परमात्मतत्त्व को नहीं जानते हैं । वह परमात्मतत्त्व केवल निर्विकल्पसमाधि द्वारा सुपरिचित होता है । ऐसे सुपरिचित ज्ञानी के अनुभव में क्या आता है? शुद्ध चैतन्यतत्त्व अनुभव में आता है । वह ज्ञानानुभव आनंद को प्रकट करता हुआ ही उत्पन्न होता है ।


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