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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:परमात्मप्रकाश - गाथा 44

From जैनकोष



देहि वसंतें जेण पर इंदियगामु वसेइ ।

उव्वसु होइ गएण फुडु सो परमप्प हवेइ ।।44।।

जिसके देह में बसने पर यह इंद्रियों का ग्राम बस जाता है अर्थात् अपने काम में जुटा रहता है और जिसके निकल जाने पर यह ग्राम उजड़ जाता है, अपना काम नहीं करता अन्य रूप रख लेता हैं सड़ जाता है, तो जिसके रहने से यह इंद्रिय ग्राम सब काम करता रहता है और जिसके न रहने पर यह सब उजड़ जाता है उसको तुम परमात्मा जानो । यह आत्मा निश्चय से तो अतींद्रिय स्वरूप है, इंद्रिय तो इसका क्लेश है । जिन इंद्रियों पर हम इतना गर्व करते हैं भैया ! जिनके वश होकर हम अपनी सब सुधि खो देते हैं वे सब इंद्रियां इस जीव के लिए कलंक हैं, स्वरूप नहीं हैं, यह आत्मा तो इंद्रियरहित है, यह कलंक भी प्रकट दिख रहा है कि यह देह का और इंद्रिय का संबंध इस जीव के साथ लगा है ।

यह जीव व देह का संबंध व्यवहार का विषय है क्योंकि दो चीजों के संबंध को देखना व्यवहारनय का विषय है । दो के संबंध को देखने का लक्ष्य बनाना यह मोक्ष के विरुद्ध कार्य है । परसंबंध का दर्शन उपादेय नहीं है । यह आत्मा तो व्यवहारनय से देह में बसा रहता है यह देह कैसा है कि शुद्ध आत्मतत्त्व के विपरीत है । ऐसे देह में जिसके बसने पर ये स्पर्शनादिक इंद्रियों का ग्राम बस जाता है अर्थात् ये अपने-अपने विषय में लग जाते हैं उसको परमात्मा जानो । यहाँ पर इतना अंतर जानना कि इस परमात्मा के देह में रहने पर यह इंद्रियग्राम बसंता तो है पर परमात्मतत्त्व भी रहा, किंतु यह भूल में पड़ा रहा । अपने परमात्मतत्त्व को भूलकर यह इंद्रियों की प्रीति कर रहा इस कारण इंद्रियों का ग्राम बसता है । यह परमात्मा रहे और भूल में न रहे, बड़ी सावधानी से रहे तो यह इंद्रियों का ग्राम बस नहीं सकता । दोनों ही बातें एक साथ हो जाती हैं―परमात्मतत्त्व में उपयोग का रहना व इंद्रियों को भूला भटका बेहोश कर देना । जब इंद्रियग्राम का उधम होता है तब अपनी इस आत्मा को स्वसम्वेदन ज्ञान नहीं रहता ।

जब यह जीव भवांतर को चला जाता है, मरण कर जाता है तो यह इंद्रियग्राम उजड़ हो जाता है । अर्थात् फिर ये इंद्रियाँ अपने-अपने विषय के दुःख में प्रवृत्त नहीं होती हैं । यह चिदानंद आत्मा भगवान एक स्वभाव वाला है किंतु यह निमित्त नैमित्तिक की साइन्स भी बहुत बड़ा विषय वाला है । इस ज्ञायक स्वभाव परमात्मा ने अपने बेहोशी की और कषाय का परिणमन किया फिर देख लो ये सारे जाल, ये समस्त संकट कैसे अपने आप इस पर सवार हो जाते हैं जैसे बिजली का बटन दबाया, कि सारी बिजलियाँ पंखे रेडियो चलने लगते हैं व जितना चाहे कनेक्शन बना लो, सब अपने आप काम हो जाते हैं । उनमें आपका क्या श्रम लगता है? इसके आगे फिर आप क्या करते हैं? सारे काम एटोमेटिक होते रहते हैं । इस तरह यह स्वयं परमात्मा अपने शुद्ध चैतन्यस्वभाव के उपयोग को छोड़कर कुछ विषय कषाय में लग गया । अब अपने आप गड़बड़ी की सारी बातें होती हैं । इंद्रियग्राम बन गया, शरीर बन गया, इंद्रियाँ हो गई, जिसमें कि भ्रम से फंसे हैं और आकुलित होते हैं ।

भैया, सीधा यह विचार लें कि हमारा तो स्वाभाविक काम था ऐसा जैसा कि सिद्ध महाराज का है । और इस समय हम कैसे हैं? कितना अंतर हो गया? यह जीव अनादिकाल से अशुद्ध उपयोग में चल रहा है और उस अशुद्ध उपयोग का निमित्त पाकर कर्मबंध होता चला आ रहा है । और जैसे कर्म का उदय चलता है वैसे ही यह गतियों में जन्म लेता चला आ रहा है ।

एक लकड़हारा था । लकड़ी का बोझ लदे चला जा रहा था । उसे थकान हो गई । गर्मी के दिन थे । पेड़ के नीचे जाकर लकड़ी का गट्ठा रख दिया और उसके साथियों ने गट्ठे अलग रख दिये । सबके सब वहीं आराम करने लगे । नींद आ गई और नींद में एक स्वप्न आया कि मुझे लोगों ने मिलकर अमुक शहर का राजा बना दिया है । और मैं उस राजदरबार में बैठा हूँ और छोटे-छोटे राजा आ रहे हैं मस्तक झुका रहे हैं, मैं हुक्म दे रहा हूँ । यह स्वप्न आ रहा था, तभी उसके साथी ने उसे जगा दिया तो मुखिया लड़ने लगा कि तुम लोगों ने हमारा राज्य खतम कर दिया । अरे कहाँ राज्य था? कल्पना में ही तो था ।

यहाँ भी देख लो कि कहीं आपका कुछ है? कहीं कुछ नहीं । आप अपने ज्ञान और आनंद में बसते हैं । कहाँ आपका क्या है? कल्पना में अपने में पर की रुचि कर रहा है कि अपने पास इतना वैभव है, मेरा इतना परिवार है पर वस्तुत: इसका तो यहाँ कुछ भी नहीं । यह अपने स्वरूप को भूलकर रागमय, विकृत हुआ, उसमें जो कर्मबंध हुआ है उसके फल में यह बिगड़ता हुआ चला जायेगा । अपने में ज्ञान प्रकट करो और सब इंद्रियग्रामों से अपने को जुदा निरखते रहो । इस कला में सार है, और बाकी पर में भिड़ने से किसी भी कला में कुछ भी सार नहीं है । बड़ी दुर्लभता से पाया हुआ यह मनुष्य जीवन क्यों खो रहा है?

जब इस जीव को भान हो जाये कि मैं सबसे निराला चैतन्य ज्योतिमात्र हूँ । इसको दूसरे कोई कुछ नहीं करते । यह दूसरों को कुछ नहीं करता मैं अपने ज्ञान के परिणमन को भोगता रहता हूँ । कोई पदार्थ किसी अन्य पदार्थ का कुछ भी परिणमन नहीं करता । ऐसा दृढ़ निश्चय हो जाये और फिर एकत्व के स्वरूप की ओर झुके तो इसने सब कुछ प्राप्त किया । अन्यथा सब स्वप्न का रूप है । स्वप्न में आपकी सभायें हो जायें, सोसायटी कर लें, शान बढ़ा लें पर स्वप्न खतम होने पर उसके पश्चात् वहाँ कुछ नहीं रहता है । तो अपने में बसे हुए उस शुद्ध ज्ञायक स्वभाव को निरखें तो यही मोक्षमार्ग को दिखाने वाला है । और कोई साथ देने वाला नहीं है ।

भैया, जिस वस्तु में जो बात नहीं होती है, लाखों उपयोग कर लें, उस वस्तु से वह प्रकट नहीं होती । बालू में तेल का अंश भी नहीं है चाहे कितनी ही घानियों में पिरवाले, सो उसमें से तेल नहीं निकलता है । इन समस्त बाह्य पदार्थों से हमें सुख नहीं है, मेरा ज्ञान नहीं है, मेरा कुछ नहीं है । तो इन पदार्थों को कितना ही संचित कर लो, देख लो, धर लो, कुछ कर लो पर वास्तव में उनको कुछ उनसे आनंद नहीं मिलेगा । इस वैभव के समय में भी जो आपका ज्ञान चल रहा है उससे ज्ञान व आनंद मिल रहा है । वहाँ पर वस्तुओं से अपनी कोई शक्ति नहीं मिल रही है आप भोजन करते हैं, मीठा खा रहे हैं, उस मिठाई में आनंद नहीं मिल रहा है । और की तो बात दूर रहो, उस मिठाई में रहने वाला जो मधुर रस है वह रस भी आत्मा में नहीं आ रहा । यह अमूर्त आत्मा सिर्फ मिठाई के मधुर रस को जान रहा है और राग की उसके प्रेरणा है सो उसमें सुख, मान रहा है ।

जैसे आँख अग्नि को देखती है, अग्नि को न करती है, न जलाती है, न भोगती है । यदि यह आँख अग्नि को जलाने लगे तो जब कभी सिगड़ी नहीं जले तो पंखा करने की क्या जरूरत है? आँख तेज दिखा दो, अग्नि जल उठे, क्योंकि तुम तो करने वाले बन गये । कैसी ही तेज आँख निकाल दो, जैसे कि गुस्से में निकाली जाती है तो भी क्या अग्नि जलती है? बरसात के दिनों में लकड़ी गीली हो जाती है तो महिलाओं को कितना गुस्सा आता है? कभी तो इतना गुस्सा आ जाता है कि चूल्हे को फोड़ दें । जितना वह गुस्सा करती है उतना ही चूल्हा रिसाता है । किसी भी पर पदार्थपर हमारा कोई अधिकार नहीं है । हां, समय ठीक है, संबंध ठीक है तो वह काम होगा । आँख आग को पैदा नहीं करती और आँख अग्नि को भोगती भी नहीं है । यदि आँख अग्नि को भोगने लगे तो आँख जल जायेगी, खाक हो जायेगी, भस्म हो जायेगी, ऐसा, होता नहीं है । सो यह आँख अग्नि को नहीं भोगती ।

इसी प्रकार यह ज्ञान यह आत्मा किसी पर पदार्थ को करता नहीं है, भोगता नहीं है । भैया जीव ने भोगों को नहीं भोगा, किंतु भोगों ने इस जीव को बरबाद कर डाला । कोई खाने की चीज है मुंह में, लड्डू चबा लिया जाये, रस बन गया, फिर भी पुद्गल की क्या बरबादी? लड्डू रूप में वह लड्डू नहीं रहा, गीला बन गया, घर गया और जठराग्नि का संबंध पाकर वह भस्म हो गया तो वह रुधिररूप परिणमन कर गया । कुछ मलमूत्र रूपपरिणमन कर गया, पर पुद्गल की क्या बरबादी हुई? पुद्गल में ज्ञान तो है नहीं जिससे कि वह दुःखी हो जाये । कोई पुद्गल लड्डू बन गया तो क्या वह सुख मानेगा? लड्डू की हालत में पुद्गल को कुछ भी हर्ष नहीं है और कोई गंदा पर्याय मिल गया तो पुद्गल को कोई विषाद नहीं है । वह तो एक अचेतन सत् पदार्थ है । उसे उत्पाद व्यय चाहिए । यदि उत्पादव्यय नहीं है तो पदार्थ का अभाव हो जायेगा । इससे यदि पदार्थ पुद्गल भोगे गये तो उन पदार्थों को क्या नुकसान हुआ? पर इस जीव का मरण हो गया अर्थात् चैतन्यप्राण का घात हो गया, विषय कषाय के परिणमन हो गये सो अब यह कर्म से लद गया । इसको जन्म मरण नहीं छोड़ सकते । लो जीव ने भोगों को नहीं भोगा, भोगों ने इस जीव को भोग डाला, बरबाद कर डाला । त्रस स्थावररूप बना डाला ।

यह आत्मा मूल में तो ऐसा ज्ञानस्वभावमात्र है कि तीन लोक का अधिपति हो सकता है, सारे लोक का ज्ञाता हो सकता है, किंतु व्यर्थ के अमौलिक विकारों की रुचि से अज्ञानी बन गया है । ज्ञान से सुख अपूर्व होता है । मिठाई खाने से भी विलक्षण सुख ज्ञान में है । छोटे-छोटे बच्चों से कोई प्रश्न करे कि 16 चौके कितने? अब उन बच्चों में जब तक उन्हें उत्तर नहीं आता तब तक उनका चेहरा देखो कितना रंजमय है? सोच रहा, विचार रहा देख लो खुद और विषाद के बाद सोला एकम सोला, सोला दूनी बत्तीस, सोलह तिया अड़तालीस, सोलह चौके 64 । ज्यों ही 64 उत्तर में कहा कि उस बच्चे की प्रसन्नता देख लो, उस उत्तर के समय उसका चेहरा देखो, इतना प्रसन्न सुंदर चेहरा तो मिठाई खाने के सुख के समय भी नहीं मिलेगा जितनी प्रसन्नता ज्ञान के सुख में हुई ।

रोकड़िया रोकड़ में हिसाब लिख रहा है । 8, 10 बज गये, फर्क था केवल दो आने का । दो आने हिसाब में नहीं मिल रहे थे उस दो आने का फर्क निकालने के लिए-रात भर तो जगा और चार आने की बिजली खर्च की और गर्मी है तो 12 आने का पंखा खर्च कर डाला पर इतना कुछ करने के लिए वह तो मंजूर हुआ पर उपाय भी सीधा एक था कि दो आने अपनी जेब से निकाल कर मिला देता सो यह नहीं किया । आखिर यह भूल कहाँ हुई सो उस भूल के लिए परिश्रम किया और अंत में 5 बजे वह भूल मिल गई तो उसके मिलने में जो सुख हुआ ऐसा सुख स्वादिष्ट भोजन कर लेता पर फिर भी वह सुख नहीं मिल सकता था ।

पढ़े लिखे वैज्ञानिक जन, आविष्कार प्रयोगी लोग विज्ञान के प्रयोग में जीवन बिता डालते हैं और खुद बड़े कष्ट में रहते हैं, कोई शोक नहीं करते, आराम नहीं भोगते, वही काम करते हैं, उसको देखना है, इसको ठीक करना है, इसकी धुनि लगी रहती है । जब वैज्ञानिक अपने विज्ञान में सफल हो जाता है तो, बड़ा आनंद पाता है । ज्ञान का आनंद भोग के आनंद से विलक्षण होता है।

इन पुरुषों में ऐसा कोई भी पुरुष है जिसको धन वैभव का भी बड़ा सुख हो, और वह एक घंटा भी सुखी निरंतर रह सकता हो । दो-दो मिनट में रंग बदलते हैं, फिर कोई रंग आ गया । यों थोड़ी सी मौज मान ली तो दो-दो मिनट में वह सुख और दुःख भोगता है । यह है इंद्रियजंय सुख की कहानी । सुख तो आत्मा में है । सुख इसका स्वभाव ही है । यह गड़बड़ी न करे, रागद्वेष नहीं करे, लौकिक सुख में अपना चित्त नहीं फसाये, किंतु अपने आपके सहज स्वरूप के ध्यान की धुनि बना लें तो इसको आत्मीय आनंद प्राप्त हो सकता है । एक निर्णय रखो मेरा प्रभु मैं हूँ, मुझ में ऐश्वर्य है, वह स्वत: है ऐश्वर्य को मैं अपने आपके आनंद परिणमन में प्रकट कर लूँगा । मेरा प्रभु मैं ही हूँ । अपने इस शुद्धस्वरूप का दर्शन करूँ, इस निज की ओर उपयोग को रखूँ तो सारे विकल्प अपने-अपने आप समाप्त हो जायेंगे और मैं अपनी रक्षा स्वयं कर लूँगा ।

मेरा पिता अर्थात् मेरा रक्षक मेरे को उत्पन्न करने वाला मैं ही हूँ, मैं शरीररूप नहीं हूँ । ऐसा अपने अंतर में पक्का निर्णय कर लें तो गृहस्थी के वातावरण में भी बहुत शांति देने वाले अंतर आ जायेंगे । जो विकल्प हो जाया करता है जरा सी बात में वह विकल्प इसके बाहर हो जायेगा । ऐसा यह परमात्मा इस देहरूपी मंदिर में बस रहा है । जिसके बसने पर यह इंद्रियों का ग्राम आबाद हो जाता है और जिसके निकल जाने पर यह इंद्रियों का ग्राम उजड़ हो जाता है । ऐसे इस परमात्मतत्त्व को हे प्रभाकर भट्ट ! तुम जानो ।

लोग कहते हैं कि अर्जुन को भगवान ने विराट रूप दिखाया था । बाहर के विराटरूप की बात तो जाने दो, आपको भी कुछ दिखता है तो आप खुद में जो करते हैं वह आपको दिखता है । यह मंदिर, खंभा, पुरुष, लोग आपको कैसे दिख जाता है । आप अपने में देखा करते हैं, कुछ उसके परिणाम में यह सब दिख जाता है । अपने आपके दिखने में आप नहीं आता तो यह कुछ नहीं दिखलाई देता ।

यह जीव पर का दर्शक कब कहलाता है? जब ऐसे ही अपने आपमें अपने आपको देखे, तो ऐसे ही वह विराट दर्शन भी तब होता है जब यह फक्त अपने आपमें आपके इस विराट तत्त्व को निहारता है । यह विराट तत्त्व बाहर नहीं है, अंतर में ही है ।

हम दर्पण में अपना मुख देखते हैं । देखो इसमें कितने विज्ञान की बात भरी है । दर्पण में मुख की छायारूप परिणमन होता है । यह मेरे मुख का निमित्त पाकर होता है । मेरा मुख दर्पण में नहीं चला गया । यदि मेरा मुख दर्पण में चला गया होता तो यह मैं मुखहीन हो जाता, मेरा मुख मुझमें ही है, मेरा मैं कहीं बाहर नहीं गया । दर्पण में इसका निमित्त पाकर अपने में परिणमन होता है । अब हम देखते क्या हैं कि दर्पण में परिणमन हुआ, मुख का प्रतिबिंब और जानता क्या है कि मैं अपने मुख को देख रहा हूँ । क्या तुम अपने मुख को देख रहे हो? नहीं तो क्या देख रहे? उस दर्पण में मुख को नहीं देख रहे, दर्पण को तो देख रहे हो, और विश्वास यह है कि मैं अपने मुख को देख रहा हूँ । किसी ने कहा कि तुम्हारी नाक पर काला-काला दाग लग गया, इतना सुनते ही झट दर्पण उठाकर देखते हैं तब दर्पण की छाया का दाग छुटाता है या वह अपने मुख का दाग छुटाता है? दर्पण को देखते हुए भी उसका विश्वास यह है कि मैं अपने मुख को देख रहा हूँ और उसका विश्वास यह भी है कि मेरा जो असली मुख है उसको नहीं देख रहा हूँ और छुड़ाता है तो अपने मुख का दाग छुड़ाता है ।

इसी तरह हम अपनी गंदगी को देखने के लिए भगवान के सामने दर्शन करके, पूजा करके उनके स्वरूप को देखते, ताकि हमें यह मालूम पड़ जाये कि मेरे में इतनी गंदगी है । जैसे यह पुरुष अपने मुख में लगे हुए काले दाग को छुटाने के लिए दर्पण में देखता है इसी प्रकार भक्तजन अपनी गंदगी देखने के लिए अपने प्रभु को निहारा करते हैं । भगवान का जो स्वरूप है उसको देखकर चूँकि हमें भी विश्वास है कि मेरा भी यह स्वरूप ज्ञानमय है सो जितने भी कषाय के परिणाम, विषय के परिणाम, क्रोध के परिणाम, यह सब जो कुछ हो रहा है यह सब गंदगी मालूम पड़ती है । यह तो कलंक है । मेरा स्वभाव नहीं है, तब उस कलंक को देखने के लिए हम भगवान के अंतर में कुछ घुसे हैं और अपने में जो विषयकषाय के कलंक लगे हैं उन कलंकों को धोने के लिए अपने में कुछ करते हैं । ज्ञान का परिणाम बनायें अपने स्वरूप को देखें तो हम अपने विषय कषाय के परिणाम से हट सकते हैं । प्रभुमूर्ति के प्रक्षाल के समय भक्तजन कहते हैं―

तुम तो सहज पवित्र यही निश्चय भयौ, तुम पवित्रता हेत नहीं मज्जन ठयो । मैं मलीन रागादिक मलतैं ह्वै रह्यो, महा मलिन तन में वसुविधिवश दुःख सह्यो ।। जो मैं आपका अभिषेक कर रहा हूँ नाथ! वह आपकी पवित्रता के लिए नहीं कर रहा हूँ किंतु अपने रागादिक को धोने के लिए करता हूँ ।

भगवान की पूजा में भी आपका जितना समय जाता है वह सफल है क्योंकि वहाँ विषय कषाय का प्रवेश नहीं । भक्त अभिषेक करते हैं । मूर्ति तो पवित्र है । उसका स्पर्श कर आये हुए जल को अपने मस्तिष्क पर चढ़ाते हैं । यद्यपि रोज-रोज आपका मन पूजा में बड़े भाव सहित नहीं लगता होगा पर जो अपनी रूटीन है कि रोज पूजा करना । न लगे आज मन क्योंकि विषय कषाय के परिणाम हैं ना, तो फिर कभी लगेगा । पर यह सब करने को अपना आज मन ही नहीं लगा तो छोड़ो, ऐसा सोचकर अगर पूजा छोड़ते हैं तो आपकी पूजा छूटती चली जायेगी, फिर मौका नहीं लगेगा । आप अपना समय पूजनादि में लगाते है यह सब प्रशंसा के योग्य बात है । पूजा करने वाले जितने आदमी हों वे सब मिलजुल करके एक ही राग से पूजा करें तो मैं समझता हूँ कि पूजा करनेवाले को भी आनंद मिलेगा और देखने की इच्छा रखने वाले को देखने की उत्सुकता होगी । इसमें भक्तिरस की वृद्धि होगी । या पूजा मौन से करें तो बिल्कुल मौन से सभी भक्त करें । इस मौन पूर्वक पूजा की विधि में समय-समय पर शुद्ध ज्ञान स्वरूप के देखने की वृत्ति जगा करती है । पूजा वास्तव में वही है जिस विधान में भक्त इस परमात्मस्वरूप में बीच-बीच में लीन होता जाये ।

उपयोग के एकत्वस्वरूप में आयें उसको समझें कि यह जीव की परिणति है । जीव की इस परिणति का आधारभूत जो एकमात्र चैतन्य स्वभाव है वह जीव का एकत्व है । विषयकषाय के भावों की परिणति से हटकर जो ज्ञान की परिणति होती है उसका आधारभूत जो एक स्वभाव है वह स्वभाव जीव का एकत्व है, विषय कषाय के भावों की परिणति से हटकर जो ज्ञान की परिणति होती है उसका आधारभूत जो एक स्वभाव है वह स्वभाव जीव का एकत्व है । यह स्वसम्वेदन ज्ञान द्वारा गम्य है । जैसे एक ही पुरुष बालक, जवान वृद्ध होता है तो वहाँ बालक जवान वृद्ध तो दिख जाता है, किंतु उन सब अवस्थाओं में रहने वाला जो एक शुद्ध मनुष्य है वह आँखों से नहीं दिखता । इसी प्रकार जीव की परिणतियाँ तो मन द्वार से, इंद्रिय द्वार से समझ में आ जाती हैं किंतु इन सब परिणतियों का उपादान आधारभूत जो चैतन्यभाव है वह इंद्रिय व मन के द्वारा समझ में नहीं आता, वह तो स्वसम्वेदनज्ञानगम्य है । अब जरा सब जीवों के जीवत्व स्वरूप को देखकर एकत्व का निर्णय करो ।

देखो―यहाँ व्यक्तिगत जीव को न देखो स्वरूप को देखो, व्यक्ति की निगाह रहे तो स्वरूपदृष्टि न रहेगी । भिन्न-भिन्न अनेक जीव हैं ऐसा देखो तो जीवत्व पर निगाह नहीं रह सकती । तो जब जीवसामान्य में दृष्टि जाती है तब ये भिन्न-भिन्न वहाँ निगाह में नहीं रह सकते हैं । सभा में एक प्रधान मनुष्य बैठा हुआ है, उसकी दृष्टि में जब तक यह आ रहा है कि यह बाबूजी हैं, यह सेठजी हैं आदि ऐसी निगाह है उन लोगों में तब तक उसकी दृष्टि में सामान्य नहीं भरा है । मनुष्य सामान्य वह है जिसको लख कर यह कह सकें कि यह भी वही है, यह भी वही है आदि । जैसे किसी को नौकर चाहिए तो नौकरों के बाजार में 100 मनुष्य बैठे हैं तो उनमें से किसी भी मजदूर को ले आयेंगे । जब मनुष्य सामान्य की दृष्टि है तो ये बाबूजी व ये सेठजी आदि कुछ नहीं, सबके सब वे एक हैं और जब विशेष व्यक्ति पर नजर चलेगी तो उसकी दृष्टि में मनुष्यसामान्य नहीं रहेगा । इसी प्रकार यदि भिन्न-भिन्न जीव निगाह में रहते हैं कि ये मनुष्य हैं, ये पशु हैं इत्यादि तो जीव का जो स्वरूप है वह नजर में नहीं रहेगा । और जब जीव का स्वरूप दृष्टि में रहेगा तो ये भिन्न-भिन्न जीव नजर नहीं आयेंगे ।

जीव में दो प्रधान गुण हैं―ज्ञान व आनंद । ज्ञान गुण की दृष्टि से देखें तो इसमें सीमा दृष्ट नहीं होती है, और आनंद गुण की दृष्टि से पहिचानें तो सीमा अनुभूत होने लगती है । आनंद गुण की अनुभूति द्वार से ये सब जीव भिन्न-भिन्न प्रतीत होते हैं । पर इन सब जीवों को ज्ञान लक्षण की दृष्टि से देखें तो जीवत्व नजर आयेगा । जैसे गाय अनेक हैं उनमें जो गाय सामान्य स्वरूप है वह एक है फिर भी वे भिन्न-भिन्न तो हैं ही । इन सब जीवों में एक जीवत्व स्वरूप है, वह परमात्मतत्त्व है । कितना भी कहेंगे उससे परमात्मतत्त्व दृष्ट नहीं होगा । अपनी दृष्टि हो जाने पर यह परमात्मतत्त्व मालूम होगा । मूल में तो विषय कषाय बसा हुआ है और फिर परमात्मा दिख जाये ऐसा कैसे होगा? राग द्वेष रूप में विपरिणत इस परमात्मा के रहने पर इन इंद्रियों का व्यापार होता है और इसके चले जाने पर फिर इंद्रियों का व्यापार समाप्त हो जाता है । यह परमात्मतत्त्व जो अतींद्रिय है, राग द्वेषरहित समाधि में रत होने वालों के अनुभूत है वह मुक्ति का कारण होता है, वही सर्व प्रकार से साधक होता है ।

भैया, जब आप यह समझते हैं कि मैं इतने बच्चों वाला हूँ तो आपके मन में उन बच्चों के लिए क्या-क्या करने की चिंता नहीं हो जाती? जब आप जानते हैं कि हम इतना वैभव वाले हैं तो उस वैभव को बढ़ाने के लिए क्या-क्या मन में आकांक्षायें नहीं होंगी? जो पुरुष जिसको अपना मानता है उसको बढ़ाने के लिए उसके आकांक्षा होती है । यदि यह मैं आत्मा हूँ, चैतन्यस्वरूप हूँ ऐसा माने तो चैतन्य की स्वभावपरिणति पाने की आकांक्षा हो जाती है । चैतन्य स्वभाव का उपयोग होना ही धर्म है । सब कुछ करिये, गुरुपासना, संयम, दर्शन, तप, व्रत सब कुछ करते हुए भी यह पक्का निर्णय रखो कि जितने क्षण अपने उपयोग में अपने स्वरूप का चैतन्य सामान्य रूप में प्रत्यय है उतने क्षण सफल हैं यही निर्णय रखिये । ऐसी स्थिति बने तो समझो हम धर्म कर रहे हैं । यदि इस ओर दृष्टि नहीं है तो बाहरी कामों में दृष्टि होनेपर जैसे घर के काम करते हैं वैसे ही हमको धर्म का काम लग गया है । तन, मन, वचन की व्यावहारिक सब क्रियाएं पर क्रियायें हैं । ये सब पृथक् हैं । ये आलंबन मात्र रहें, दृष्टि तो निज स्वरूप की होना चाहिए ।

अंतरंग स्वरूप से अलग उपयोगी रहने पर जीव के धर्म नहीं होता । हाँ, अंतर इतना हो सकता है कि जैसे कंजूस धनी को कंजूसी के कारण धन से रंच भी फायदा नहीं है, वह इसको खा भी नहीं सकता है, दे भी किसी को नहीं सकता है, किंतु उसकी कभी बुद्धि बदल जाये तो धन पुण्य में दे सकता है । इसी तरह आत्मस्वरूप के परिचय से रहित कोई पुरुष धर्म का श्रम कर रहा है तो उस धर्म के श्रम में वर्तमान में कुछ नहीं हो रहा, वह तो धर्म का स्वरूप भी नहीं जान रहा है किंतु वह व्यवहारधर्म के काम में लगा है, पूजा में संयम व्रत करते हुए में कभी कोई धर्मस्वरूप की बात इसके घर कर जाये, दृष्टि बदल जाये तो अपना सदुपयोग करने लगेगा । पर वर्तमान समय में तो उसके धर्म नहीं है । ऐसा यह निर्णय रखो कि किसी प्रकार हम विकल्पों से हटकर, मिथ्या भावना से हटकर, सुखी होने के लिए अपने इस सहज ज्ञानमात्र स्वरूप को तो देखें ।

जैसे बच्चे की जेब में खाने के कई बढ़िया छोटे शुष्क फल के भोजन रखे हैं, वे बच्चे श्रम करते जाते हैं, बात करते जाते हैं और बीच-बीच में खाते जाते हैं रेवड़ी, मूंगफली वगैरह । वे कहीं जाते हुए, श्रम करते हुए अपनी जेब में रखे हुए सामान को बीच-बीच में मधुर स्वाद के साथ खाते चलेंगे क्योंकि उनकी यह आदत रहती है । इसी प्रकार ज्ञानीसंत के उपयोग रूपी जेब में आत्मगुण भरे हैं । सो अन्य कार्य करते हुए भी चैतन्यस्वभाव की दृष्टि में मधुर रस का पान करते हुए उन्हें बड़ा आराम मिलता है । अपने द्वारा अपने में झुककर अपने निर्विकल्प ज्ञायक तत्त्व को निरखने से जो आनंद उन्हें मिलता है उसकी यहाँ के किसी भी सुख से उपमा नहीं हो सकती । देखो ख्रुश्चेव हैं, नेहरू हैं, केनेडी हैं, चाऊएनलाई हैं इनकी स्थिति को देखो, राज काज में लगे हुए देश की चिंताओं से भरपूर है । उन्हें भी चैन नहीं है ।

तो भैया, हम कौन से व्यक्ति को ऐसा पायें बाहर में, जिसको हम ऐसा जान सकें कि आज यह दुनिया में बड़ा है । बड़ा वह है जिसे वास्तविक चैन है । जिसको देखकर दूसरे भी चैन पा सकें तो वह बड़ा है । दुनियां के अंदर सबके सब अपनी किसी न किसी बेचैनी में रहते हैं । विवेकी पुरुष जो कि सब कार्यों को करते हुए भी चित् को चाहता है उसको कभी अवसर मिलता तो सहज स्वरूप की दृष्टि का स्वाद लेगा । गृहस्थावस्था में क्या-क्या नहीं करते? सभी तो काम करते हैं, सब भोग भोगते हैं फिर भी वह मोक्षमार्गी हो गया । और एक मनुष्य घोर तप करता है पर भीतर की एक निज स्वरूप की गुत्थी नहीं सुलझा लेने के कारण, आत्मा की ज्योति न पाने के कारण मोक्षमार्ग में कुछ भी नहीं चल पाता । सो ज्ञानी गृहस्थ मोही साधु से कई गुना अच्छा है ।

यह तो अपने स्वभाव की चीज है । कहीं, इसे बड़ी मेहनत करने वाले बड़ा यत्न करने वाले पुरुष भी न पा सकें और एक बैल जो घास खा कर आया है, पेड़ के नीचे बैठा है, जुवालिया कर रहा है (याने-मुंह चला रहा है मुँह में कुछ भी नहीं होता है और गाय बैल मुख चलाया करते हैं उसमें उपयोग नहीं लगाना पड़ता) वे बैल भी तो जुवाली करते समय आत्मा के शुद्ध चैतन्य का उपयोग करेंगे तो शुद्ध आत्मतत्त्व की अनुभूति से ज्ञानी हो जायेंगे । जिसका संसार निकट है उसको अपने आत्मस्वभाव का परिचय होता है ।

भैया ! थोड़ा धर्म और मोह दोनों की धुन बनाने की अपेक्षा यह करना अच्छा होगा कि जितना टाइम धर्म को रखो, निःशल्य होकर धर्म करो, या फिर डटकर मोह ही कर लो, जब पेट भर जाये तब धर्म कर लेना । जैसे कोई लड़का उधमी है, उधम करता है, मना करने से भी नहीं मानता, उधम करता ही रहता है, तो उससे कहो कि तुम जितना उधम कर सकते हो करो । हैरान हो करके ही सही, जब उससे कह देते हैं कि चलो जितना उधम करना हो, कर लो तो वह कुछ तो यत्न करता है कि मैं खूब उधम करूं पर थोड़ी देर में ही उसका पेट भर जाता है, फिर वह उधम नहीं कर पाता । इसी प्रकार राग और मोह करने वाले को चैन नहीं मिलती है । यदि उसे छुट्टी दे दें कि जितना चाहे कर लो, तुम खूब राग कर लो तो उसका राग मर जाता है । राग का राग करने से राग हरा रहता है ।

देखो भरत चक्रवर्ती और बाहुबलि स्वामी की जब लड़ाई छिड़ गई । लड़ाई थी राज्य के लिए और किस लिए कि मैं नमस्कार नहीं करूंगा । भाई के नाते से वह नमस्कार कर लेगा पर राजनीति से नहीं करेगा, इस बात पर उन दोनों ने थोड़ीसी क्रांति कर डाली, इसलिए दोनों में लड़ाई छिड़ गई । तब दोनों ओर से मंत्रियों ने सोचा कि इस लड़ाई में लाखों पुरुषों का क्यों संहार हो? क्यों न इन दोनों का ही परस्पर में युद्ध करवा दें? क्योंकि इनका तो बाल बांका भी नहीं होने वाला है और सेना युद्ध से बेकार मरेगी । सो उनमें तीन युद्ध ठहरे थे । जलयुद्ध, दृष्टियुद्ध व मल्लयुद्ध । जलयुद्ध के लिये दोनों एक तालाब में घुसे तो दोनों ने परस्पर छेंटा लगाये । बाहुबलि थोड़े ऊंचे थे तो बाहुबलि के फेंके हुए छींटे भरत पर तेज पड़ते थे, परंतु भरत तो कद में छोटे थे सो वे जब छींटा लगावें तो मुश्किल से बाहुबलि के लग पाते थे । इस प्रकार जलयुद्ध में भरत हार गये । जब दृष्टियुद्ध किया तो बाहुबलि ऊँचे थे और भरत नीचे थे सो बाहुबलि के पलक नहीं गिरे लेकिन भरत के पलक गिर गये । जब मल्लयुद्ध किया तो मल्लयुद्ध के बाद बाहुबलि ने अपने हाथों से भरत को ऊँचा उठा लिया । इसमें भी भरत हार गये । अब देखो दुनियां यह जान गई कि भरत हार गये तो बाहुबलि का पूर्ण यश हो गया । जिसको पूर्ण यश मिल जाता है, मन माफिक पूर्ति हो जाती है उसको फिर राज्य भी अच्छा नहीं लगता । बाहुबलि के मन में राज्य का राग नहीं रहा । और वे उसी समय राज्य को छोड़ कर चल दिये, साधु हो गये ।

गृहस्थ जन बहु परिकर के बीच में हैं । सो ये सर्वदा परिकर छोड़ने में असमर्थ हैं । परंतु ज्ञानी गृहस्थ जिस कुछ समय में धर्म करते हैं तो घर के संकल्प विकल्प छोड़कर पूरी लगन से करते हैं । उनका ऐसा निर्णय रहता है कि इस चैतन्य स्वरूप की भावना, शुद्धज्ञान की दृष्टि ही धर्म का पालन है । मैं सहज जैसा हूँ वैसा ही अपने को मानूं, ऐसा निर्णय, ऐसे संस्कार करने में वृत्ति हो सकती है तो उस गृहस्थ का जीवन मोक्षमार्गीय जीवन है । यही परमात्मतत्त्व निर्विकल्प समाधि में भक्ति का कारण होता है । अब इस ही परमात्मा को इस रूप में उपस्थित करते हैं कि जो 5 इंद्रियों के द्वारा विषयों का जानता है किंतु जिसका स्वरूप इंद्रियों के द्वारा जाना नहीं जाता है उसको तुम परमात्मा जानो ।


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