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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:परमात्मप्रकाश - गाथा 69

From जैनकोष



अत्थि ण उब्भउ जरमरणुरोयवि लिंगवि वण्ण ।

नियमिं अप्पु वियाणि तुहुं जीवहं, एक्कवि सण्ण ।।69।।

यह बहुत प्राचीन भाषा है । लगभग 1 हजार वर्ष पहिले जो भाषा बोली जाती थी उस ही भाषा में ये दोहे रचे गए हैं । जिसके जन्म नहीं है, मरण नहीं है आदि बताकर यह जीव का स्वरूपास्तित्व देखा जा रहा है । पदार्थ अपने स्वभाव से मात्र अपने रूप हैं । इनकी उत्पत्ति नहीं होती । यह तो अनादिसिद्ध चला आ रहा है । इसके बुढ़ापा भी नहीं होता । जो आत्मा अमूर्त है, ज्ञानमात्र है उसको ज्योतिस्वरूप-चैतन्यतत्त्व बुढ़ापा कहां है । बुढ़ापा तो शरीर में होता है । यदि कोई बूढ़ा पुरुष अपने ज्ञानबल से अपने शुद्धज्ञानभाव को ही देखे तो उसे को वह बुढ़ापा ही कुछ नहीं है और आत्मा का मरण भी नहीं है । जो सत् है वह कहां जाय? जैसे जीव का मरण नहीं है इसी प्रकार पुद्गल का भी मरण नहीं है । शरीर से जीव अलग हो गया तो वह शरीर किसी न किसी अवस्था को लिए हुए ही रहेगा । कोई चीज सड़ जाय,, जल जाय, तो वह भस्म―बन गई । भस्मरूप में उड़ गई, परमाणु-परमाणु भी खिर जाये तो भी द्रव्य कभी नहीं मिटता । इस जीव के मरण भी नहीं है, इस जीव में रोग भ नहीं हैं । फोड़ा-फुन्सी इस अमूर्त आत्मा में कहां से हो

जायेंगे? यह तो रूपवान् चीज है । सो रूपी पदार्थों में ही होंगे । ममता का संबंध बना रखा है इन जीवों ने, इसलिए शरीर के कोई वेदना होकर भी ये अपने को उस वेदना में आत्मीयत्व मानते हैं, किंतु ज्ञानी जीव के वेदना में उपयोगबुद्धि नहीं है । वह तो निजी शुद्धचैतन्यस्वरूप को तकता है, इस कारण वहाँ रोग नहीं है ।

पुरुषलिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसकलिंग ये लिंग भी इस जीव के नहीं है । ये लिंग पौद्गलिक हैं, शरीर के नहीं है । यह आत्मा तो एक ज्ञानज्योतिमात्र है । शरीर में रहने वाला आत्मा अपनी कल्पना में लिंग जैसा विश्वास करता है, पर वस्तुत: आत्मा तो केवल चैतन्यस्वरूप है । वह न पुरुष है, न स्त्री, है, न नंपुसक है ।

इस जीव के वर्ण भी नहीं हैं । आत्मा न काला है, न गोरा है, किसी भी रूप में नहीं है । वह तो एक चैतन्यसत् है । गोरे वर्ण वाले शरीर में रहने वाला आत्मा यदि क्रोधी हुआ, मायाचारी हुआ, विश्वासघाती हुआ, अन्य किसी भी प्रकार के उपद्रव वाला हुआ तो लोग कहते हैं कि यह काले हृदय का है । इसका आत्मा काला है । तो ऐसी बुरी परिणति करके भी आत्मा काला नहीं होता; पर जैसा इसका शरीर गोरा है, साफ है, वैसा अंतरंग साफ नहीं है इसलिये उसे काला कह दिया है । जीव के किसी भी प्रकार का वर्ण नहीं है ।

इस जीव में किसी प्रकार की संज्ञा भी नहीं है । आहार, भय, मैथुन और परिग्रह; ये चार संज्ञायें भी कोई इस जीव के नहीं हैं और न संज्ञा कहिए, नाम भी जीव का कुछ नहीं है । आपके जीव का कोई नाम है क्या ? अंतर में देखो । जो मात्र ज्ञानस्वरूप है, चित् प्रतिभासरूप है उस आत्मा को बताओ कि उसका कोई नाम है ? अंतर में देखो इस चैतन्यसत् का कोई नाम नहीं है । नाम कैसे धरा जाय ? जैसे गेहूं के दाने सब एक से हैं तो उन दानों का नाम कैसे धरा जाय ? जैसे यहाँ मनुष्य के नाम रख दिये जाते हैं । गेहूं के दानों में तो फिर भी फर्क रहेगा, पर यहाँ आत्मा-आत्मा में रंच भी फर्क नहीं है । जब सब आत्मा एक प्रकार के हैं तो फिर नाम कैसे रखा जा सकता है ? नाम भी छटनी के लिए होता है कि बहुत से पदार्थों में भी किसी एक पदार्थ को न्यारा करना है, बुलाना है तो नाम रखा जाता है । पर जो सब एक से हैं उनमें नाम कैसे रखा जाय और रख भी दिया तो वह नाम सब जीवों का हो गया । फिर नाम रखने से फायदा क्या है ? तो इस जीव के कोई संज्ञा नहीं है । यह शुद्धनिश्चयनय से कहा जा रहा है ।

अच्छा भैया ! बताओ, वास्तव में यह अंगुली टेढ़ी है कि सीधी है ? आप कहेंगे कि सीधी है । जब हम टेढ़ी कर लें तो आप कहेंगे कि अंगुली टेढ़ी है । बच्चा पैदा होता है तो सीधी अंगुली लाकर नहीं पैदा होता है, वह टेढ़ी अंगुली लाकर ही पैदा होता है । फिर उसको जबरदस्ती सिखाते हैं तो उसकी अंगुली सीधी होती है । तो क्या कहा जाय कि अंगुली टेढ़ी है कि सीधी है ? सीधी कहेंगे तो टेढ़ी करके टेढ़ी बता देंगे । टेढ़ी कहे तो सीधी करके बता देंगे । पर वास्तव में अंगुली न टेढ़ी है, न सीधी है । अंगुली तो अंगुली ही है । यह सब दशाओं में रहते हुए भी एकस्वरूप है । इस प्रकार ये सब बातें जो निषेध रूप में इस दोहे में कही हैं कि न मेरा जन्म है, न मरण है, न मुझमें दोष है ये सब बातें व्यवहारनय से हैं । व्यवहारनय से के मायने झूठी नहीं, किंतु निमित्त नैमित्तिक संबंध से हैं । ये विभिन्न बातें क्यों हो गई कि भि में-भिन्न प्रकार के कर्मों के उदय है । ये कर्म भिन्न-भिन्न प्रकार के क्यों हो गये कि नाना प्रकार के क्रोध, मान, माया, लोभ? आदिक विभिन्न परिणामों से ये कर्म उपार्जित किए जाते हैं । उन कर्मों के उदय से होने वाले जन्ममरणादिक इस जीव के शुद्ध निश्चयनय से नहीं हैं ।

भैया ! हम अपने को कैसा मानें कि आकुलताएँ उत्पन्न न हों, और कैसा मान ले कि हममें आकुलताएँ ही उत्पन्न हों । अपने को द्वैतरूप मान लेना, किसी दूसरी चीज में पड़ा हूँ, फंसा हूँ और दूसरी वस्तु के निमित्त से इसमें जो विभाव परिणमन होता है उनको भी मान लेना कि यह मैं हूं, तो इस मान्यता के परिणाम में यह जीव अशुद्ध ही रहेगा । अशुद्ध रहते हुए भी शुद्धता को देखें तो कभी अशुद्धता मिट जायेगी । अशुद्ध अवस्था में भी शुद्ध देखा जा सकता है । जैसे हम अंधेरे में बैठे हुए भी समस्त उजाले की चीजों को देख लेते है, इसी प्रकार अशुद्ध-अवस्था में भी हम आपको उस शुद्ध आत्मा का ज्ञान हो सकता है । तो शुद्धनिश्चयनय से इस जीव में, कोई दंद-फंद नहीं है । क्यों नहीं है कि केवल ज्ञानादिक अनंतनयों कर देखें तो यह आत्मा अनादिकाल से चले आये जन्म-मरण, कर्म आदिक से पृथक् ही हैं । इस स्वभाव में प्रीति करेंगे तो शुद्ध परिणमन ही चलेगा, अर्थात् द्रव्य स्वभाव में प्रीति रखेंगे तो हमारा शुद्ध विकास होता चला जायगा । इस कारण स्वच्छंद होकर जैसा मन चले, चलने दो; जैसी इच्छा करे, जैसा भाव करे सो होने दो । ऐसी प्रवृत्ति में सार कुछ नहीं है । सार तो अपने आपमें बसे हुए उस परमात्मा के दर्शन में ही है ।

इस दोहे से यह शिक्षा लेना है कि ये जन्म-मरण, सुख-दुःख सब हेय है; क्योंकि उपादेयरूप अनंत सुखों का अविनाभावी जो शुद्धज्ञानमय चीज, है उससे ये सब भिन्न हैं । मेरी शरण कौन हो सकता है? जो सदी मेरे पास हो और ध्रुव रहता हो । ध्रुव तो पुद्गल परमाणु भी है पर वह मेरे पास सदा नहीं है । तो जो मेरे निकट हो या मैं ही खुद और ध्रुव होऊं ऐसा तत्त्व ही उपादेय है, बाकी अन्य सब भाव हेय ही होते हैं । यह शिक्षा हमें इस दोहे से लेना चाहिए ।

जीव का हित करने वाला भाव अहिंसाभाव है । हिंसा का भाव, न होना यह जीव में एकमात्र हितकर भाव है । अहिंसा को एक जगह समंतभद्र स्वामी ने कहा हैं कि अहिंसाभाव ही परमब्रह्म है । उस अहिंसा का अर्थ क्या है? हिंसा न होना । यह जीव किसकी हिंसा कर सकता है? यह एक ज्ञानमात्र अनंतगुणनिधान अपने ही स्वरूप से अपना अस्तित्व रखने वाला है । यह जीव अपने प्रदेशों से बाहर अन्यत्र क्या कर सकता है? यह जीव एक ज्ञानज्योतिमात्र है, किंतु भ्रमदृष्टि से (व्यवहारदृष्टि से) बाहर में कर्तृत्व मानता है । और निश्चयदृष्टि से शांति और आनंद में मग्न रहने का इस जीव में परिणाम होता है यह जीव अपने आप से बाहर कुछ नहीं कर सकता है । इतना ठीक निर्णय कर लेना ही धर्म का पालन है । कोई भी काम करें, विधिपूर्वक किया जाय तो उसका फल सामने आता है । धन कमाने का भी काम करो, यदि विधिसहित किया जाय तो उसका फल सामने आता है । सामाजिक काम किया जाय तब भी विधिसहित किया जाय तो उसका फल सामने आता है । इसी प्रकार धर्म का काम किया जाय तो विधिसहित किया जाय तो भी उसका फल सामने आता है ।

धर्म की विधियों में सबसे पहली विधि यह है कि ‘‘अपने आपको जाने’’ कि यह भावात्मक मैं चेतन अपने प्रदेशों से बाहर कर क्या सकता हूं? ‘‘इसका निर्णय कर लेना परमपुरुषार्थ है, धर्म का मौलिक पालन है’’ । धर्मज्ञान साध्य है, धनसाध्य नहीं है । धर्म के पालन में यह अटक नहीं है कि हम गरीब हैं तो धर्म सधता ही नहीं । उसका पालन कैसे करें? अपने आपका निर्णय कर लो कि यह मैं आत्मा केवल अपने आपको कर सकता हूँ । किसी रूप भी करूं, केवल अपने द्वारा ही किया करता हूं और उस करने का फल केवल मुझमें होता है । मेरा सर्वस्व मेरे से बाहर कहीं कुछ नहीं है । मैं अज्ञान में होऊं तो अपनी ही हिंसा करता हूँ, कषाय में होऊँ तो अपनी ही हिंसा करता हूँ । निमित्तनैमित्तिक भावों से, उसकी चेष्टा के निमित्त से दूसरे जीवों का घात हो जाय तो उसके अपने दुष्परिणाम के कारण हिंसा लगी है । सबसे अधिक हिंसा तो यह है कि अपने ज्ञान और आनंद का निधान जो यह प्रभुस्वरूप है उसको दबाये हुए हो । अपने निज नाथ पर अन्याय कर रहे हो, शांति से परे हो रहे हो; यही सबसे बड़ा आघात अपनी परिणति से अपने आप पर कर रहे हो । यह है अनंतानुबंधी क्रोध । चाहे लोगों को देखने में यह आये कि यह तो बड़ी शांति से रहता है, किसी को गाली भी नहीं देता है । ठीक है, किंतु यदि अपने प्रभु का प्रसाद नहीं पाया, इस ज्ञानस्वभावी निजसहजभाव का परिचय नहीं लिया तो वह अपने प्रभु पर अत्यंत अन्याय करता है और अनंतानुबंधी क्रोध करता है ।

भैया ! अपन किस बात में फूले फिरें ? धन का समागम जुट गया तो इससे कुछ अपने कल्याण की बात हासिल नहीं होती । मरना पड़ेगा, सब कुछ छोड़कर जाना होगा । इन मोही पुरुषों में कुछ जानने की बात कर ली तो इससे पूरा न पड़ेगा । ये मोहीजन भी विघट जायेंगे और यह मैं भी विघट जाऊँगा । इन मोही जनों से आत्मा का पूरा न पड़ेगा । जगत में कौनसा ऐसा सारभूत काम है कि जिस काम से इस मुझ आत्मा का पूरा पड़ जायगा? मोह के उदय की विचित्र महिमा है । जब तक धन-जन का समागम रहता है तब तक उस समागम के प्रति यह नहीं सोच सकते कि ये समागम विनाशीक हैं, बिल्कुल भिन्न है, इनसे मेरा हित नहीं है; किंतु जब समागम विघट जाता है, इष्ट वियोग हो जाता है तो कुछ समय बाद इसे यह विदित होता है कि मेरा कुछ भी तो अधिकार न था, कोई संबंध न था । इष्ट के वियोग होने के बाद जो बुद्धि आया करती है ऐसी बुद्धि इष्ट के समागम के रहते हुए भी रहे तो उससे जीव के कल्याण में आने के लिए संदेह नहीं हो सकता है । हम-आप जीव प्रतिक्षण अपने आपके स्वरूप को भूल कर अपनी हिंसा करते चले जा रहे हैं और बातों की व्यवस्था तो बनाते फिरते हैं, किंतु निज की अपनी व्यवस्था बनाने की ओर दृष्टि ही नहीं है ।

ये सब दृश्यमान जीवलोक असमानजातीय पर्यायें कहलाती हैं, अर्थात् चेतन और अचेतन इन दोनों के संबंध में ये पर्यायें प्रकट होती हैं । दिखने वाले ये पदार्थ तो समानजातीय हैं । पुद्गल-पुद्गल, एक सी जाति के मिल गए और उसका यह रूप बन गया, किंतु यह तो चेतन और अचेतन के मेल से व्यवहार में आने वाली पर्याय बन गई है । सब तत्त्व विघट जायेंगे, चेतन अलग हो जायेंगे, ये स्कंध अलग हो जायेंगे । ऐसी ही सब दृश्यमान पदार्थों की स्थिति है ।

पर्यायमूढ़ पुरुष, मोही जीव जिनमें विश्वास जमाये हुए हैं, उससे बढ़कर भयंकर दु:ख देने वाला साधन और कोई दूसरा नहीं है । यह मोही प्राणी जिसमें भय खाता है, संयम से, व्रत से, ज्ञान से भय खाता है, उससे बढ़कर अभय और अमृत का तत्त्व लोक में अन्य कुछ नहीं है । नरकगति में गये तो क्या-क्या कष्ट नहीं भोगे ? भूख का कष्ट सारी उमर भर, सागरों पर्यंत, प्यास का कष्ट सारी उमर, ठंडी गर्मी की वेदना सागरों पर्यंत । पाप के उदय आने पर कठिन से कठिन दु:ख सह जिए जाते हैं, किंतु पुण्य का समागम होने पर अपने आपकी इच्छा से रंच भी भोग नहीं छोड़ जाते । इन भोगों में आसक्ति का परिणमन यह है कि अगले भव में सदा के लिए भोगों को तरसते रहेंगे और भोगों की प्राप्ति न होगी । और प्राप्ति भी हो गई इस भव में, तो उस भोगप्राप्ति से कौनसा सुफल निकाल लिया ? यह आत्मा अपने आपको भूलकर अपन निरंतर हिंसा करता चला आ रहा है ।

इन जीव सुघटों को कभी बहुत सिखाया भी जाता है । पुद्गल भिन्न है । धार्मिक समारोहों में कभी-कभी मन भी बदलने की कोशिश की जाती है, पर वाह रे मोह ! उस समय भी और उसके बाद भी तू मोह से रंगा हुआ बना रहता है । सुवा ने खूब सीखा पिंजड़े में बंद होने की स्थिति में, ऐ ! सुवा तू भग नहीं जाना और भग जाओ तो नलनी पर मत बैठना । नलनी एक ऐसा डंडा या कोई गोल चूड़ी सी होती है कि जिस पर बैठकर सुवा उलट जाता है । वह उलटने पर नलनी को नहीं छोड़ता है । क्योंकि छोड़ दे तो उसे डर लगता है कि कहीं में गिर न जाऊं । सो शिकारी आता है और बड़े आराम से उसे पकड़ लेता है । खूब सीखा सुवा ने, देखो नलनी पर बैठना नहीं, और नलनी पर बैठना तो दानों के चुगने की कोशिश न करना । दाने चुगने का यत्न भी करना तो उलट न जाना और उलट भी जाना तो तुरंत छोड़ देना । रोज पाठ किया, रोज याद किया । एक दिन पिंजड़ा उसका खुला रह गया, झट उड़कर सुवा भाग गया । भागा तो एक जगह खूब अनाज के दाने देखे । उन दानों को शिकारी ने बिखेर दिया था । सुवा पढ़ता जाता, कि तू भग मत जाना, भगना तो नलनी पर मत बैठना । ऐसा पढ़ता जा रहा है और बैठ गया उस नलनी पर । देखो नलनी पर बैठना तो दाने चुगने की कोशिश मत करना । दोने चुगता जा रहा है और यह कहता जा रहा है । वह सहज ही उस नलनी पर लटक गया और बोलता जा रहा है कि अगर दाने चुगने की कोशिश भी करना तो उलट मत जाना और लटक भी जाना तो पकड़े मत रहना । खूब याद कर रहा है और उस नलनी में ही वह लटका हुआ है, उसे छोड़ता नहीं । ऐसा बोलने वाला तोता शिकारी को ज्यादा प्यारा लगा और आराम से उसे पकड़ लिया ।

एक कोई किसान खूब हुक्का तंबाकू पीने वाला पुरुष था तो हुक्का पीते समय अपने बच्चे को शिक्षा देता था । देखो बेटा ! हुक्के में बड़े दुर्गुण हैं, इससे बीमारी होती है और अपना गुड़-गुड़ करके पीता जा रहा है । यह कहता जाता है कि देखो बेटा । इससे व्यर्थ का खर्च भी होता है और समय भी बरबाद होता है । रोज सिखाया और उसे पक्का करा दिया । वह पुरुष तो गुजर गया । कुछ समय बाद वह लड़का खूब हुक्का पीवे । एक सज्जन ने समझाया कि तुम्हारे बापू तो तुम्हें खूब शिक्षा दिया करते थे कि हुक्का न पीना, इसमें बहुत विकार हैं । बोला, यह तो हुक्का पीने की विधि है कि हम पीते जाये और लड़के को मना करते जायें । इस तरह की एक विधि होती है । तो इस विधि से हमारे पिताजी हुक्का पीते थे । हम भी जब हुक्का पीते हैं तो अपने लड़के को सामने बैठाल लेते हैं और शिक्षा देते जाते हैं । हम अपनी आदतों पर या संयम पर कुछ दृष्टपात न करें और यथा-तथा जीवन व्यतीत करते जायें तू हमने अपने लिए क्या किया ?

भैया ! पहली हानि तो हम यह करते हैं कि हम अपने आपको जानना नहीं चाहते कि मैं क्या हूं? कैसे जाने? दिल तो स्त्री-पुत्रों में विकट लगा हुआ है । इतना सोच सकने का अवकाश ही नहीं है कि मैं अपने को सबसे निराला केवल ज्ञानज्योतिमात्र जान सकूं । निरंतर विषयवासना में चेतन-अचेतन परिग्रहों में हो यह मेरा है, ऐसा भाव जमा हुआ है । तो विषयभोग या ममतापरिणाम और मोक्षमार्ग ये दोनों एक साथ नहीं हो सकते । जैसा कोई मुसाफिर एक साथ पूरब में भी जाय, पश्चिम में भी जाय ऐसा नहीं हो सकता है । एक सूई एक साथ आगे भी सीती जाय, पीछे भी सीती जाय, ऐसा नहीं हो सकता है । इसी प्रकार ममता के, अहंकार के, अज्ञान के, परिणाम भी बनाये रहें और मोक्षमार्ग भी पा ले तो यह नहीं हो सकता है । हम अपनी हिंसा से कुछ तो हटें ।

भैया ! अपने आपको नहीं जानते, यह बहुत बड़ा आक्रमण है । अपने प्रभु पर और इंद्रियों के विषय में लगना यह दूसरा आक्रमण है । अपने नाथ पुर और फिर कषायों की धुन में रहना यह हमारा तीसरा आक्रमण है । अपने नाथ पर जहां इतना आक्रमण किया जा रहा हैं वहाँ हम अपने को अहिंसक कह दें तो कैसे कहा जा सकता है? ऊपरी दिखावटी दया से कहीं अहिंसा का लाभ न होगा । कुछ लौकिक परंपरा ऐसी है कि जिसमें छूत और छोटे-छोटे कीड़े मकोड़ों की हिंसा का बचाव चला आ रहा है । ठीक है, पर इतने मात्र से अहिंसा का पालन नहीं होगा । आप अपने स्वरूप को जानो । फिर अपने स्वरूप के समाने ही जगत के सब जीवों को जानों । जगत के जीवों को देखकर हमें वह शुद्धज्ञान स्वरूप समझ में आये । बाद में फिर पर्यायों के संक्लेश से बचाने की बात आयें तो वह पैने ज्ञान की कला है । और देखते ही हो ये सब पर्यायें, दशाएँ, पाप-पुण्य बहुत फैले नजर आये और समझाये-समझाये भी, दिल लगाये-लगायें परमात्मस्वरूप की बात समझ में न आयी । यह तो अपने आपकी हिंसा है ।

पूज्य श्री अमृतचंद्र सूरि ने एक जगह लिखा है कि ‘‘इह सकलस्यापि जीवलोकस्य संसारचक्रकोऽधिरोपितस्यतस्याश्रांतमनंतद्रव्यक्षेत्रकालभवभावपरावर्तें:, समुपक्रांतभ्रांतेरकच्छत्रीकृतमोहतया महता मौहग्रहेणगोरिव बाह्यमानस्य प्रभोज्जृंभिततृष्णातंकत्वेन व्यक्तांतराधेरुत्तभ्योततम्य मृगतृष्णायमानं विषयग्राममुपरंधानस्य परस्परमाचार्यत्वमाचरतोऽनंतश: श्रुतपूर्वानंतश: परिचितपूर्वाऽनंतशोऽनुभूतपूर्वा चैकत्वविरुद्धत्वेनात्यंतविसंवादिंयपि कामभोगानुबद्धा कथा ।’’

यह सर्वजीव लोक संसारचक्र की कील पर ठहरा हुआ है, जैसे कुम्हार का चाक एक बहुत पतली कीली पर पड़ा है, उस कीली के आधार पर वह चक्र घूमता रहता है । इसी प्रकार यह जीवलोक संसारचक्र की कीली पर घूमता है । संसारचक्र की कीली क्या है ? अज्ञानपरिणाम, रागद्वेष विषमता का भाव उस कीली पर ठहरा हुआ है । सो अनंतकाल इसने व्यतीत किए । कोई एक बड़ा हिंडोलना होता है । मशीन से चलने वाला, जो 50-60 गज की डाइमेटेर की गोलचक्र हो उसमें पलकियां लगी हैं?। बच्चे लोग उस पर झूलने के लिए बैठ जाते हैं । बहुत जोर से झुलाते हैं । नीचे से ऊपर को पलकियों के जाने में इतनी व्यग्रता नहीं होती, पर जब ऊपर से नीचे को पलकियां जाती हैं तो हाय मैं मरा, मानों जान नहीं रही । यों हल्का हो जाता है पर वह घुमाता रहता है, वह बालक चिल्लाता रहता है, परंतु भैया ! यह कौनसा बड़ा घुमाव है, 343 घनराजू प्रमाण? इतने विशाल लोक में उन पलकियों से भी अनोखे ढंग से अनंतकाल के चक्र में यह जीव फंसा है । फिर भी देख लो एक ही चाह है कि मैं एकछत्र राज्य कर लूं, सबका धन मेरे ही पास आ जाये । धन तो परिमित है । अपने पास अधिक धन आने की बात सोचना? इसका क्या अर्थ है कि अन्य लोग भूखे रहें, गरीब रहें और सब पैसा मेरे पास आ जाय । एकछत्र सारे राज्य पर राज्य करना चाहते हैं । पर देखो वह कुछ न मिलेगा । होता है सब कर्मों के उदय से । भैया ! राजस्थान को आजकल राजस्थान बोलने लगे । रज: मायने भूमि और स्थान मायने जगह । उस धूलि वाले देश में बालू के रेत को चमकता हुआ देखकर प्यासा हिरण दौड़ लगाता है कि कहीं पानी पीने को मिल जाय । पर जैसे ही व दौड़ लगाकर आ पहुंचता है तो वहाँ पानी का एक बूंदे भी नहीं है । फिर गर्दन उठाई दूर की रेत पर, फिर उसे पानी जैसा लगने लगा । फिर दौड़ लगाई, फिर वहाँ पहुंचता है तो पानी का नाम नहीं है। इस तरह से थककर वह वहीं अपने प्राण गवां देता है । इसी प्रकार ये जीव लोग इन विषयों की आशा में रात दिन दौड़ लगाये जा रहे हैं । जहाँ पहुँचते हैं, वहाँ ही कुछ नहीं मिलता है । लखपति हैं तो वे असंतुष्ट हैं, करोड़पति हैं तो वे असंतुष्ट हैं दूसरे लोगों की तो मूढ़ता उनको दिखती है कि इन जीवों पर कौनसा संकट हैं? खायें और मौज करें । पर केवल खाने की स्थिति तक ही यह मोही गम नहीं खाता है, व्यर्थ की थोथी दुःखदायिनी कल्पनाओं के वशीभूत होकर इन दु:खी, पापी, मलिन भटकने वाले जीवों में न जाने क्या राज्य करना चाहते हैं ? इसे महान मोह पिशाच ने दबा लिया है ।

यह मुग्ध प्राणी कोल्हू के बैल की तरह गोल-गोल घूम रहा है । कोल्हू के बैल की आंखों में पट्टी बंधी है, पर वह बेचारा यह नहीं जान पाता है कि मैं गोल-गोल घूम रहा हूं । वह तो यही समझता है कि मैं सीधा जा रहा हूँ । यदि उसके ध्यान में यह आ जाय कि मैं यह गोल-गोल चक्कर लगाता हैं, तो वह मरने मात्र इस ध्यान से ही गिर जायगा, मूर्छित हो जायगा, कुछ पता न पड़ेगा । उसी जगह यह घूम रहा है । पर यह जान रहा है कि मैं नई-नई जगह जा रहा हूँ । इसी तरह दूसरे जीवों के सुख के लिए जुतने वाला कोल्हू का सा बैल, इसके ज्ञान पर अज्ञान की पट्टी बंधी हुई है । सो यह करता तो है गोल-गोल वाला काम, कल की चर्या, परसों की चर्या, जीवन भर की चर्या; वही तो काम कर रहा है । सुबह हुआ, स्नान आदि किया कुछ धर्म के नाम पर हम सुखी रहें, हमारा परिवार सुखी रहे, हमारी जीवननैया अच्छी तरह बीत जाय, कुछ भजन किया, भोजन किया, वही दाल रोटी जो कल खाई थी, आज खा रहे हैं । पर ऐसा लग रहा है कि नई चीज खा रहे हैं । वही विषयभोग जो कल थे और सोचते हैं कि हम नई चीज कर रहे हैं । वही मान, इज्जत, जिनकी धुन कल थी, आज भी है । उन्हीं पंचेंद्रियों और छठे मन के विषयों में ही फंसकर दौड़ लगाये जाता है यह जीव । और इतना ही नहीं, दूसरों को विषयों में फंसाने के लिए चतुर, आचार्य (गुरु) बन रहा है; विषयों की धुन में लगा हुआ है । इस तरह से हलुवा बनाओ, चलो सिनेमा देखें, वहीं आनंद है । इस तरह से उपदेशक गुरु बन रहा है ।

भैया ! इस जीव ने इन विषयभोगों की कथा तो बार-बार सुनी है, और परीक्षा में आई है, अनुभव की है । पर ‘‘इदंतु नित्याव्यक्ततयाऽंत: प्रकाशमानमपि कषायचक्रेण सहैकीक्रियमाणत्वादत्यंततिरोभूतं सत्स्वस्यानात्मज्ञतया परेषामात्मज्ञानामनुपासनाच्च न कदाचिदपि भूतपूर्व न कदाचिदपि परिचितपूर्व न कदाचिदप्यनुभूतपूर्वं च निर्मलविवेकालोकविविक्तं केवलमेकत्वम् ।’’ यह मेरा ब्रह्मस्वरूप, यह मेरा एकत्त्वस्वरूप अभेदचैतन्य ज्योति, यह मेरा नाथ जो अनादिकाल के मेरे इस अंतर में नित्यप्रकाशमान है । वह कषायचक्र के साथ एकमेक कर दिया गया है, सो अत्यंत तिरोहित हो गया है । अब अपने आत्मा को जान नहीं सकता और कोई जो आत्मा को जानने वाले पुरुष हैं उनकी सेवा उपासना को चित्त नहीं उमड़ता । तब यह स्वसंवदेन ज्ञान के द्वारा अनुभव में आने वाला परमब्रह्मस्वरूप आज तक न कभी सुनने में आया, न परिचय में आया, न अनुभव में आया । ऐसी हिंसामय स्थिति इस जीव को बन रही है, पर यह जीव अपने को समझ रहा है कि हम बड़ी मौज में है । बढ़िया मेरा मकान है, बढ़िया मेरे परिजन हैं, नौकर चाकरों की पूर्ण व्यवस्था है, कामकाज मेरा बढ़िया चलता है । अरे ! ये तो सब स्वप्न की बातें हैं । मोह की नींद की बातें हैं । ये क्षण भर में नष्ट हो जायेंगे । और कदाचित ज्ञान हो गया तो उनका मूल्य अब यह नहीं रहा । सो ये नष्ट हो जायेंगे । भैया ! कल्याणार्थी को अहिंसक सत्य मायने में होना चाहिए । हिंसा तो यह दूसरों की करता ही नहीं है, सदा अपनी हिंसा करता है । झूठ बोला उसमें भी हिंसा । चोरी की, उसमें भी हिंसा । कुशील किया, उसमें भी हिंसा । परिग्रहसंचय किया उसमें भी हिंसा । ‘‘एक ही पाप है दुनियां में हिंसा और एक ही धर्म है दुनियां में अहिंसा’’ । अपने आपको न समझना और विषयों में रमना, झूठे समागमों में डाले फूले बने रहना, यह सब इस निजपरम ब्रह्मदेव की हिंसा है । सत्य मायने में अहिंसक बनो । यदि अहिंसा की ओर कदम बड़े तो जैनशासन का हमने फल पाया । नहीं तो जैनशासन जैसे अमूल्य रत्न को हमने यों ही सागर में पटक दिया । सो अपने को पहिचानों, अपने को जानों और अपने में रमण करो । इस स्थिति के होने के बाद फिर जो आपकी बुद्धिमानी की प्रवृत्ति चले, सो चलने दो पर, अपने आपकी दृष्टि करके सत्य अहिंसक बनों । यही जिनशासन का मूल उद्देश्य । अब यदि जन्म आदिक शुद्धनिश्चयनय से जीव के स्वरूप नहीं हैं तो जन्म आदिक किससे होते हैं? ऐसा प्रश्न होने पर उत्तर देते हैं कि जन्म, मरण आदिक शरीर के होते हैं ।


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