• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • वर्णीजी-प्रवचन
  • Discussion
  • View source
  • View history

वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:परमात्मप्रकाश - गाथा 73

From जैनकोष



कम्महँ केरा भावडा अप्णु अचेयणु दव्वु ।

जीवसहावहँ भिण्णु जिय णियमिं बुज्ज्ञहि सव्वु ।।73।।

कर्मों के संबंधी जितने भी भाव हैं और अन्य जितने भी अचेतन द्रव्य हैं; हे आत्मन् ! तुम उन सबको अपने जीवस्वभाव से भिन्न ही जानो । यह आत्मतत्त्व विशुद्धज्ञानदर्शनस्वरूपी है । और ये परभाव, परद्रव्य ज्ञानदर्शन से अत्यंत जुदा हैं । सो हे जीव ! इस अपने आपके आत्मतत्त्व को समस्त परद्रव्यों से और परभावों से भिन्न जानो । सुख का मार्ग तो बिल्कुल सीधा है, पर चलते नहीं बनता तो इसमें दोष किसका है? खुद चलते नहीं बनता और दोष दिया जाता है अन्य लोगों पर । खुद शांत होते बनता नहीं; दोष दिया जाता है कि इसने मुझे क्रोध कराया है । खुद ज्ञानरूप से परिणम नहीं सकते, अपराध लगाया जा रहा हैकि स्त्री ने, बच्चों ने मुझे फांस लिया । ‘‘नाच न आवे आंगन टेढ़ा ।’’ कोई संगीत की सभा जुड़ी हुई थी । नाचने वाला भी घुंघुरु पहिने खूब तैयार खड़ा हुआ है । कोई अवसर ऐसा आये कि पता नहीं क्या हो जाये कि कला का रूप बनाया ही न बने । नाचते ठीक न बने तो कहता है कि मालूम पड़ता है कि यह चौक टेढ़ा है । नाचते खुद नहीं बनता और बताता है चौक का दोष । इसी तरह खुद तो अपराधी है, मोही है राग करता है व्यर्थ में मोहियों पर (संसार के असार जीवों पर); जिनसे कुछ संबंध भी नहीं और दोष देता है कि अमुक का कुछ लेनदेन है या अमुक मुझे छोड़ते नहीं है । घर के लोग इजाजत देते नहीं हैं । क्या तुम्हारी आत्मा इन सब मोही जीवों के हाथ बिक चुका है? जो श्रद्धा में ऐसी परतंत्रता अनुभवी जा रही है कि हम कुछ नहीं हैं । ये लोग इजाजत दें, छोड़ दें तो हम अपने शुद्ध आत्मा की भावना में लगें । समस्त परद्रव्यों को और परभावों को अपने से भिन्न ही समझो । इस दोहे में यह बताया जा रहा है कि जब यह मिथ्यात्व, अविरति, कषाय और योग को हटाता है, निर्मल परिणाम बनाता है, उस काल में यह सुरक्षित है । अनुभव में आये कि जो शुद्ध आत्मतत्त्व है वही उपादेय है । इस प्रकार परभाव और परद्रव्यों से भिन्न आत्मतत्त्व की भावना करने की प्रेरणा देने वाला यह दोहा कहा गया है ।

अब यह निश्चय किया जा रहा है कि हे ज्ञानी पुरुष ! ज्ञानमय परमात्मा से भिन्न समस्त परद्रव्यों को छोड़कर एक शुद्धआत्मा की ही भावना भाओ ।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=वर्णीजी-प्रवचन:परमात्मप्रकाश_-_गाथा_73&oldid=81674"
Categories:
  • परमात्मप्रकाश
  • प्रवचन
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 17 May 2021, at 11:56.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki