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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:परमात्मप्रकाश - गाथा 75

From जैनकोष



अट्ठहँ कम्महँ बाहिरउ समलहं दोसहँ चत्तु ।

दंसणणाणचरित्तमउ अप्पा भावि णिरुत्तु ।।75।।

जो 8 प्रकार के कर्मों से रहित है, सर्वप्रकार के दोषों से मुक्त है, जो दर्शन, ज्ञान, चारित्रमय है । हे भव्य जीव ! उसको तुम परमात्मा जानो और ऐसी भावना करो ।

भैया ! शब्दों में स्वयं सामर्थ्य नहीं है कि शब्द किसी को ज्ञान जगा दें । किंतु जिनका ज्ञान जगा हुआ होता है वें शब्दों का निमित्त पाकर अपने आप में जग जाते हैं । कोई बच्चा राजा राणा की बारह भावनाएँ बोलता है, सुनने वाले पचासों जन हैं । उन पचासों में से किसी को उसका बड़ा ऊंचा गर्भित अर्थ सूझता है । किसी की केवल इतना ही सूझता हैकि हमारे पाठशाला के बच्चे देखो, कितना अच्छा बोल रहे हैं । जो बोल रहे हैं उसका वाच्य अर्थ उन्हें प्रतीत नहीं होता और कुछ लोगों को तो ऐसा लगता है कि क्या बेकार की बातें बच्चों को सिखा रहे हैं । स्कूल में पढ़ाने से तो

काम चलता है और यह व्यर्थ का काम लगा रखा है । चीज वही है । जो जिस योग्य है वह उसी माफिक अर्थ लगाया करता है । शब्दों में स्वयं सामर्थ्य नहीं है कि जन-जन को अपनी बात बता दिया करें । एक फल होता है अनन्नास । अब कोई अनन्नास की तारीफ शब्दों से करे तो जिसने नहीं खाया उसके लिए शब्द बेकार हैं । उसने कुछ अर्थ नहीं रखा, कुछ भाव नहीं निकाला और जिसने अनन्नास खाया है उसके तारीफ करना तो दूर रहा, नाम लेने से ही मुँह में पानी आ गया होगा । शब्द स्वयं किसी की क्या बताते हैं? ये शब्द अपने-अपने ज्ञान का चमत्कार हैं । ‘‘परमतत्त्व के परिचयी इन शब्दों से परमतत्त्व का ज्ञान करते हैं ।’’

इस दोहे में योगींदुदेव ने आत्मा के संबंध में तीन बातें बतायी हैं । जो केवलज्ञानस्वभाव मात्र अपने आत्मा से परिचित है वह विशेषण का शब्द सुनकर ही सब समझ जाता है । प्रथम विशेषण में कहा है कि यह आठों कर्मों से परे है । ओह, वह तो केवल ज्ञानस्वभावमात्र अमूर्त पदार्थ है । उसमें कर्म कहां चिपके हैं ? कर्मों से यद्यपि वह बद्ध है, निमित्तनैमित्तिक योग से बंधन दृढ़ लगा है । फिर भी ज्ञान में ऐसी खूबी है कि बंधन से बंधे हुए होकर भी हम बंधन को नहीं निरखते तो अपने ज्ञान में हम बंधन से मुक्त हो गये; उपयोग को और अपने स्वभाव को अनुभवने लग जायेंगे।

जैसे आपको घर के तीन-चार कमरों के भीतर के कमरे में तिजोरी रखी है । उस तिजोरी के अंदर संदूक है, उस संदूक के अंदर डिबिया है; डिबिया में कपड़े में बंधी हुई आपकी हीरा जड़ी हुई अंग्रेजी रखी है । आप यहाँ बैठे है। जब आपको ख्याल आ गया तो ज्ञान तुरंत अंगूठी में पहुंच जायगा । उस ज्ञान को न तो दरवाजे के किवाड़ ने रोका, और जितने कमरे हैं वे भी बंद पड़े हैं । आप सब लोग मंदिर में आ गए, ताला लगाकर आये होंगे । न मोटे किवाड़ों ने रोका, न कमरों की भीतों ने रोका, न संदूक ने रोका, न डिबिया ने रोका । कोई भी उस ज्ञान को रोक नहीं सका । ज्ञान की ऐसी निर्बाध गति है । जैसे लोकोक्ति में कहा करते हैं कि ‘‘जहाँ न जाये रवि, वहाँ जाये कवि’’ । उस कवि का मतलब ज्ञान से है । जहाँ सूर्य की किरणें प्रवेश नहीं कर सकती हैं वहाँ भी इस ज्ञान का प्रवेश हो जाता है ।

यहाँ अभी मोटीसी बात कह रहे हैं । सुनने के लिए बिल्कुल साधारण बात है । भगवान् कैसा है? 8 प्रकार के कर्मों से रहित भगवान् है । अपने आठ वर्ष के बच्चे से पूछो तो वह बता देगा कि सिद्ध उसे कहते हैं जो 8 प्रकार के कर्मों से छूट गया है । बात बड़ी नहीं कही जा रही है, मगर सुनने वालों के जानने वालों के ज्ञान का ऐसा चमत्कार है कि छोटीसी बात सुनकर कितना बड़ा महत्वशाली, प्रभुस्वरूप नजर में आ लेता है । एक बड़े ज्ञान की बात कहने वाला छोटा आदमी है, पड़ौस का गांव का । वह भी शिक्षा का एक वाक्य कहता है, उसे हम सुनते हैं । और बाहर गांव से आये हुए किसी श्रद्धेय पुरुष के मुख से उससे भी कम शब्दों में शिक्षा की बात सुनते हैं तो हमारे हृदय में इस श्रद्धेय की बात का असर होता है और उसका महत्व समझते हैं । यह किनकी कला है? यह सुनने वाले की कला है । सुनने वाले ने अपना चित्त श्रद्धा से भर लिया तो श्रद्धा से भरा हुआ चित्त होने से वह हृदय बहुत कुछ ग्रहण कर लेता है । यह सब अपने स्वरूप, अपने ज्ञान का और सम्यक्भावों का चमत्कार है ।

प्रभु कैसा है? प्रभु 8 कर्मों से रहित है । देखो, प्रभु गुणगान में ज्ञानी की कैसी आंतरिक रुचि हो रही है । जैसे जिसको अपनी स्त्री से प्रेम है वह स्त्री हों मायके में और वहाँ का कोई तुच्छ आदमी भी सुसराल से आया हो तो उस निम्नजातीय के मुख से भो वह बड़ी उत्सुकता से बातें सुनना चाहता है वह दामाद । तुम कहां रहते हो; तुम उनके घर के पास ही रहते हो क्या? तुम्हें आज ससुर साहब मिले थे ? धीरे-धीरे स्त्री की कुशलता के शब्द भी सुनना चाहता है, जिसको कि श्रद्धा में रखा है । यह बातें सुनता है और उस व्यक्ति से भी बड़े विनय से बोलता है ।

उक्त दृष्टांत में यह बताया जा रहा है कि छोटे के मुख से भी बड़ी श्रद्धा से अपनी मनचाही चीज के बारे में जानना है । इसी प्रकार जिसको आत्मतत्त्व में रुचि है उस आत्मा के पते की बात कोई कहे, चाहे छोटा हो चाहे बड़ा, उन शब्दों को रुचि से सुनना चाहता है । इससे कुछ शब्दों की महत्ता नहीं होती । शब्दों से हमें क्या प्रयोजन? पर उन शब्दों के माध्यम से हम अपनी अभीष्ट आत्मतत्त्व की बात सुननी चाहते हैं । इसीलिए आत्मदेव की बात को कहने वाला कोई पुरुष हो वह इसे प्रिय लग जाता है । विशेषत: इसे क्या प्रिय लगा? अपना आत्मा ही इसे प्रिय लगा । केवल सीधे शब्द बोले जा रहे हैं । जैन शास्त्रों में घुमा-फिरा कर शब्दों को बोलने में महत्व नहीं दिया, फिर भी कोई बड़े शब्द शास्त्रों का खिलाड़ी हो तो वह अपनी लीला से एक हाथ से शब्द-छटा को भी खेल जाता है । समंतभद्र स्वामी ने जिनशतकस्तुति बनाया है, उसमें करीब 100 श्लोक हैं । वे इतने कठिन हैं और इतने टेढ़टाढ़ से चित्रित किये हुए हैं, कोई धनुष के रूप में, तलवार के रूप में अनेक चित्रों से उन्हें बांधा है; जिसका अर्थ लगाने में बड़े-बड़े विद्वान् सिर रगड़ते हैं । पर उन्हें अर्थ निकालने की युक्ति न मालूम हो तो वे अर्थ नहीं निकाल सकते । समंतभद्रस्वामी ने इसमें अपना एक हाथ दिखा दिया । यह भी प्रभुभक्ति की एक पद्धति है । पर इतने कठिन शब्दों से कुछ वर्णन करने में उनकी भी रुचि मूलत: नहीं थी । समंतभद्र स्वामी ने बहुत ही सरल शब्दों में रत्नकरंड श्रावकाचार नाम की पुस्तक लिखी । उसमें बहुत ही साधारण बातें रखीं । उन्होंने धर्म की प्राप्ति को, धर्म की प्रभावना को बहुत ही साधारण शब्दों में लिखा । जिस जमाने में लोग आडंबर से जगत को मोह रहे थे, उस जमाने में जिनशतकस्तुति में समंतभद्रस्वामी ने अपना एक हाथ दिखाया, वह भी भक्ति और धर्मप्रभावना की उमंग में । ऋषिजनों की आदत बहुत सरल शब्दों में सब कुछ बताने की होती है । यहाँ योगींदुदेव सीधे वृद्ध महापुरुषों जैसी बात कह रहे हैं ।

आजकल की सभा―सोसाइटी में कोई प्रस्ताव रखना हो तो प्रस्ताव रखा जायगा एक मिनट में; पर उसकी भूमि का कहने में 1 घंटा लगेगा । जो बात रखना है समाज में उसे सब कुछ कह चुकने के बाद में बिल्कुल अंत में एक या दो मिनट में रखेंगे । पर बूढ़े आदमियों को जो बात कहना है पंचों में, वह बात वे पहले ही धर देते हैं । भैया ! बात यह है, अब व्याख्या पीछे करेंगे । तो वृद्ध पद्धति के अनुसार यहाँ योगींद्र आचार्य देव सीधे शब्दों में कह रहे हैं कि आत्मा 8 कर्मों से रहित है । शब्द दो-तीन है। कलाकौशल जानने वाले का है, सुनने वाले का है कि वह वहां तक पहुंचता है । यह आत्मा 8 कर्मों से रहित है, ऐसा कहने से यह बातें तो अपने आप आ गई कि शरीर से भी रहित है, कुटुंब से भी रहित है और घर से भी रहित है । मरने पर जो चीजें साथ जाती हैं, उनसे जब रहित बता रहे हैं तो जो मरने पर साथ नहीं जाती, उनसे रहित है, यह बात तो अपने आप ही आ गई । उसमें ज्यादा क्या दिमाग लगाना ।

यह आत्मा मिथ्यात्व, रागादिक भावकर्मरूप सर्वदोषों से जुदा है । लो, यहाँ बतला रहे हैं कि जो आत्मा की परिणतिरूप भी है ऐसे राग, द्वेषों से भी यह आत्मा दूर है । भगवान् जिनेंद्र देव की बातों की भी सुनकर श्रद्धा में यह बात कहे रहे कि हमारा तो वह घर है, इतनी दालान वाला है, इतने लोग हमारे घर में रहते हैं । तो इसे को क्या कहा जाय? इसने अपना हर जगह ऊधम मचा दिया है । एक नगर में एक बादशाह था । एकबार मार्ग में वह चला जा रहा था । रास्ते में एक गडरिया की लड़की उसे पसंद आई, तो उससे विवाह कर लिया । उस गडरिया की मोड़ी को बहू बनाकर, रानी बनाकर अपने घर में रखा । अब जो उसके लिए कमरा दिया गया था वह बड़ा सजा हुआ था । चारों तरफ फोटो लगे हुए थे । राणाप्रताप का और-और भी बहादुर लोगों के फोटो लगे हुए थे । उनमें एक फोटो ऐसा भी था जिसमें गडरिये का बच्चा भेड़ बकरी चरा रहा था । अब वह लड़की सिलसिले से सब फोटो देखती जाती । मानो उन फोटो में कुछ सार नहीं है और जहाँ उस गडरिये के सुंदर बच्चे को भेड़-बकरी चराते देखा तो गडरिये की मोड़ी बोलने लगी, टिट्टटिट्ट । वहाँ उसका मन लग गया । कैसे सुंदर महल में वह विराजी है, रानी बनकर आई है और उसका मन कहीं नहीं भरा । मन भरा तो भेड़-बकरी के बच्चों पर ।

इसी तरह आचार्यदेव इतनी मर्मभेदी बात बता रहे हैं कि जो तेरी आत्मा की ऐसी परिणति हो रही है, रागद्बेषरूप, उससे भी तू रहित है इतने बड़े सुंदर-सुंदर वचन तो सुन रहे हैं और बीच-बीच में ख्याल आ जाये घर का, तो आप लोग क्या कुछ कम रहे?

यह आत्मा मिथ्यात्व, रागादिक भावकर्मरूप समस्त दोषों से रहित है । दूसरी बात यह कही जा रही है । यहाँ अब एकदम पते की बात कहना है कि वह दर्शन, ज्ञान, चारित्रमय है । शुद्धउपयोग का अविनाभावी निज शुद्ध आत्मा के सम्यग्दर्शन और ज्ञान और चारित्र से रचा हुआ यह आत्मतत्त्व है । असल में आत्मा में पाया क्या जाता है? इसको परमार्थस्वरूप से देख रहे हैं, जिससे मेरी सत्ता बनी है । जो मेरा निजी असाधारण अहेतुक स्वरूप है उस स्वरूप में स्वरूप की बात देखी जा रही है । इस लोक के अंदर आनंद किस चीज में है? निर्णय करके बताओ । सब पागलपन है, जो यह श्रद्धा लिए हुए होंगे कि धन में आनंद है । परिवार में आनंद है, इज्जत में आनंद है तो ये सब इंद्रजाल हैं, मायामय हैं, इनसे कोई संबंध नहीं हैं; बल्कि इनमें आपत्ति हैं, क्षोभ हैं, संसार में रुलाने की जड़ है। किस जगह आनंद है?

अरे भैया ! जरा शांत होकर अपना आराम पाकर विश्राम से रहकर अपनी ओर तो आओ । सर्वदोषों से रहित अविकारी अहेतुक ज्ञानघन आनंदमय प्रभु की दृष्टि तो करो । सब जगह देखभाल लो, आत्मा के दर्शन जैसा आनंद कहीं भी नहीं है । काहे को भ्रम करते हो? करोड़पति आदमी पागल बन रहे हैं तो बन लेने दो; उनकी चिंता न करो । लखपति आदमी यदि कोई मस्त हो रहे हों तो उन्हें मस्त होने दो, उन सबको दया का पात्र समझो । जिसके अज्ञान लदा हो वह दया का पात्र है । दया का भंडार ज्ञानी पुरुष होता है । वही मूल से दया कर सकता है । यह ज्ञानमय आत्मतत्त्व रत्नत्रयमय है । ऐसी आत्मा की हे भव्य पुरुष ! तुम निर्विकल्प समाधि में स्थित होकर भावना करो ।

यह ज्ञानस्वरूप तो हो गया आत्मा का स्वरूप, किंतु उस आत्मा के पाने का उपाय क्या है? साधन क्या है? तो जैसे नमक की डली चोंच में, रखने वाली चींटी को शक्कर का स्वाद लेने का उपाय क्या है? मुंह खाली कर दे, नमक की डली को फेंक दे और फिर स्वाद ले । शक्कर के बोरे पर तो आ ही गई है । अब इतनी ही तो कसर है कि पहले से रखी हुई डली को छोड़ दे और साफ चोंच से उस शक्कर का स्वाद ले, इतना ही तो करना है । इस प्रकार इस बने बनाए परिपूर्ण आत्मा को और कष्ट करना ही क्या है? अपने विकास के लिए या परमात्मस्वरूप को पाने के लिए? यह तो स्वरूप से ही केवल ही है, कुछ उसे करने की आवश्यकता क्या है ? परमात्मा है ही, परिपूर्ण है ही, स्वरसत: ज्ञानमात्र है ही । बस,करना यही है कि विभाव परिणामों को, जो कि उपयोग में गृहीत हुए हैं, देखे गये हैं, सुने गये हैं, अनुभव किये गये हैं, जिनके भोगने की इच्छा बनी है । निदान बंध का बंधन है ऐसे समस्त विषय-कषायरूप परिणामों को त्यागना है । त्याग करके फिर इस आत्मा की भावना भाओ ।

भैया ! सर्वपदार्थ खुदगर्ज हैं । कोई पदार्थ किसी दूसरे पदार्थ की परवाह नहीं करता है । वस्तु का स्वरूप ही ऐसा है तो यह जीव भी, मनुष्य भी ऐसा खुदगर्ज है, अपनी ही अपनी बातें चाहता है । दूसरों के सुख आराम की कुछ मन में बात नहीं लाते तो कोई दोष नहीं है । ठीक है, मगर तुम खुदगर्ज भी तो पक्के बनो । इस पराये शरीर को मान लिया कि यह मैं हूँ और इस पराये शरीर की ही खुदगर्जी कर रहा है तथा इसके काम के आगे दूसरों की परवाह नहीं रखता है । तो अभी वह पक्का खुदगर्ज कहां बना है न पक्का खुदगर्ज बन जाय तो वह भी प्रशंसा के योग्य है । मगर यह अधिकतर खुदगर्ज है सो यह प्रशंसा के योग्य नहीं है । इन परिणामों को (विभावों को) त्याग करके आत्मा की भावना भाओ ।

इस दोहे में कहा गया है, दिखाया गया है कि निर्वाण सुख ही उपादेयभूत है और निर्वाण सुख से भिन्न समस्त द्रव्यकर्म भावों से भिन्न जो यह शुद्ध आत्मा है; केवल निजस्वरूपमात्र जो, आत्मतत्त्व है, वह ही अभेदरत्नमयरूप परिणमते हुए भव्य जीवों को उपादेय है । इस प्रकार तीन प्रकार की आत्मा का प्रतिपादन करने वाले इस प्रथम महाधिकार में पृथक्-पृथक् स्वतंत्र भेदभावना के इस स्थल में 9 दोहों में इस आत्मा के स्वरूप की चर्चा की गई है ।

अब निश्चय से सम्यग्दृष्टि कौन है? इस आशय को मन में रखकर यह दोहा कहा जा रहा है―


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