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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पुरुषार्थसिद्धिउपाय - श्लोक 107

From जैनकोष



यद्वेदरागयोगान्मैथुनमभिधीयते तदब्रह्म ।

अवतरति तत्र हिंसा बधस्य सर्वत्र सद्भावात् ꠰꠰107꠰।

कुशील पाप और उसमें हिंसा का दोष―चौथा पाप है कुशील, कामसेवन । जब किसी के काम पीड़ा होती है तो उस समय उसका परिणाम कलुषित रहता है, यह इतने अज्ञान अंधेरे में रहता है कि उसे अपने ब्रह्मस्वरूप की सुध हो ही नहीं सकती है । तो जो काम पीड़ा से सताया हुआ है उसके अपने भाव प्राणों का तो नियम से घात है । पर शास्त्रों में बताया गया है कि स्त्री के अंग-अंग में, विशिष्ट-विशिष्ट अंग में निरंतर अनेक जीव उत्पन्न होते रहते हैं । जैसे स्त्री की नाभि में त्रस जीव उत्पन्न होते हैं तो उनके विघात में उन प्राणियों को हिंसा होती है । इस हिंसा में एक तो अपना चित स्थिर नहीं रहता, वह कामातुर स्त्री अथवा पुरुष बेसुध हो जाता है, न्याय अन्याय भी नहीं गिनता, हेय उपादेय का कुछ भी विवेक नहीं रहता । इस काम को मनोज कहते हैं । यह वेदना मन से उत्पन्न होती है । इसमें भूख प्यास आदिक की तरह कोई वेदना नहीं, कोई शारीरिक पीड़ा नहीं, यह तो एक मन की पीड़ा है । मन में जो एक खोटा भाव उत्पन्न हो जाता है, इससे ऐसा व्यथित हो जाता है यह जीव कि वह निरंतर अपने आपकी हिंसा करता रहता है । इस कामसेवन में शांति का तो काम नहीं है । जिस स्त्री अथवा पुरुष पर दृष्टि डाली उसके अधीन बन जाता है । उसकी कषायों की पूर्ति इसे करनी पड़ती है । एक कथानक है कि एक कोई वेश्या थी, उसके मन में आया कि किसी तरह से इस रानी का हार लेना चाहिये । तो अंजन चोर से उसने सहज ही कहा कि तुम हमारे बड़े प्यारे हो, उस रानी का हार लाकर हमें दे दो । तो उस अंजन चोर को पराधीनता में आकर वैसा ही करना पड़ा । आगे क्या हुआ यह दूसरी बात हैं मगर काम पीड़ा जगने पर वह पुरुष अथवा स्त्री पर के अधीन हो जाता है । उससे इस लोक में और परलोक में भी दुःख भोगना पड़ता है । काम पीड़ा उत्पन्न होने पर थोड़े समय में बेवकूफी की, उससे वह इतना फंस जाता है कि जिंदगी भर वह उन स्त्री पुत्रादिक के पीछे बड़ी-बड़ी हैरानियां उठाया करता है, रातदिन चिंतित रहना पड़ता है । आखिर उन सब कष्टों का मूल यही है कि वह ब्रह्मचर्य को न पाल सका इससे वे सारे अनर्थ हो गए । तो कामसेवन से अपने और पर के द्रव्यप्राण व भावप्राण की हिंसा होती है इससे एक महान् पाप है । इस महान पाप के कारण यह जीव अपने आपके परमात्मस्वरूप ज्ञानानंद का विकास नहीं कर पाता है इससे वह निरंतर अपने आपकी हिंसा किया करता है । तो हिंसा, झूठ, चोरी आदि किसी भी प्रकार के खोटे परिणाम करे तो वह खोटे परिणाम करने वाला नियम से अपने आपकी हिंसा कर रहा है । उस हिंसा के कारण इस जीव को भव-भव में दुःख भोगना पड़ता है । इस कारण जिन्हें अपने आप दया उत्पन्न हो उन्हें चाहिये कि सम्यग्ज्ञान उत्पन्न करें, पापकार्यों से बचें और अपने परमात्मारूप की उपासना करें ।


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